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स्लिप डिस्क होने के कारण और आयुर्वेदिक उपचार

स्लिप डिस्क/Slip Disc/backpain क्या है ?

स्लिप डिस्क आज की भागती दौड़ती दुनिया में एक भयानक बीमारी के रूप ले चुकी है एक अनुमान के अनुसार 10 प्रतिशत की आबादी कमर दर्द का शिकार है। दु:ख की बात यह है कि यह समस्या जीवन के उस पड़ाव में होती है जो प्रोडक्टिव होते हैं यानि 30-50 साल की उम्र में। कमर दर्द से देश को करोड़ों रुपयों का नुकसान होता है, जिसका कारण इसके इलाज और काम-काज का नहीं कर पाना है। कमर दर्द के मुख्य कारणों में स्लिप डिस्क अहम है, इसके इलावा मैकेनिकल, टी.बी, ट्यूमर, फ्रेक्चर डीजनरेटिव व गठिया मुख्य हैं।

किसी भी बीमारी का इलाज़ समझने से पहले उस बीमारी का कारन और जहां वो बीमारी हुई है उसके सम्बन्ध में सारी जानकारी प्राप्त कर लें, क्यूंकि यह सबसे बड़ी समस्या है आज कल आम आदमी के सामने की उसको बीमारी के सम्बन्ध में बहुत सी भ्रांतियां है, पूर्ण जानकारी का आभाव है। बहुत से ऐसे रोगी रोज़ाना देखने को मिल जाते हैं जिनके लिए बस यही एक जानकारी उपलब्ध है की उनकी रीढ़ की हड्डी की गद्दी खिसक गयी है? क्या वास्तव में कोई गद्दी नुमा चीज़ है? और अगर हाँ तो इसका उपयोग क्या है? क्या इस गद्दी नुमा चीज़ को निकाल देने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता शरीर पर? और वास्तव में कोई ऐसी चीज़ है भी जो स्लिप होती है?

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सबसे पहले हमें जरुरत है इस बात को समझने की – रीढ़ की हड्डी क्या है, इसकी विशेषता क्या है और आखिर रीढ़ की हड्डी में ऐसी क्या विशेषता है जो आजकल इससे सम्बंधित बीमारियां बहुत अधिक मात्रा में बढ़ गयी हैं?

रीढ़ की हड्डी को सामन्य मेडिकल भाषा में वर्टिब्रल कॉलम कहा जाता है, यह कॉलम शरीर को साधने का काम करता है, इसे संस्कृत में- मेरु-दंड के नाम से भी कहा गया है। रीढ़ की हड्डी न केवल शरीर के लिए एक एक्सिस का काम करती है बल्कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण रचना, मेरु-रज्जु, स्पाइनल कॉर्ड को अपने अंदर रखती है, यह मेरु रज्जु दिमाग से उठने वाली संवेदनाओं को शरीर के अलग अलग हिस्से तक पहुँचाने का काम करता है।

रीढ़ की हड्डी अलग अलग ३३ कशेरुकाओं से मिलकर बना होता है, जिन्हें वेर्टेब्रे कहा जाता है! इनमें से २४ तो गतिमान होती हैं, मतलब की उनमेंं मूवमेंट्स की संभावना होती हैं और ९ ऐसी होती हैं जिनमें कोई गति नहीं होती है। सम्पूर्ण वर्टिब्रल कॉलम को अलग अलग ४ भागने में बांटा जा सकता है-

  1. सर्वाइकल (गर्दन के हिस्से के वेर्टेब्रे/कशेरुकाएं)
  2. डोर्सल (धड़ व उदर के हिस्से में लगी वेर्टेब्रे)
  3. लम्बर (कमर के हिस्से की कशेरुकाएं)
  4. सेक्रल (सबसे नीचे का हिस्सा जिसकी सभी वेर्टेब्रे आपस में फ्यूज्ड होती हैं)

