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स्वर योग :- बिना दवाई रोगों से मुक्ति का आसान उपाय

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स्वर योग (Tone Yoga) 

स्वर योग (Tone Yoga) को जानने वाला कभी भी विपरीत परिस्थितियों में नहीं फँसता और फँस भी जाए तो आसानी से विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाकर बाहर निकल जाता है। स्वर योग (Tone Yoga) में बहुत से रहस्य छुपे हैं. भारतीय संस्कृति में स्वर योग (Tone Yoga) पर बहुत से एक्सपेरिमेंट हुए हैं और बहुत से असाध्य रोगों का सफल इलाज भी हुआ है पर ये तभी हो सकता है जब आप स्वर योग (Tone Yoga) को अच्छी तरह समझ लें .

स्वर योग (Tone Yoga) को समझने के लिए आपको एक example देते हैं मान लीजिये जैसे ही आपको छींकें आरम्भ होती हैं। जुकाम का नोटिस मिलता है ऐसे लक्षण विशेष भास होने पर रोग विशेष के आक्रमण की शंका हुआ करती है। शारीरिक रोग इस बात का चिन्ह हैं कि शरीर में कहीं कुछ अपूर्णता या दुर्बलता है अथवा भौतिक प्रकृति विरोधी शक्तियों के स्पर्श के लिये कहीं से खुली है हुई तो यह स्पष्ट है कि रोग बाहर से हमारे अन्दर आते हैं। जब ये आते हैं तभी यदि कोई इनके आने का अनुभव कर सके और इनके शरीर में प्रवेश करने के पहले ही इन्हें दूर फेंक देने की शक्ति और अभ्यास उसमें हो जाय तो ऐसा व्यक्ति रोग से मुक्त रह सकता है जब यह आक्रमण अन्दर से उठता हुआ दिखाई देता है तो समझना यही चाहिये कि आया तो बाहर से है पर अब चेतना में प्रवेश करने के पहले पकड़ा नहीं जा सका, इस प्रकार रोग शरीर को आक्राँत कर लेता है इस भौतिक शरीर में रोग घुसने के पहले ही इसे रोक दिया जा सकता है, और यह क्रिया स्वर योग (Tone Yoga) द्वारा सरलता तथा सफलतापूर्वक की जा सकती है

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स्वर योग (Tone Yoga) कैसे काम करता है ?

यहाँ यह शंका हो सकती है कि स्वर योग (Tone Yoga) में ऐसी क्या खूबी है, समाधान यह है कि समस्त रोग शरीर में सूक्ष्म चेतना और सूक्ष्म शरीर के ज्ञान तन्तुमय या प्राण भौतिक कोष द्वारा प्रवेश करते हैं। जिसे भी सूक्ष्म शरीर का ज्ञान है अथवा सूक्ष्म चेतना से सचेतन है वह रोगों को रास्ते में ही अटका सकता है, हाँ यह सम्भव हो सकता है कि निद्रावस्था में अथवा अचेतन अवस्था में जब कि आप असावधान हैं कोई कोई रोग आकस्मिक आक्रमण करें दे प्रायः शत्रु इसी प्रकार वार करते हैं किन्तु फिर भी आँतरिक साधन द्वारा प्रथम आत्मरक्षा के लिये शत्रु प्रहार को वहीं रोक कर वहाँ से भगाया जा सकता है। स्वर योग (Tone Yoga) द्वारा रोग के लक्षणों का तनिक भी आभास न होने पर भविष्य का ज्ञान होकर उससे बचने का भी उपाय हो सकता है।

इच्छा शक्ति (WillPower ) के दो भेद हैं ऑटो सजेशन (Auto Suggestions)और सैल्फ सजेशन (Self Suggestions) । अर्थात् झाड़ फूँक, तंत्र, मंत्र आदि द्वारा दूसरों को भला चंगा करना ऑटो सजेशन है। स्वर योग (Tone Yoga) सैल्फ सजेशन है।

स्वर योग (Tone Yoga) शरीर क्रियाओं को संतुलित और स्थिर रखने की एक प्राचीन विद्या है। इससे स्वस्थता को अक्षुण्ण बनाए रखना सरल -संभव हो जाता है। योग के आचार्यों के अनुस्वार यह एक विशुद्ध विज्ञान है, जो यह बतलाता है कि निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त भौतिक शक्तियों से मानव शरीर किस प्रकार प्रभावित होता है।

सूर्य, चंद्र अथवा अन्यान्य ग्रहों की सूक्ष्म रश्मियों द्वारा शरीरगत परमाणुओं में किस प्रकार की हलचल उत्पन्न होती है। काया की जब जैसी स्थिति हो, तब उससे वैसा ही काम लेना चाहिए-यही स्वर योग (Tone Yoga) का गूढ़ रहस्य है। इतना होते हुए भी यह मनुष्य की सृजन शक्ति में हस्तक्षेप नहीं करता, वरन उसे प्रोत्साहित ही करता है।

