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सरवाइकल स्पॉन्डिलोसिस (cervical-spondylosis) क्या है? लक्षण व उपचार

सरवाइकल स्पॉन्डिलोसिस (cervical-spondylosis)

सरवाइकल स्पाॉन्डिलाइसिस (Cervical Spondylosis) या सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस गर्दन के आसपास के मेरुदंड की हड्डियों की असामान्य बढ़ोतरी और सर्विकल वर्टेब के बीच के कुशनों (इसे इंटरवर्टेबल डिस्क के नाम से भी जाना जाता है) में कैल्शियम का डी-जेनरेशन, बहिक्षेपण और अपने स्थान से सरकने की वजह से होता है। लगातार लंबे समय तक कंप्यूटर या लैपटॉप पर बैठे रहना, बेसिक या मोबाइल फोन पर गर्दन झुकाकर देर तक बात करना और फास्ट-फूड्स व जंक-फूड्स का सेवन, इस मर्ज के होने के कुछ प्रमुख कारण हैं।

सरवाइकल स्पान्डिलाइसिस है क्या ? (Cervical Spandilaisis what?)

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हमारे शरीर का आधार मेरुदण्ड अर्थात रीढ़ की हड्डी है जो तैतीस हड्डियां जिन्हे वर्टिब्रा या कशेरुका कहते हैं उससे जुड़कर बनी होती हैं | रीढ़ की हड्डी में कशेरुकाओं के आपसी जोड़ को इंटरवर्टिबल डिस्क कहते हैं जिससे रीढ़ की हड्डी में गति, हिलना – डुलना सम्भव हो जाता है | रीढ़ की हड्डी के अंदर से शरीर की सबसे महत्वपूर्ण नाड़ी सुषुम्ना नाड़ी या स्पाइनल कार्ड मस्तिष्क से लेकर नीचे तक जाती है और प्रत्येक वर्टिब्रा या कशेरुका से इसकी शाखाएं निकलती है जो शरीर के विभिन्न अंगों का नियंत्रण करती है| इस रोग की पुष्टि के लिए सरवाइकल स्पाइन लैट्रल व्यू का एक्सरे कराया जाता है यदि एक्सरे रिपोर्ट में सरवाइकल कशेरुकाओं के मध्य जगह कम हो जाती है जिससे सरवाइकल केनाल के आमने सामने का व्यास कम हो जाता है इससे इस रोग की पुष्टि हो जाती है अन्य आधुनिक जांचों में कांस्ट्रस्ट माइलोग्राम या एम. आर. आई. आदि है | गर्दन के क्षेत्र में रीढ़ की हड्डी की सात वर्टिब्रा या कशेरुका होती है इसे सरवाइकल रीजन वर्टिब्रा कहते हैं जब किसी भी कारण से सरवाइकल रीजन अर्थात गर्दन के क्षेत्र की कशेरुकाओं में विकृति आती हैं और उससे सुषुम्ना नाड़ी या उसकी शाखाएं दबने लगती हैं तो इसे सरवाइकल स्पान्डिलाइसिस कहते हैं |
सरवाइकल स्पान्डिलाइसिस रोग के लक्षण (Cervical disease symptoms Spandilaisis)

  • चक्कर आना (dizziness):-कुछ मरीजो को चक्कर आने की तकलीफ पैदा हो जाती है | ऐसे मरीजो को किसी भी तरह की शारीरिक position मे चक्कर आने लगते है | बैठकर उठते हुये अथवा सामने की ओर नीचे की तरफ झुकते हुये, सिर के दाये बाये या ऊपर नीचे घुमाते हुये, लेटने पर या लेट कर ऊठने पर , सोते समय करवट बदलने पर बैठे हुये या कोई काम करते हुये शरीर को इधर उधर झुकाते हुये , कहने का तात्पर्य यह कि किस position मे चक्कर आने लगे कुछ बताया नही जा स्कता है |

यह चक्कर की स्तिथि दो तीन सेक्न्ड से लेकर कई कई मिनट अथवा कई कई घन्टे तक बनी रहती है |मरीज को ऐसा लगता है कि धरती हिल रही है अथवा पलन्ग हिल रहा है अथवा वह हवा मे उड़ रहा है अथवा वह लुन्ज पुन्ज जैसी हालत मे पड़ा हुआ है | चक्कर की intensity level का पता नही चलता है |