इन अलग अलग हिस्सों से अलग अलग कुछ नर्व निकलती हैं जो सम्बंधित हिस्सों को संवेदनाएं या सूचनाएं पहुंचती हैं।

रीढ़ की हड्डी में एक और विशेषता होती है- इसकी संरचना! कुदरतन तौर पर हमारी रीढ़ की हड्डी का आकार अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर “S” के उलटे आकार जैसा होता है। काम जगह में किसी चीज़ को व्यवस्थित करने का यह एक नेचुरल तरीका है, जिससे अधिक लम्बाई की मेरु रज्जु

अगर एक एक करके सभी बातों का जवाब ढूंढा जाए तो सबसे पहले जानने की आवश्यकता है की आखिर डिस्क है क्या ?

डिस्क एक सॉफ्ट टिश्यू (नरम उत्तकों) से बनी रचना होती है जो रीढ़ की हड्डी के विभिन्न टुकड़ों को आपस में रगड़ खाने से बचाती है और इनकी मूवमेंट्स को नियमित करती है और एक सहायता देती है। अगर रीढ़ के हड्डी में यह नरम गद्दियां ना हों तो सभी हड्डियां एक दूसरे से टकराती रहेंगी और उनमे किसी भी प्रकार की गति की संभावना संपत हो जाएगी। इसको कुदरत का वरदान ही मानना चाहिए की ये डिस्क हमारी रीढ़ को विभिन्न दिशाओं में गति के लायक बना देती हैं वर्ना किसी भी प्रकार की गति रीढ़ की हड्डी में संभव ही ना हो।

डिस्क की अगर तुलना करनी हो तो डिस्क एक गुब्बारे के सामान रचना होती है, जिसमें अच्छी खासी लचक होती है, यही क्लाचक इस गुब्बारे को फैलने और सिकुड़ने में मदद करती है जिससे की हड्डियों की गति सुचारू बनी रहे।

दरअसल यह टर्म स्लिप डिस्क समूची प्रक्रिया को सही ढंग से नहीं बता पाता। स्लिप डिस्क कोई बीमारी नहीं, शरीर की मशीनरी में तकनीकी खराबी है। वास्तव में डिस्क स्लिप नहीं होती, बल्कि स्पाइनल कॉर्ड से कुछ बाहर को आ जाती है। डिस्क का बाहरी हिस्सा एक मजबूत झिल्ली से बना होता है और बीच में तरल जैलीनुमा पदार्थ होता है। डिस्क में मौजूद जैली या कुशन जैसा हिस्सा कनेक्टिव टिश्यूज के सर्कल से बाहर की ओर निकल आता है और आगे बढा हुआ हिस्सा स्पाइन कॉर्ड पर दबाव बनाता है। कई बार उम्र के साथ-साथ यह तरल पदार्थ सूखने लगता है या फिर अचानक झटके या दबाव से झिल्ली फट जाती है या कमजोर हो जाती है तो जैलीनुमा पदार्थ निकल कर नसों पर दबाव बनाने लगता है, जिसकी वजह से पैरों में दर्द या सुन्न होने की समस्या होती है।