स्वर योग (Tone Yoga) के अनुसार प्राण के आवागमन के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाडि़यों की संख्या 72 हजार मानी जाती है। इनको नसें न समझना चाहिए। यह प्राणचेतना प्रवाहित होने के सूक्ष्मतम पथ हैं। नाभि में इस प्रकार की नाडि़यों का एक गुच्छक है। इसमें इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा यशस्विनी, अलंबुसा, कुहू तथा शंखिनी (Ida, Pingala , Susumna , Gandhari , Hstijihwa , Pusha yashaswini , Alnbusa , Kuhu and Shankini) नामक दस नाडि़यां हैं। यह वहां से निकलकर देह के विभिन्न हिस्सों में चली जाती हैं।

इनमें से प्रथम तीन को प्रमुख माना गया है। स्वर योग (Tone Yoga) में इड़ा को चंद्र नाड़ी या चंद्र स्वर भी कहते हैं। यह बाएं नथुने में है पिंगला को सूर्य नाड़ी अथवा सूर्य कहा गया है। यह दाएं नथुने में है। सुषुम्णा को ‘वायु’ कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य स्थित है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चंद्र नियमित रूप से अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करते हैं। शेष अन्य नाडि़यां भी भिन्न-भिन्न अंगों में प्राण संचार का कार्य करती हैं।

स्वर योग (Tone Yoga) नाक के छिद्र से ग्रहण किया जाने वाला श्वास है, जो वायु के रूप में होता है। श्वास ही जीव का प्राण है और इसी श्वास को स्वर कहा जाता है।

स्वर के चलने की क्रिया को उदय होना मानकर स्वरोदय कहा गया है तथा विज्ञान, जिसमें कुछ विधियाँ बताई गई हों और विषय के रहस्य को समझने का प्रयास हो, उसे विज्ञान कहा जाता है। स्वरोदय विज्ञान (Swroday Science) एक आसान प्रणाली है, जिसे प्रत्येक श्वास लेने वाला जीव प्रयोग में ला सकता है।

स्वर योग (Tone Yoga) इतना सरल है कि अगर थोड़ी लगन एवं आस्था से इसका अध्ययन या अभ्यास किया जाए तो जीवनपर्यन्त इसके असंख्य लाभों से अभिभूत हुआ जा सकता है।

स्वर योग

सूर्य, चंद्र और सुषुम्ना स्व
सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को महसूस करने का प्रयत्न कीजिए। देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है। स्वर योग (Tone Yoga) के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा।

इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से निःश्वास निकलता महसूस करें तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा। श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वर योग (Tone Yoga) का आधार हैं।

स्वर योग
सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है। इसका रंग काला है। यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है। इड़ा नाड़ी शरीर के बाईं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी तरफ अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर। सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा।
गांधार नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आंख में, पूषा दाएं कान में, यशस्विनी बाएं कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है। हठयोग में नाभिकंद अर्थात कुंडलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है। स्वर योग (Tone Yoga) में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग (Tone Yoga) शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन उदर मध्य ही हो सकती हैं। इसीलिए यहां नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है। स्वर योग (Tone Yoga) इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी सांस लेनी चाहिए। वह प्राणवायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है। गहन अनुसंधान के पश्चात अब शरीर शास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का काम पूरा नहीं हो जाता। उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो। तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुंचना जरूरी है। इसके बिना स्वास्थ्य लड़खड़ाने का खतरा बना रहता है। इसीलिए सामान्य श्वास को स्वर योग (Tone Yoga) में अधूरी क्रिया माना गया है। इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है। इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया।

स्वर योग के गुण/लाभ/फायदे (Yoga Tone properties / benefits / advantages)

दायां स्वर पुल्लिंग (शिव) और बायां स्त्रीलिंग (शक्ति) का प्रतीक है। अतः प्रिय और स्थिर कार्य, शक्ति के प्रवाह में अर्थात चंद्र स्वर में और अप्रिय तथा अस्थिर कार्य शिव के प्रवाह में अर्थात सूर्य स्वर में होते हैं। सुषुम्ना स्वर का उदय शिव और शक्ति के योग से होता है। इसलिए व्यावहारिक कार्यों को यह होने ही नहीं देता है, किंतु ईश्वर के भजन में अत्यंत सहायक होता है। भवसागर को पार करने में यह जहाज की तरह सहायता करता है।

