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श्रावण मास में क्या करें और क्या ना करें ?

श्रावण मास भगवान नीलकंठ को इतना प्रिय क्यों है ?

श्रावण मास एक ऐसा मास जिसमे हिन्दू धरम का कोई ही मनुष्य ऐसा होगा जो भगवान शिव को ना मानता हो श्रावण मास शिव भक्तों के लिए एक उत्साह लेकर आटा है श्रावण मास का हर दिन एक नहीं सोच और उमंग भरा होता है सारा भारत जय शिव शंकर , जय भोले, भोले र तेरी बम बम बम भोले, ओम नमः शिवाय आदि मंत्रों और उच्चारण से गूंज उठता है हर घर, मंदिर, गली, मोहल्ला में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना शुरु हो जाती है आप को हर जगह भगवान भोले के भक्त कोई कावढ़ ले कर आ रहा है कोई रुद्र्भिशेक कर रहा है कोई सुबह मंदिर जल चढाने जा रहा है कही शिव विवाह चल रहा है कहीं भगवान शिव के भक्त मिलकर यात्रा पर जा रहे हैं मतलब हर जगह शिव ही शिव

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास के शुरू होने के बाद पांचवां मास श्रावण मास का है। देवषयन का यह प्रथम चातुर्मास है। इस मास मे कथा भागवत और अनगिनत उत्सव मनाये जाते है। श्रावन मास के प्रत्येक सोमवार को श्रावन सोमवार कहा जाता है। श्रद्धालु पवित्र जल से शिवलिंग को स्नान कराते हैं। फूल, मालाओं से मूर्ति या शिवलिंग को पूजते हैं। मंदिर में 24 घंटे दीप जलते रहते हैं। उत्तर भारत के विभिन्न प्रान्तों से इस महीने शिवभक्त गंगाजल लेने.. यानी कांवड का पवित्र जल लेने हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी और गंगासागर की यात्रा पैदल करके श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को अपने क्षेत्र के शिवमन्दिर में शिवलिंग का अभिषेक करके पुण्य अर्जित करते हैं। कांवड लाकर रुद्राभिषेक करना बहुत ही कष्टसाध्य तप है जिसे देवगण, मानव, दानव सहित यक्ष किन्नर और साधुगण आदि काल से करते आ रहे हैं। शिव सभी के लिए वरदाता है जो जैसा मांगें उसे वैसी ही सम्पदा दे देते हैं।

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इस मास में लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ कराने का भी विधान है। श्रावणमास में जितने भी सोमवार पड़ते हैं, उन सब में शिवजी का व्रत किया जाता है। इस व्रत में प्रातः गंगा स्नान अथवा किसी पवित्र नदी या सरोवर में अथवा विधिपूर्वक घर पर ही स्नान करके शिवमन्दिर में जाकर स्थापित शिवलिंग या अपने घर में पार्थिव मूर्ति बनाकर यथाविधि षोडशोपचार-पूजन किया जाता है। यथासम्भव विद्वान ब्राह्मण से रुद्राभिषेक भी कराना चाहिए। शिवलिंग का रुद्राभिषेक भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. इन दिनों शिवलिंग पर गंगा जल द्वारा अभिषेक करने से भगवान शिव अतिप्रसन्न होते हैं.

शिवलिंग का अभिषेक महाफलदायी माना गया है. इन दिनों अनेक प्रकार से  शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है जो भिन्न भिन्न फलों को प्रदान करने वाला होता है. जैसे कि जल से वर्षा और शितलता कि प्राप्ति होती है. दूग्धा अभिषेक एवं घृत से अभिषेक करने पर योग्य संतान कि प्राप्ति होती है. ईख के रस से धन संपदा की प्राप्ति होती है. कुशोदक से समस्त व्याधि शांत होती है. दही से पशु धन की प्राप्ति होती है ओर शहद से शिवलिंग पर अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.

