Search

GM बीज जादुई छड़ी है या हमारी मौत की तैयारी

GM बीज क्या होते हैं

GM बीज यानी जेनेटिकली मोडीफाइड बीज या हिंदी में कहें जैविक रूप से कृत्रिम तरीके से बनाई गईं फसल बीज। यह बीज साधारण बीज से कहीं अधिक उत्पादकता होंगे। जानकारी के मुताबिक GM बीज भारत में पनपे संकर बीज से भी ज्यादा की तादाद में उत्पादन देने में सफल होंगे।

वैज्ञानिक दृष्टि से GM बीज जनेटिक इंजिनियरिंग की तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इस तकनीक के अंतर्गत बीजों के स्वजातीय जीनों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को नष्ट कर उनमें दूसरी प्रजाति के जीनों को समाहित किया जाता है। जैसे आलू में मटर के जीन या कपास में किसी ऐसे जंगली पौधे के जीन, जिससे कीड़े दूर भागते हैं। समस्या यह है कि इस प्रक्रिया से तैयार हुए बीज अप्राकृतिक हो जाते हैं और कई समस्याएं उनके साथ जुड़ जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे अप्राकृतिक प्रक्रिया बता चुका है। अध्ययन बताता है कि बीटी कॉटन जैसी फसलें कीड़ों से भले बच जाती हों, पर उनकी गुणवत्ता प्राकृतिक फसलों जैसी नहीं होती।

loading...

GM बीज का विरोध कब किया गया ?

ये वही GM बीज हैं जिन GM बीजों के खिलाफ सारा भारत सड़को पर उतर गया था, कांग्रेस सरकार के जयराम रमेश की जन सुनवाइयों में ये स्पष्ट हो गया था कि देश के किसान, देश के उपभोक्ता, दुनिया भर के वैज्ञानिक और खाद्य सुरक्षा तथा पर्यावरण को समझने वाले सभी लोग GM बीजों को असुरक्षित मानते है। अस्वीकार करते है।

GM बीज जादुई छड़ी

GM बीज का बारे में केंद्र सरकार की नयी नीति

केंद्र सरकार की जिनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी (जीईएसी) ने 10 और जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। 21 मार्च को लगभग एक वर्ष बाद हुई कमिटी की बैठक में जिन फसलों को मंजूरी दी गई, उनमें गेहूं, धान, कपास, ज्वार और मक्का की जीएम प्रजातियां भी शामिल हैं। कमिटी के सामने फसलों की 53 जीएम प्रजातियों के फील्ड ट्रायल की स्वीकृति के आवेदन थे, मगर उसने 10 को ही अपनी स्वीकृति दी है। इसे अभी पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति मिलना शेष है।

उल्लेखनीय है कि जीईएसी ने पिछले वर्ष मार्च में हुई अपनी बैठक में 200 जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी थी। इसे अभी कुछ ही दिन पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने स्वीकृति दी है। सरकार ने बीज कंपनियों और कृषि शोध संस्थाओं को देश में उन जीएम फसलों के वैज्ञानिक जमीनी परीक्षण को स्वीकृति दी है, जिन्हें सरकारी नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने पिछले वर्ष मार्च में स्वीकृति दी थी।

अभी तक  देश में खाद्यान्न वाली जीएम फसलों को अनुमति नहीं है। केवल गैर खाद्य बीटी कॉटन जैसी फसलों को ही स्वीकृति दी गई है। अब चावल, गेहूं, मक्का, अरंडी और कपास की 200 से अधिक GM बीज ों के परीक्षण की अनुमति दी गई है, जिससे कि भविष्य में इनके व्यावसायिक उत्पादन की संभावना तलाशी जा सके।

GM बीज किन देशों ने अपनाया और कैसा अनुभव रहा ?

जीएम फसलों की खेती अब 25 से अधिक देशों में हो रही है, लेकिन यह केवल  अमेरिका और ब्राजील में ही ये किसानों के बीच ज्यादा लोकप्रिय हो पाई हैं।  विश्व की 77% जीएम फसलों की खेती मात्र तीन देशों में हो रही है। इनमें सर्वाधिक 40% फीसदी अमेरिका में, 23% ब्राजील में और 14% अर्जेंटीना में हो रही है। हालांकि अमेरिका को छोड़कर दूसरे देशों में सीमित संख्या में ही जीएम फसलों की खेती करने की अनुमति है। भारत में अब तक केवल जीएम कपास उगाने की अनुमति है।

अमेरिका में सिर्फ एक फीसदी क्षेत्र में जीएम मक्के की खेती को अंजाम दिया गया, मगर इस एक फीसदी क्षेत्र में की गई जीएम मक्के की खेती ने 50 फीसदी गैर जीएम फसल वाले क्षेत्र को संक्रमित कर दिया। साल 2009 में चीन ने भी अपनी उत्पादकता में सुधार लाने के उद्देश्य से चावल की बीटी फसल को हरी झंडी दिखा दी। वहां जीएम मक्के को भी स्वीकृति मिली। लेकिन पिछले पांच-छह वर्षों में ही वहां के नागरिकों और खासकर कृषकों को इसके नुकसानों का एहसास होने लगा। लोगों में इन बीजों के प्रति नाराजगी इतनी बढ़ गई कि GM बीज ों पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों और इसके समर्थन में बोल रहे वक्ताओं तक पर हमले हुए। नतीजतन चीन सरकार वर्ष 2014 के बाद से नए बायोसेफ्टी सर्टिफिकेट जारी करने से परहेज कर रही है।

GM बीज से भारत में कब फसल ली गयी ?