  • दर्द होना (Pain) :
    बहुत से रोगियो को दर्द होता है | यह दर्द हलका भी हो सकता है और बहुत तेज किस्म का भी | सिर के एक छोटे से हिस्से मे दर्द हो सकता है और यह दर्द पूरे शरीर मे भी फैल स्कता है |
    ★बहुत से रोगियो को गरदन के पीछे किसी भी स्थान मे एक छोटे से हिस्से मे दर्द की अनुभूति होती है और वही तक सीमित होकर रह जाती है और इससे अधिक नही बढती है |
    कुछ रोगियो को गरदन के एक तरफ के हिस्से मे दर्द होता है और इस दर्द का फैलाव गरदन के दाहिनी तरफ के हिस्से की मान्सपेशियो तक जाता है |दर्द के साथ गरदन की माश्पेशियो मे अकड़न और जकड़्न हो जाती है | इससे गरदन का movement बहुत तकलीफ के साथ होता है |
    कुछ रोगियो को दरद गरदन की तरफ या गरदन से लेकर सीने की मान्श्पेशियो तथा CHEST MUSCLES तक होने लगता है | किसी किसी को दर्द chest की तरफ न होकर पीठ की तरफ होता है और पीठ की मान्शपेशियो मे दरद और अकड़न तथा जकड़न एकल या मिश्रित रूप मे हो जाती है | ऐसा दर्द कभी कभी गरदन से लेकर पूरी पीठ मे होने लगता है |
    किसी किसी कि गरदन मे दर्द न होकर दर्द कमर मे होने लगता है |इसे metastatic pain कहते है या remote pain कहते है |इस तरह का LUMBER REGION pain कभी कभी सरवाइकल के दर्द के कारण होने लगता है |
    किसी किसी को दर्द नीचे की ओर न जाकर सिर के ऊपरी हिस्से अथवा नाक की जड़ यानी साइनस की तरफ होने लगता है | यह दर्द ऐसा लगता है जैसे सिर दर्द हो गया है |
    किसी किसी रोगी को चेहरे की मान्श्पेशियो मे दर्द होने लगता है | यह दर्द neuralgic pain की तरह का होने लगता है |
  • मान्स पेशियो मे अकड़न और जकड़न (Stiffness and tightness in muscles):-
    किसी किसी रोगी को सिर और गर्दन घुमाने मे माशपेशियो की अकड़न और जकड़न होती है जिसके कारण गरदन के movement मे बाधा पैदा होती है | यह अकड़न और जकड़न पूरी पीठ और सीने मे जब पहुच जाती है तो सारा शरीर movement less होने लगता है |
  • सुन्न पन होना sensation of NUMBNESS :- बहुत से रोगियो के हाथ की उन्गलिया और ऊपर के हाथ सुन्न होने लगते है | एक य सभी उनगलिया इससे प्रभावित होती है |
    इस तरह का सुन्पन सिर और गरदन मे भी होता है |इन जगहो पर सुई चुभोने से भी कुछ दर्द नही होता है |
  • अजीब तरह के अनुभूति (sensation) :-
    बहुत से मरीजो मे अजीब तरह के अनुभूतिया होती है |इन अनुभूतियो मे किसी किसी को लगता है कि उसके सिर पर बर्फ जमा हो गयी है |किसी को महसूस होता है कि उसके सिर पर टोपी लगी हुई है | किसी को लगता है कि उसका सिर किसी खान्चे मे रख कर दबाया जा रहा है |
  • सम्मिलित तकलीफे MIXED SENSATIONS :-
    कुछ मरीज ऐसे होते है जिनको एक तरह की अनुभूति नही होती बल्कि कई तरह के sensations मालूम होते है | किसी किसी रोगी को दर्द के साथ अकड़न और एठन होती है |किसी को एठन के साथ सिर पर भारी बोझ लादने जैसा महसूस होता है |किसी किसी को दर्द के साथ सुन्न पन होने की शिकायत होती है |

(सरवाइकल स्पान्डिलाइसिस) गर्दन के दर्द को प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक करने के लिए उपचार (Cervical Spandilaisis to recover from the natural medicine neck pain treatment)