मनीषियों का कहना है कि समुद्र मंथन भी श्रावन मास में ही हुआ। इस मंथन में 14 प्रकार के तत्व निकले। इसमें जहर को छोड़ कर सभी 13 तत्वों को देवताओं और राक्षसों में वितरित किया गया।

इन सभी तत्वों में से निकले जहर को भगवान् शिव पी गये और इसे अपने कंठ में संग्रह कर लिया। इस प्रकार इनका नाम नील कंठ पड़ा। इसके बाद देवताओं ने भगवान शिव को जहर के संताप से बचाने के लिए उन्हें गंगा जल अर्पित किया। इसके बाद से ही शिव भक्त श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

श्रावण मास में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए क्या करें?

  1. श्रावन मास में रुद्राक्ष पहनना बहुत ही शुभ माना गया है। इसलिए पूरे मास रुद्राक्ष की माला धारण करें व रुद्राक्ष माला का जाप करें।
  2. शिव को भभूती लगावें। अपने मस्तक पर भी लगावें।
  3. शिव चालीसा और आरती का गायन करें।
  4. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  5. सोमवार को श्रद्धापूर्वक व्रत धारण करें. (यदि पूरे दिन का व्रत सम्भव न हो तो सूर्यास्त तक भी व्रत धारण किया जा सकता है)
  6. बेलपत्र, दूध, शहद और पानी से शिवलिंग का अभिषेक करें।
  7. अपशकुनों से बचनें के लिए नवविवाहित जोड़ों को मंगलागौरी व्रत धारण करना चाहिए।
  8. शुक्रवार को सुहागिन स्त्रियों को वरदलक्ष्मी व्रत (श्रावण शुक्रवार व्रत) धारण करना चाहिए।
  9. ओम नमः शिवाय या महाम्रतुन्जय मंत्र  का जप चलते, फिरते, उठते-बैठते करते रहना चाहिए।

विज्ञान और हम सब यह मानते हैं की सृष्टि तथा मानव शरीर पंच तत्वों के मिश्रण से बना है- अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश एवं जल। विधिवत सृष्टि संचालन तथा मानव शरीर संचालन के लिए इन तत्वों का संतुलन परम आवश्यक है। इन तत्वों के संतुलित रहने पर जिस प्रकार सृष्टि प्रसन्न रहती है उसी प्रकार, मनुष्य प्रसन्न तथा स्वस्थ/निरोगी रहता है। इन्हीं तत्वों के असंतुलित होने पर जिस प्रकार ज्वार-भाटा और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं उसी प्रकार मनुष्य रोगग्रस्त, चिड़चिड़ा, दुखों से पीड़ित एवं कांतिहीन हो जाता है।किसी भी एक तत्त्व की न्यूनता तथा अधिकता दोनों ही ख़राब है।

ये पांचों तत्व मूलत: ग्रहों, नक्षत्रों से ही नियन्त्रित रहते हैं. अतः अगर हम सामान्य भाषा में बात करें तो ग्रह ही हमारे शरीर को संचालित करते हैं तथा रोग भी उसी संचालन का एक अंग है।

ज्योतिष विज्ञान यह कहता है की अगर श्रावण के महीने में बाबा भोलेनाथ को विशेष रूप से प्रसन्न कर लिया जाए तो व्यक्ति इन पंचतत्वों तथा ग्रहों के असंतुलन के साथ साथ रोगों का भी निवारण कर सकता है।

भगवान शिव को कौन सी वस्तु अर्पण करनी चाहिये ?

हमारे पुराणों में बताया गया है कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं. ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र (शमीपत्र) का महत्व होता है.
श्रावण के सोमवार की सरल व्रत विधि के अनुसार भगवान महेशजी के साथ माता पार्वती, गणेशजी, और नंदी जी की पूजा होती है। विधि‍ विधान एवं पवित्र तन-मन से किए इन श्रावण सोमवार व्रतों से व्रती पुरुष का दुर्भाग्‍य भी सौभाग्‍य में परिवर्तित हो जाता है. यह व्रत मनो:वांछित धन, धान्‍य, स्‍त्री, पुत्र, बंधु-बांधव एवं स्‍थाई संपत्ति प्रदान करने वाला है. श्रावण मास के व्रत से महेश-पार्वती की कृपा व अभीष्‍ट सिद्धि-बुद्धि की प्राप्ति होती है.

