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श्राद्ध पक्ष की अष्टमी पर होता है चमत्कार बरसता है सोना जानिए कैसे ?

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श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को होती है गज लक्ष्मी की पूजा

श्राद्ध पक्ष में यूं तो शुभ कार्य वर्जित होते हैं। नई वस्तुएं खरीदना, नए परिधान पहनना भी निषेध होता है। लेकिन इन 16 दिनों में अश्विन मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि अर्थात अष्टमी का दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है। श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को लक्ष्मी जी का वरदान प्राप्त है। यह दिन विशेष इसलिए भी है कि इस दिन सोना खरीदने का महत्व है। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष की अष्टमी के दिन यदि सोना खरीदा जाये तो यह आठ गुना बढ़ता है। साथ ही शादी की खरीदारी के लिए भी यह दिन उपयुक्त माना गया है। इस दिन हाथी पर सवार मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है।

गज लक्ष्मी कौन है जिनकी पूजा श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को होती है

गजलक्ष्मी यह लक्ष्मी का चार भुजाधारी स्वरूप है। नाम के मुताबिक ही यह गज यानी हाथी पर आठ कमल की पत्तियों के समान आकार वाले सिंहासन पर विराजित होती है। इनके दोनों ओर भी हाथी खड़े होते हैं। चार हाथों में कमल का फूल, अमृत कलश, बेल और शंख होता हैं। इनकी उपासना “संपत्ति और संतान” देने वाली मानी गई है।
गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। गज की सवारी करने के कारण यह उर्वरता तथा समृद्धि की देवी भी हैं। गज लक्ष्मी देवी को राजलक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इन्हीं की कृपा से राजाओं को धन वैभव और समृद्घि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कई चित्रों, मूर्तियों आदि में लक्ष्मी के स्वरूप पर जल वर्षा करते दो हाथी (नर, मादा) दिखाई देते हैं। ये हाथी ‘दिग्गज’ के आठ जोड़ों में से एक होते हैं, जो कि ब्रह्मांड के आठ कोनों पर स्थित रहकर आकाश को संभाले हुए हैं। ये लक्ष्मी के कृपापात्र हैं। गज अर्थात हाथी को शक्ति, श्री तथा राजसी वैभव से युक्त प्राणी माना गया है। गज को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है। इस तरह ये उर्वरता तथा समृद्धि की देवी लक्ष्मी के सहचर हैं। इनके साथ लक्ष्मी का स्वरूप गज लक्ष्मी नाम से जाना जाता है।

गज लक्ष्मी को प्रसन्न करने का मंत्र

“ॐ पहिनी पक्षनेत्री पक्षमना लक्ष्मी दाहिनी वाच्छा,
भूत-प्रेत सर्वशत्रु हारिणी दर्जन मोहिनी रिद्धि सिद्धि कुरु-कुरु-स्वाहा।”
इस मंत्र को पढ़कर गुगल, गोरोचन, छाल-छबीला, कपूर काचरी, चंदन चूरा मिलाकर भोजपत्र पर स्वास्तिक बनाएं। अष्टमी या शनिवार को लाल फल के साथ हल्दी व कुंकू से पूजन करें। यह मंत्र 108 बार पढ़ना है। इस प्रयोग से लक्ष्मी की अपार कृपा प्राप्त होगी। देखते ही देखते पैसा बारिश की तरह बरसेगा, आपके घर से आर्थिक संकट दूर होंगे। लेकिन मन, उद्देश्य, कर्म और पूजन की शुद्धता तथा पवित्रता अनिवार्य है। क्रोध, वैमनस्य, ईर्ष्या, जलन, नफरत और बेईमानी जैसे भावों से दूर रहना अति आवश्यक है। मन की सरलता से सारे तंत्र-मंत्र-यंत्र सिद्ध होते हैं।
“न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति:
भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।।”
इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश ‍है कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है। लक्ष्मी सूक्त का पाठ करें और मां लक्ष्मी से दिव्यता का आशीष प्राप्त करें। जय माँ लक्ष्मी…l
पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार लक्ष्मी को ‘श्री’ भी कहा गया है। कहते हैं भद्र स्त्री व पुरुषों के आगे श्री लगाने का प्रचलन इसी शब्द से शुरू हुआ। पर लक्ष्मी सिर्फ धन की देवी नहीं हैं।पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार जहां सत्व यानी आंतरिक शक्ति है, वहीं लक्ष्मी हैं। जिस पर उनकी कृपा दृष्टि होती है, वही धन्य, कुलीन, बुद्धिमान, शूर और विक्रांत है। ऋग्वेद में तो एक जगह “लक्ष्मी को भूमि की प्रिय सखी” कहा गया है। फिर आखिर लक्ष्मी धन की देवी कैसे बन गईं? :- लक्ष्मी “लक्ष्य” शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है “चिन्ह”। लेकिन किस चिन्ह विशेष से लक्ष्मी बनी है, यह अज्ञात है। पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार स्वस्तिक चिन्ह लक्ष्मी का ही प्रतीक है। लक्ष्मी की पूजा में आज भी स्वस्तिक चिन्ह बनाया जाता है। दिवाली के दिन व्यापारी अपने बही-खाते में स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर “शुभ-लाभ” लिखते हैं और उसकी पूजा करते हैं।