दीर्घायु की परीक्षा यदि सारी रात सूर्य स्वर तथा सारे दिन चंद्र स्वर चले, तो समझना चाहिए कि दीर्धायु प्राप्त होगी तथा शरीर निरोग रहेगा और दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी तरह नहीं सताएंगे। किसी महीने की प्रतिपदा को सूर्योदय से संध्या तक सूर्य स्वर चलता रहे, तो समझना चाहिए कि एक माह तक शरीर अस्वस्थ रहेगा। छठे वर्ष मृत्यु भी समीप आ जाएगी। इंद्रिय शक्ति का ह्रास होगा और विभिन्न प्रकार की चिंताएं सताएंगी।

सुबह उठने पर पलंग पर ही आंख खुलते ही जो स्वर चल रहा हो उस ओर के हाथ की हथेली को देखें और उसे चेहरे पर फेरते हुए भगवान का नाम लें। इसके बाद जिस ओर का स्वर चल रहा हो उसी ओर का पैर पहले बिस्तर से नीचे जमीन पर रखें। इस क्रिया को करने से पूरा दिन सुख और चैन से बीतेगा।

अगर किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाए तो उसके लक्षण पता चलते ही जो स्वर चलता हो उसको तुरंत ही बंद कर देना चाहिए और जितनी देर या जितने दिनों तक शरीर स्वस्थ न हो जाए उतनी देर या उतने दिनों तक उस स्वर को बंद कर देना चाहिए। इससे शरीर जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है और रोगी को ज्यादा दिनों तक कष्ट नहीं सहना पड़ता

अगर शरीर में किसी भी तरह की थकावट महसूस हो तो दाहिने करवट सो जाना चाहिए, जिससे `चंद्र´ स्वर चालू हो जाता है और थोड़े ही समय में शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है

स्नायु रोग के कारण अगर शरीर के किसी भाग में किसी भी तरह का दर्द हो तो दर्द के शुरू होते ही जो स्वर चलता हो, उसे बंद कर देना चाहिए। इस प्रयोग को सिर्फ 2-4 मिनट तक ही करने से रोगी का दर्द चला जाता है।

जब किसी व्यक्ति को दमे का दौरा पड़ता है तो उस समय जो स्वर चलता हो उसे बंद करके दूसरा स्वर चला देना चाहिए। इससे 10-15 मिनट में ही दमे का दौरा शांत हो जाता है। रोजाना इसी तरह से करने से एक महीने में ही दमे के दौरे का रोग कम हो जाता है। दिन में जितनी भी बार यह क्रिया की जाती है, उतनी ही जल्दी दमे का दौरा कम हो जाता है।

जिस व्यक्ति का स्वर दिन में बायां और रात में दायां चलता है, उसके शरीर में किसी भी तरह का दर्द नहीं होता है। इसी क्रम से 10-15 दिन तक स्वरों को चलाने का अभ्यास करने से स्वर खुद ही उपर्युक्त नियम से चलने लगता है।

रात को गर्भाधान के समय स्त्री का बांया स्वर और पुरुष का अगर दायां स्वर चले तो उनके घर में बेटा पैदा होता है तथा स्त्री-पुरुष के उस समय में बराबर स्वर चलते रहने से गर्भ ठहरता नहीं है।

जिस समय दायां स्वर चल रहा हो उस समय भोजन करना लाभकारी होता है। भोजन करने के बाद भी 10 मिनट तक दायां स्वर ही चलना चाहिए। इसलिए भोजन करने के बाद बायीं करवट सोने को कहा जाता है ताकि दायां स्वर चलता रहे। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है और व्यक्ति को कब्ज का रोग भी नहीं होता। अगर कब्ज होता भी है तो वह भी जल्दी दूर हो जाता है।

किसी जगह पर आग लगने पर जिस ओर आग की गति हो उस दिशा में खड़े होकर जो स्वर चलता हो, उससे वायु को खींचकर नाक से पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से या तो आग बुझ जाएगी या उसका बढ़ना रुक जाएगा।

स्वर योग में स्वर को कैसे बदले  (Yoga how to change the tone in tone)

यदि आप यह जानना चाहते है कि किस समय कौन सा स्वर चल रहा है तो इसको जानने का तरीका बहुत आसान है। सबसे पहले नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। फिर इस छिद्र को बंद करके उसी तरह से दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। नाक के जिस छिद्र से सांस लेने और छोड़ने में आसानी लग रही हो समझना चाहिए कि उस तरफ का स्वर चल रहा है और जिस तरफ से सांस लेने और छोड़ने में परेशानी हो उसे बंद समझना चाहिए।

नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चल रहा हो तो उसे दबाकर बंद करने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से स्वर चल रहा हो उसी तरफ करवट लेकर लेटने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चलाना हो उससे दूसरी तरफ के छिद्र को रुई से बंद कर देना चाहिए।

स्वर योग (Tone Yoga) के बारे में सब कुछ इस छोटे से आर्टिकल में नहीं समां सकता फिर भी एक कोशिश की गयी है आपको स्वर योग (Tone Yoga) के बारे में समझाने की उम्मीद है आप इसका फायदा जरुर उठाएंगे .

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