स्लिप डिस्क होने के कारण:- 

1. गलत पोश्चर इसका आम कारण है। लेट कर या झुक कर पढना या काम करना, कंप्यूटर के आगे बैठे रहना इसका कारण है।
2. अनियमित दिनचर्या, अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने की वजह से दर्द हो सकता है।
3. सुस्त जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियां कम होने, व्यायाम या पैदल न चलने से भी मसल्स कमजोर हो जाती हैं। अत्यधिक थकान से भी स्पाइन पर जोर पडता है और एक सीमा के बाद समस्या शुरू हो जाती है।
4. अत्यधिक शारीरिक श्रम, गिरने, फिसलने, दुर्घटना में चोट लगने, देर तक ड्राइविंग करने से भी डिस्क पर प्रभाव पड सकता है।
5. उम्र बढने के साथ-साथ हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और इससे डिस्क पर जोर पडने लगता है।
6. जॉइंट्स के डिजेनरेशन के कारण
7. कमर की हड्डियों या रीढ की हड्डी में जन्मजात विकृति या संक्रमण
8. पैरों में कोई जन्मजात खराबी या बाद में कोई विकार पैदा होना।
स्लिप डिस्क आमतौर पर किस उम्र में होता है ज्यादा खतरा
1. आमतौर पर 30 से 50 वर्ष की आयु में कमर के निचले हिस्से में स्लिप्ड डिस्क की समस्या हो सकती है।
2. 40 से 60 वर्ष की आयु तक गर्दन के पास सर्वाइकल वर्टिब्रा में समस्या होती है।
3. एक्सप‌र्ट्स के अनुसार अब 20-25 वर्ष के युवाओं में भी स्लिप डिस्क के लक्षण तेजी से देखे जा रहे हैं। देर तक बैठ कर कार्य करने के अलावा स्पीड में बाइक चलाने या सीट बेल्ट बांधे बिना ड्राइविंग करने से भी यह समस्या बढ रही है। अचानक ब्रेक लगाने से शरीर को झटका लगता है और डिस्क को चोट लग सकती है।
स्लिप डिस्क होने के लक्षण
1. नसों पर दबाव के कारण कमर दर्द, पैरों में दर्द या पैरों, एडी या पैर की अंगुलियों का सुन्न होना
2. पैर के अंगूठे या पंजे में कमजोरी
3. स्पाइनल कॉर्ड के बीच में दबाव पडने से कई बार हिप या थाईज के आसपास सुन्न महसूस करना
4. समस्या बढने पर यूरिन-स्टूल पास करने में परेशानी
5. रीढ के निचले हिस्से में असहनीय दर्द
6. चलने-फिरने, झुकने या सामान्य काम करने में भी दर्द का अनुभव। झुकने या खांसने पर शरीर में करंट सा अनुभव होना।
स्लिप डिस्क के जांच और उपचार
दर्द की निरंतरता, एक्स-रे या एमआरआइ, लक्षणों और शारीरिक जांच के माध्यम से डॉक्टर को पता चलता है कि कमर या पीठ दर्द का सही कारण क्या है और क्या यह स्लिप डिस्क है। जांच के दौरान स्पॉन्डलाइटिस, डिजेनरेशन, ट्यूमर, मेटास्टेज जैसे लक्षण भी पता लग सकते हैं। कई बार एक्स-रे से सही कारणों का पता नहीं चल पाता। सीटी स्कैन, एमआरआइ या माइलोग्राफी (स्पाइनल कॉर्ड कैनाल में एक इंजेक्शन के जरिये) से सही-सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इससे पता लग सकता है कि यह किस तरह का दर्द है। यह डॉक्टर ही बता सकता है कि मरीज को किस जांच की आवश्यकता है।
स्लिप डिस्क के ज्यादातर मरीजों को आराम करने और फिजियोथेरेपी से राहत मिल जाती है। इसमें दो से तीन हफ्ते तक पूरा आराम करना चाहिए। दर्द कम करने के लिए डॉक्टर की सलाह पर दर्द-निवारक दवाएं, मांसपेशियों को आराम पहुंचाने वाली दवाएं या कभी-कभी स्टेरॉयड्स भी दिए जाते हैं। फिजियोथेरेपी भी दर्द कम होने के बाद ही कराई जाती है। अधिकतर मामलों में सर्जरी के बिना भी समस्या हल हो जाती है। संक्षेप में इलाज की प्रक्रिया इस तरह है-
1. दर्द-निवारक दवाओं के माध्यम से रोगी को आराम पहुंचाना
2. कम से कम दो से तीन हफ्ते का बेड रेस्ट
3. दर्द कम होने के बाद फिजियोथेरेपी या कीरोप्रैक्टिक ट्रीटमेंट
4. कुछ मामलों में स्टेरॉयड्स के जरिये आराम पहुंचाने की कोशिश
5. परंपरागत तरीकों से आराम न पहुंचे तो सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है।
लेकिन सर्जरी होगी या नहीं, यह निर्णय पूरी तरह विशेषज्ञ का होता है। ऑर्थोपेडिक्स और न्यूरो विभाग के विशेषज्ञ जांच के बाद सर्जरी का निर्णय लेते हैं। यह निर्णय तब लिया जाता है, जब स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव बढने लगे और मरीज का दर्द इतना बढ जाए कि उसे चलने, खडे होने, बैठने या अन्य सामान्य कार्य करने में असह्य परेशानी का सामना करने पडे। ऐसी स्थिति को इमरजेंसी माना जाता है और ऐसे में पेशेंट को तुरंत अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत होती है, क्योंकि इसके बाद जरा सी भी देरी पक्षाघात का कारण बन सकती है।