शमी पत्र चढ़ाने का मंत्र 

                                        अमंगलानाम् शमनीम्  शमनीम् दुष्कृतानाम्  च।

                                         दुःस्वप्न-नाशिनीं  धन्यां प्रपद्येSहं शमीं शुभाम्।।

शिव पूजा से रोगों से मुक्ति कैसे पायें ?

  1. किसी भी रोग से पूर्णत: मुक्ति के लिये श्रावण मास के प्रथम सोमवर से प्रत्येक सोमवार को शिव जी को कपूर युक्त जल से अभिषेक करें. अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप करें.
  2. श्रावण मास में हर मंगलवार को शिव पूजा (विशेषतः रुद्राभिषेक तथा महामृत्युंजय का जप) करने से रोगों का जल्दी निवारण होता है। 
  3. श्रावण मास में हर गुरूवार को विशेष पूजा करने से आयु में वृद्धि होती है
  4. रोग निवारण हेतु महामृत्युंजय मंत्र जप करते हुए शहद से अभिषेक करने से रोग का नाश होता है
  5. कुशोदक जल से  अभिषेक  करने से असाध्य रोग शांत होते हैं
  6. भगवान शिव के मृत्यंजय मंत्र “ॐ जूं सः” के दस हजार जप करते हुए घी की धारा से शिवलिंग का अभिषेक किया जाए तो मधुमेह (डाइबिटीज) रोग दूर होता है.
  7. गाय के घी से  अभिषेक  करने से आरोग्य लाभ होता है
  8. जो व्यक्ति हरी दूर्वा  से भगवान शिव  का पूजन करता है  उसे दीर्घायु प्राप्त होती है
  9. लंबी या लाइलाज बीमारी से तंग हैं तो पंचमुखी शिवलिंग पर तीर्थ का जल अर्पित करने से रोगमुक्त होंगे।
  10. ज्वर(बुखार) से पीडि़त होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से तुरंत लाभ मिलता है।
  11. नपुंसक व्यक्ति अगर घी से भगवान शिव का अभिषेक करे व ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान हो जाता है और उसे पुरुषत्व की प्राप्ति होती है।

किसी अच्छे ज्योतिषी से अपनी कुंडली का विश्लेषण कराकर ये पता करे लें की आपके रोग का कारण कौन सा ग्रह है। उसके पश्च्यात उस ग्रह से सम्बन्धित तुला दान उस ग्रह के दिन/नक्षत्र वाले दिन करें। साथ में शिव रुद्राभिषेक करें तथा महामृत्युंजय जप का जप करें अथवा कराएं। रोग से अवश्य मुक्ति मिलेगी।रोग निवारण हेतु महामृत्युंजय मंत्र जप करते हुए शहद से अभिषेक करने से रोग का नाश होता है

श्रावण मास में क्या काम नहीं करने चाहिये ?

  1. श्रावण मास में ढूध का सेवन ना करें
  2. श्रावण मास में हरी पत्तेदार सब्जी और बैगन का सेवन ना करें
  3. श्रावण मास में भगवान शिव पर हल्दी ना चढ़ाएं
  4. श्रावण मास में किसी के साथ भी लड़ाई और गुस्सा ना करें
  5. श्रावण मास में मासांहार और संभोग से बचें

मेरा अपना मत है की श्रावण मास में अधिक वर्षा होने के कारण ढूध देने वाले जानवर जो चारा खाते हैं उससे उनका ढूध भी जहरीला हो जाता है जिस कारण श्रावण मास में भगवान शिव पर दूध चढाने की प्रथा है इसीलिए श्रावण मास में ढूध पीने की मनाही होती है ताकि उस ढूध को पे कर कोई बीमार ना हो और क्योंकि भगवान शिव को श्रावण मास में सभी जहरीला वस्तु चडाई जाती है तो ढूध भी इसी लिया चढ़ाया जाता है

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