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे उत्पादकता बढ़ाने वाली जादुई छड़ी बताया जा रहा है। परंतु वास्तविकता को अपने पर्यावरण और देश के अनुकूल होकर समझने की जरूरत है। सरकार द्वारा बीटी कॉटन की खेती की इजाजत देने से भले ही देश में कपास का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी सामने आ चुके हैं। पंजाब के कपास किसानों की बदहाली इसका जीवंत उदाहरण है।

भारत में सन 2002 में 55 हजार किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। इन किसानों ने जीएम कपास उगाई थी। फसल रोपने के चार महीने बाद कपास का बढ़ना बंद हो गया था। इसकी पत्तियां भी झड़ने लगी थीं। बताया जाता है। जिसका परिणाम फसल के खराब होने के रूप में सामने आया था। आंध्र प्रदेश में अकेले अस्सी फीसदी कपास की फसल बर्बाद हो गई थी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टेक्निकल एक्सपर्ट कमिटी की रिपोर्ट में जीएम फसलों की जांच के दौरान विनियमों का उल्लंघन किए जाने की बात सामने आ चुकी है। साथ ही यह तथ्य भी सामने आया है कि जीएम फसलों के दुष्प्रभावों को बेहद गैर-जिम्मेदाराना तरीके से मापा गया है, जिसका भारतीय कृषि और पर्यावरण पर अपरिवर्तनीय असर पड़ सकता है।

GM बीज पर विशेषज्ञों की क्या राय है ?

क्या है कई विशेषज्ञों का कहना जीएम कृत्रिम बीज में बालवर्म नाम का एक जिवाणु होता है। जानकार बताते हैं कि बालवर्म नाम के इस जिवाणु से सेहत पर प्रभाव पड़ सकता है। यह एक खतरनाक एलर्जी भी कर सकता है। यही नहीं अभी तक कोई ऐसा प्रमाण मौजूद नहीं है कि इससे फायदा ही होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन जी एम बिज विकसित करने की तकनीक को अप्राकृतिक मानता है। आमूमन जी एम फसलो के नुकसानदेह प्रभाव कई सालों के बाद दिखाई पढ़ते हैं और क्रियान्वित होने के बाद इन कुप्रभावों में सुधार की गुंजाईश काफी कम रह जाती है।

GM बीज का फायदा किन कंपनियों को मिल रहा हैं ?

एक अन्य दृष्टिकोण से देखने पर ऐसा भी प्रतीत होता है कि GM बीज ों का भारत समेत कई राष्ट्रों में उतारा जाना एक बड़ी व्यावसायिक रणनीति का हिस्सा है। विदेशी बीज कंपनियों का समूह, जिसमें अमेरिकी कंपनियों की बड़ी भागीदारी है, उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर बाहरी देशों में अपने पैर पसारता है और बाद में अपना हस्तक्षेप बढ़ाता है। अमेरिकी कंपनी मोंसैंटो, जिसने बीटी कॉटन को भारत में प्रवेश दिलाया,

आज यह निर्धारित करने की स्थिति में आ गई है कि हमारे यहां कपास की कौन सी नस्ल उगाई जाए। साथ ही यह कंपनी भारत के कृषि शोध संस्थानों में दिशा-निर्देशन की भूमिका भी निभा रही है। मोंसैंटो, सिंगेंटा, डाउ केमिकल्स जैसी बड़ी बीज कंपनियां ‘थर्ड जेनरेशन’ बीजों को बढ़ावा देने का काम कर रही हैं। ध्यान रहे, इन ‘थर्ड जेनरेशन’ बीजों का इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। ऐसे में किसानों को हर साल नए बीज खरीदने होते हैं। देश में कपास के अधिकांश बीज मोंसैंटो कंपनी से ही खरीदे जा रहे हैं जिसका सीधा लाभ इस विदेशी कंपनी को मिल रहा है, न कि भारत को।