रोगी को सलाह
जांच और एमआरआइ रिपोर्ट सही हो तो स्लिप्ड डिस्क की सर्जरी आमतौर पर सफल रहती है। हालांकि कभी-कभी अपवाद भी संभव है। अगर समस्या एल 4 (स्पाइनल कॉर्ड के निचले हिस्से में मौजूद) में हो और सर्जन एल 5 खोल दे तो डिस्क मिलेगी ही नहीं, लिहाजा सर्जरी विफल होगी। हालांकि ऐसा आमतौर पर नहीं होता, लेकिन कुछ गलतियां कभी-कभार हो सकती हैं। सर्जरी के बाद रोगी को कम से कम 15-20 दिन तक बेड रेस्ट करना पडता है। इसके बाद कमर की कुछ एक्सरसाइजेज कराई जाती हैं। ध्यान रहे कि इसे किसी कुशल फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा ही कराएं। शुरुआत में हलकी एक्सरसाइज होती हैं, धीरे-धीरे इनकी संख्या बढाई जाती है। मरीज को हार्ड बेड पर सोना चाहिए, मांसपेशियों को पूरा आराम मिलने तक आगे झुक कर कोई काम करने से बचना चाहिए। सर्जरी के बाद भी जीवनशैली सही रहे, यह जरूरी है। वजन नियंत्रित रहे, आगे झुक कर काम न करें, भारी वजन न उठाएं, लंबे समय तक एक ही पोश्चर में बैठने से बचें और कमर पर आघात या झटके से बचें।
जीवनशैली में बदलाव करें 
1. नियमित तीन से छह किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलें। यह सर्वोत्तम व्यायाम है हर व्यक्ति के लिए।
2. देर तक स्टूल या कुर्सी पर झुक कर न बैठें। अगर डेस्क जॉब करते हैं तो ध्यान रखें कि कुर्सी आरामदेह हो और इसमें कमर को पूरा सपोर्ट मिले।
3. शारीरिक श्रम मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। लेकिन इतना भी परिश्रम न करें कि शरीर को आघात पहुंचे।
4. देर तक न तो एक ही पोश्चर में खडे रहें और न एक स्थिति में बैठे रहें।
5. किसी भी सामान को उठाने या रखने में जल्दबाजी न करें। पानी से भरी बाल्टी उठाने, आलमारियां-मेज खिसकाने, भारी सूटकेस उठाते समय सावधानी बरतें। ये सारे कार्य इत्मीनान से करें और हडबडी न बरतें।
6. अगर भारी सामान उठाना पडे तो उसे उठाने के बजाय धकेल कर दूसरे स्थान पर ले जाने की कोशिश करें।
7. हाई हील्स और फ्लैट चप्पलों से बचें। अध्ययन बताते हैं कि हाई हील्स से कमर पर दबाव पडता है। साथ ही पूरी तरह फ्लैट चप्पलें भी पैरों के आर्च को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे शरीर का संतुलन बिगड सकता है।
8. सीढियां चढते-उतरते समय विशेष सावधानी रखें।
9. कुर्सी पर सही पोश्चर में बैठें। कभी एक पैर पर दूसरा पैर चढा कर न बैठें।
10. जमीन से कोई सामान उठाना हो तो झुकें नहीं, बल्कि किसी छोटे स्टूल पर बैठें या घुटनों के बल नीचे बैठें और सामान उठाएं।
11. वजन नियंत्रित रखें। वजन बढने और खासतौर पर पेट के आसपास चर्बी बढने से रीढ की हड्डी पर सीधा प्रभाव पडता है।
12. अत्यधिक मुलायम और सख्त गद्दे पर न सोएं। स्प्रिंगदार गद्दों या ढीले निवाड वाले पलंग पर सोने से भी बचें।
13. पीठ के बल सोते हैं तो कमर के नीचे एक टॉवल फोल्ड करके रखें, इससे रीढ को सपोर्ट मिलेगा।
14. कभी भी अधिक मोटा तकिया सिर के नीचे न रखें। साधारण और सिर को हलकी सी ऊंचाई देता तकिया ही बेहतर होता है।
15. मॉल्स में शॉपिंग के दौरान या किसी इवेंट या आयोजन में अधिक देर तक एक ही स्थिति में न खडे रहें। बीच-बीच में स्थिति बदलें। अगर देर तक खडे होकर काम करना पडे तो एक पैर को दूसरे पैर से छह इंच ऊपर किसी छोटे स्टूल पर रखना चाहिए।
16. अचानक झटके के साथ न उठें-बैठें।
17. देर तक ड्राइविंग करनी हो तो गर्दन और पीठ के लिए कुशंस रखें। ड्राइविंग सीट को कुछ आगे की ओर रखें, ताकि पीठ सीधी रहे।
18. दायें-बायें या पीछे देखने के लिए गर्दन को ज्यादा घुमाने के बजाय शरीर को घुमाएं।
19. पेट के बल या उलटे होकर न सोएं।
20. कमर झुका कर काम न करें। अपनी पीठ को हमेशा सीधा रखें।
स्लिप डिस्क के लिए एक्सरसाइज़