    1. गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सबसे पहले रोगी के गलत खान-पान के तरीकों को दूर करना चाहिए और फिर रोगी का उपचार करना चाहिए।
    2. इस रोग से पीड़ित रोगी को हमेशा पौष्टिक भोजन करना चाहिए। रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम का बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए ताकि हडि्डयों का विकास सही तरीके से हो सके और हडि्डयों में कोई रोग पैदा न हो सके।
    3. शरीर में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम मात्रा को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अपने भोजन में गाजर, नीबू, आंवला, मेथी, टमाटर, मूली आदि सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए। फलों में रोगी को संतरा, सेब, अंगूर, पपीता, मौसमी तथा चीकू का सेवन अधिक करना चाहिए।
    4. गर्दन में दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चोकरयुक्त रोटी व अंकुरित खाना देने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
    5. गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के ही एक भाग जल चिकित्सा का सहारा लिया जा सकता है। इस उपचार के द्वारा रोगी को स्टीमबाथ (भापस्नान) कराया जाता है और उसकी गर्दन पर गरम-पट्टी का सेंक करते है तथा इसके बाद रोगी को रीढ़ स्नान कराया जाता है जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी के शरीर में रक्त-संचालन (खून का प्रवाह) बढ़ जाता है और रोमकूपों द्वारा विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द तथा अकड़न होना दूर हो जाती है।
    6. गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए सूर्य किरणों द्वारा बनाए गए लाल व नारंगी जल का उपयोग करने से रोगी को बहुत अधिक फायदा होता है। सूर्य की किरणों में हडि्डयों को मजबूत करने के लिए विटामिन `डी` होता है। सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन `डी` को लेने के लिए रोगी को पेट के बल खुले स्थान पर जहां पर सूर्य की किरणें पड़ रही हो उस स्थान पर लेटना चाहिए। ताकि सूर्य की किरणें सीधी उसकी गर्दन व रीढ़ की हड्डी पर पड़े। इस क्रिया को करते समय सिर पर कोई कपड़ा रख लेना चाहिए ताकि सिर पर छाया रहें।
    7. गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी की गर्दन पर सरसों या तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। मालिश करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करनी चाहिए। मालिश यदि सूर्य की रोशनी के सामने करें तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
    8. ठंडी या गर्म सिकाई :- सरवाइकल स्पोंडिलोसिस (Cervical Spondylosis) की समस्‍या से पीड़ि‍त व्‍यक्ति गर्दन के आस-पास की मांसपेशियों में दर्द, कठोर और दर्दनाक महसूस करता है। लेकिन कोल्‍ड और हीट पैड का इस्‍तेमाल कर वह सूजन को कम, मांसपेशियों को आराम और दर्द से कुछ राहत प्राप्‍त कर सकता है।
    9. सरसों के तैल में लहसुन जला कर रख लें । सुबह- शाम मालिश करें । गर्दन पर ।
    10. गर्म पानी में नमक मिलाकर सिकाई करें । रेत की सिकाई या ईट की सिकाई की जा सकती है ।
    11. गाय का घी है फायदेमंद:- आयुर्वेद के अनुसार, गाय के घी में जोड़ों को लुब्रिकेट करने के गुण होते हैं। इसके अलावा, यह सरवाइकल स्पोंडिलोसिस (Cervical Spondylosis)के लिए जिम्मेदार वात तत्‍व को शांत करने के लिए भी जाना जाता है। साथ ही कब्‍ज इस समस्‍या को बढ़ाने वाले कारकों में से एक माना जाता है और गाय का घी नियमित रूप से मुलायम दस्‍त पारित करने में मदद करता है। इसलिए गाय का घी सरवाइकल स्पोंडिलोसिस ((Cervical Spondylosis) के लिए सबसे अच्‍छे घरेलू उपचारों में से एक माना जाता है।
    12. योगासन :- कुछ योग मुद्राएं जैसे लोट्स पोज (पद्मासन), स्टिक पोज (यष्टिकासन), पाम ट्री पोज (ताड़ासन) सर्वाइकल स्‍पोंडिलोसिस के दर्द को कम करने में बहुत मददगार होती हैं। इसलिए सरवाइकल स्‍पोंडिलोसिस ((Cervical Spondylosis) के दर्द और गर्दन के तनाव को कम करने के लिए इसे नियमित रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
  1. यौगिक उपचार :- सम्पूर्ण विश्व में अपने राष्ट्र को गौरव प्रदान करने वाली योग विद्या की कुछ क्रियाएँ सरवाइकल स्पान्डिलाइसिस के रोगी के लिए नवजीवन दायनी है | इस समस्या के निदान के लिए प्रतिदिन भुजंगासन, धनुरासन, नौकासन, शलभासन प्रत्येक आसन ३०-३० सेकेण्ड तक दो – दो बार करना चाहिए फिर बैठकर ग्रीवा शक्ति विकासक की क्रिया २-२ बार, स्कंध शक्ति विकासक, कर पृष्ठ शक्ति विकासक व करतल शक्ति विकासक की क्रियाएँ १-१ मिनट तक प्रारम्भ में करना चाहिए बाद में उष्ट्रासन, चक्रासन जैसे आसन करना चाहिए | आसनों का अभ्यास करते हुए श्वांस सामान्य रखें और आसनों द्वारा चिकित्सा किसी अनुभवी व दक्ष चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए तत्पश्चात १० मिनट तक शरीर को शिथिल छोड़कर शवासन का अभ्यास लाभप्रद है | पेड़ू पर २० मिनट मिटटी की पट्टी व १० मिनट तक कंधे गर्दन व पीठ में स्थानिक वास्प स्नान करने से इस दुखदाई रोग में पहले दिन ही लाभ मिलना शुरू हो जाता है और लम्बे समय से दुःख, कष्ट तकलीफ उठा रहा रोगी ४ से ८ हफ़्तों के कुल उपचार से स्पान्डिलाइसिस से पूरी तरह छुटकारा प्राप्त हो जाता हैं |

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