GM बीज पर लगायी गयी रोक की अनदेखी

पिछले 13 वर्षों में मैंने उपलब्ध सरसों के तेल की गुणवत्ता से कोई शिकायत नहीं सुनी है। हमारे देश में पारंपरिक रूप से सरसों का इस्तेमाल भोजन के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों को सरसों का साग के रूप में पकाया जाता है। इसलिए सरसों को केवल खाद्य तेल के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए। मैं कभी-कभी सरसों तेल का उपयोग कान और नाक के रोगों के उपचार और शरीर की मालिश के लिए भी करता हूं। इसके अलावा सरसों के तेल का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है। इसलिए बीटी बैंगन पर रोक लगाते हुए 2010 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा व्‍यक्‍त की गई चिंताओं और जीएम फसलों पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट व सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी समिति की सिफारिशों का पूरी तरह पालन करना आवश्यरक है।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा जीएम फसलों पर रोक के समय पेश की गई 19 पेजों की रिपोर्ट को नतीजों को दरकिनार क्यों कर रही है? क्या जीएम इंडस्‍ट्री इतनी ताकतवर है कि जीईएसी एक पूर्व मंत्री के नेतृत्व में आरंभ हुई एक वैज्ञानिक बहस को नजरअंदाज कर देना चाहती है? जीएम सरसों का कोई प्रत्‍यक्ष लाभ न होने के बावजूद स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की ऐसी अनदेखी?

GM बीज मोदी सरकार की राय

 महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब देश में अनाज की रिकॉर्ड तोड़ उपज हो रही है तो फिर देश में जीएम फसलों की क्या आवश्यकता है।  हाल ही में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी कहा कि जीएम फूड के बारे में लोगों को शिक्षित किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गत माह जम्मू में विज्ञान कांग्रेस को  संबोधित करते हुए जीएम फसलों पर आगे बढऩे के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि उत्पादन बढ़ाने और पानी की खपत को कम करने के लिए हमारे पास नई तकनीकों के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए कृषि उत्पादन बढ़ाने वाली बीटी जैसी तकनीकों को सिर्फ अवैज्ञानिक सोच से खारिज नहीं कर देना चाहिए।

जीएम फसलों की पर्यावरणविदों द्वारा तीखी आलोचना होती रही है। जीएम विरोधियों  का मानना है कि यदि खेती के परंपरागत तरीकों को ही सही से अपनाया जाए तो उत्पादन पांच गुना तक बढ़ाया जा सकता है। खेती की जीएम तकनीक जैव विविधता के लिए हानिकर है। इससे बीजों के मौलिक गुण तो नष्ट हो ही जाते हैं, साथ ही यह आसपास की पारिस्थितिकी को भी प्रभावित करता है। जीएम उपज मानव और पशु आहार के लिए सुरक्षित होने की भी अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है। इस खेती में बीजों पर से किसानों का परंपरागत अधिकार भी छिन जाता है। किसान बीजों के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अगर एक बार जीएम फसलें बाजार में आ गईं तो फिर उनको नहीं हटाया जा सकेगा।

GM बीज के बारे में मेरे विचार

मै एक प्राकृतिक चिकत्सक हूँ और जनता हूँ की यदि आप प्राकृतिक के साथ छेड़ छाड़ करेंगे तो उसके जो नुक्सान होंगे वो भी हमें ही भुगतने होंगे हुम अभी तक रासायनिक खादों ने हमारी प्रकृति और कृषि को जो नुक्सान पहंचाया है उसकी भरपाई अभी तक नहीं हो सकती देश में नयी नयी बीमारी आ रही हैं और उनका इलाज भी नहीं मिल पा रहा और कृषि योग्य भूमि लगातार कम होती जा रही है
पशु पक्षी की बहुत से नस्लें ख़तम होने के कगार पर हैं global warming aur polution कितना फ़ैल गया है हम अपने देश की बात करें तो शायद दूसरे या तीसरे प्रदूषित देश में हमारी गिनती होती है उस पर सरकारों द्वारा बिना सोचे समझे GM बीज के उपर फैसले लेना शक के दायरे में लता है की कही सभी सरकारें इसी तरह लोगों को मारने के कामों में तो नहीं लगी
मोदी सरकार को चाहिये की देश ने GM बीज की वजह से जो नुक्सान उठाये है उनको अनदेखा ना करे और GM बीज को भारत में लेन से पहले दूसरे देशों की हकीकत से भी वाकिफ हों हमारे लिए कृषि उत्पादन इतना महत्वपूरण नहीं है जितना उसकी गुणवत्ता हम पहले ही अपने खाद्यन्नों की गुणवत्ता खो चुके हैं और उस पैर GM बीज का फैसला कही लोगों के लिए किसान के लिए नयी मुसीबत ना खड़ा कर दे आप लोगों ने ये लेख पढ़ा इसके लिये धन्यवाद और निवेदन है की इसको इतना शेयर करें की मोदी सरकार कोई भी गलत फैसला लेने से पहले ये सोचे की उन्होंने देश को क्या दिया क्योंकि GM बीज के जो नुक्सान हो चुके हैं और जिनका अंदेशा है यदि वो सभी तथ्य सही हुए तो शयद मानव जाती ही खतरे में पढ़ जायेगी
Article Source :- http://www.aslibharat.com/,
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/,
http://www.hindi.drishtiias.com/
Loading...
loading...

Related posts