पेट को अंदर करें- स्लिप डिस्क की प्रॉब्लम होने पर पेट को अंदर करें। इसके लिए अंदर की तरफ सांस खीचें, इससे पेट पर जोर पड़ेगा और स्लिप डिस्क में राहत मिलेगी। ऐसा करने के लिए अपने पेट का सहारा न लें। पेट को अंदर तक घुसाने का प्रयास करें। ऐसा दिन में तीन बार जरूर करें और हर बार इस प्रक्रिया को 10 से 20 बार करें। शुरुआत में हल्का-सा दर्द होगा, लेकिन करने का प्रयास करें।

योगा आसन– ऐसे कई योगा आसन होते हैं जो स्लिप डिस्क में राहत दिलाते हैं। योगा आसन से पीठ की मांसपेशियों में आने वाले खिंचाव को सही करने में आसानी होती है। कई अच्छे और सरल योगा आसन होते हैं, जिनसे शरीर में दर्द भी नहीं होता है और रीढ़ की हड्डी में होने वाले दर्द में भी आराम मिलता है। आप इन्हें आसानी से घर पर भी कर सकते हैं।

स्कैवेट्स-स्लिप डिस्क के लिए स्कैवेट्स एक अच्छी एक्सरसाइज है। इससे दर्द में राहत मिलती है और शरीर भी फिट रहता है। ज्यादा वजन होने पर भी इससे आराम मिलता है। दोनों पैरों को आगे-पीछे करके हल्का- सा झुकें और शरीर को लूज छोड़ दें। ज्यादा प्रेशर न लगाएं। अगर बहुत ज्यादा दर्द हो, तो इस एक्सरसाइज को न करें।

आसान एक्सरसाइज़– किसी भी मरीज के द्वारा कठिनाई से होने वाली एक्सरसाइज करना मुश्किल होता है। लेकिन उनके द्वारा हल्की एक्सरसाइज आसानी से की जा सकती है, जैसे टहलना, दौडऩा, योगा, कसरत आदि। इन सभी तरीकों से आसानी से स्लिप डिस्?क दर्द से राहत मिल सकती है।

एरोबिक्स– स्लिप डिस्क के लिए एरोबिक्स सबसे अच्छी एक्सरसाइज़ है। इससे कार्डियो और स्ट्रेचिंग में दर्द चला जाता है। लेकिन इसे करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। खुद को ज़्यादा थकाएं नहीं। आराम से एक्सरसाइज़ करें।

स्लिप डिस्क और कमर दर्द में लाभदायक अर्धसेतुबन्धासन

पूल के रूप में जाने जाने वाले इस आसन से अनेक लाभ हैं। हालांकि यह आसन थोड़ा कठिन है। इसलिए कई बार इसे करने से पहले व्यक्ति को अन्य आसान से आसन करने की सलाह दी जाती है। यह आसन स्लिप डिस्क में बेहद कारगर माना जाता है। खासकर मीडिल एज के लोगों के लिए यह बेहतरीन है। इससे आगे किसी भी तरह की समस्या होने की संभावना कई गुना कम हो जाती है।

आसन परिचय

सेतु का अर्थ होता है पूल। सेतुबन्धासन से पहले अर्धसेतुबन्धासन करते हैं। इसमें व्यक्ति की आकृति एक सेतु के समान हो जाती है इसीलिए इसके नाम में सेतु जुड़ा हुआ है।

स्लिप डिस्क

सावधानियां

अर्धसेतुबन्धासन का सावधानीपूर्वक अभ्यास करें। किसी भी प्रकार का झटका न दें। संतुलन बनाए रखें। अगर आपकी कमर, हथेली और कलाई पर अत्यधिक भार आए तो पहले भुजंगासन, शलभासन और पूर्वोत्तानासन का अभ्यास एक-दो महीने तक करें। इसके बाद अर्धसेतुबन्धासन का अभ्यास आपके लिए आसान हो जाएगा। जिन्हें पहले से अधिक कमर-दर्द, स्लिप डिस्क या अल्सर की समस्या हो, वे अर्धसेतुबन्धासन का अभ्यास न करें।

आसन के लाभ
अर्धसेतुबन्धासन से चित्त एकाग्र होता है, जो चक्रासन नहीं कर सकते, वे इस आसन से लाभान्वित हो सकते हैं। स्लिप डिस्क, कमर, ग्रीवा-पीड़ा एवं उदर रोगों में विशेष लाभप्रद है यह आसन। यह आसन रीढ़ की सभी कशेरुकाओं को अपने सही स्थान पर स्थापित करने में सहायक है। ये आसन कमर दर्द को दूर करने में भी सहायक है। पेट के सभी अंग जैसे लीवर, पेनक्रियाज और आंतों में खिंचाव आता है। कब्ज की समस्या दूर होती है और भूख भी खुलकर लगती है।

यदि कोई रोगी ड्रग फ्री ट्रीटमेंट करवाना चाहता है तो HARYANA के पंचकूला में एक मित्र हैं जो ये काम करते हैं बहुत से मरीज उनकी थेरेपी से लाभ उठा चुके हैं यदि किसी को मिलना हो तो वो मेल केर के उनका नंबर और एड्रेस ले सकता है. वो CONTACT US के फार्म को बहर केर हमसे प्राप्त केर सकता है. थैंक्स.

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ARTICLE SOURCE :- http://kumarhealth.blogspot.in/http://slippeddisctreatments.com/http://www.sanjeevnitoday.com/

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