श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को गज लक्ष्मी पूजा विधि

 शाम के समय स्नान कर घर के देवालय में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर केसर मिले चन्दन से अष्टदल बनाकर उस पर चावल रख जल कलश रखें।

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कलश के पास हल्दी से कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। मिट्टी का हाथी बाजार से लाकर या घर में बना कर उसे स्वर्णाभूषणों से सजाएं। नया खरीदा सोना हाथी पर रखने से पूजा का विशेष लाभ मिलता है। श्रद्धानुसार चांदी या सोने का हाथी भी ला सकते हैं।

माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें। कमल के फूल से पूजन करें।

इसके अलावा सोने-चांदी के सिक्के, मिठाई, फल भी रखें।

इसके बाद माता लक्ष्मी के आठ रूपों की इन मंत्रों के साथ कुंकुम, अक्षत और फूल चढ़ाते हुए पूजा करें-

– ॐ आद्यलक्ष्म्यै नम:

– ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:

– ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:

– ॐ अमृतलक्ष्म्यै नम:

– ॐ कामलक्ष्म्यै नम:

– ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम:

– ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:

– ॐ योगलक्ष्म्यै नम:

इसके बाद धूप और घी के दीप से पूजा कर नैवेद्य या भोग लगाएं।

महालक्ष्मी जी की आरती करें।

श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को कौन से काम कर सकते हैं 

1. सोना, चांदी , तांबा आदि की खरीदारी की जा सकती है।

2. शादी के कपड़े की खरीदारी की जा सकती है।

3.शादी की बात चलाई जा सकती है तथा लड़का व लड़की को देखा जा सकता है।

4. जमीन संबंधित बात चलाई जा सकती है। प्रोपर्टी को देखने जा सकते हैं।

5. देव पूजन किया जा सकता है।

6. लोहे-लकड़ी , इलैक्ट्रोनिक्स का सामान खरीदा जा सकता है।

7. शौर्य कर्म और सौंदर्य कर्म किए जा सकते हैं अर्थात पुरुष बाल और दाड़ी कटवा सकते हैं तथा स्त्रियां ब्यूटी पार्लर जा सकती है

श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को ध्यान रखने योग्य बातें

महालक्ष्मी व्रत के दौरान शाकाहारी भोजन करें।

पान के पत्तों से सजे कलश में पानी भरकर मंदिर में रखें। कलश के ऊपर नारियल रखें।

कलश के चारों तरफ लाल धागा बांधे और कलश को लाल कपड़े से अच्छी तरह से सजाएं।  कलश पर कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। स्वास्तिक बनाने से जीवन में पवित्रता और समृद्धि आती है।

कलश में चावल और सिक्के डालें। इसके बाद इस कलश को महालक्ष्मी के पूजास्थल पर रखें।

कलश के पास हल्दी से कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। मिट्टी का हाथी बाजार से लाकर या घर में बना कर उसे स्वर्णाभूषणों से सजाएं। नया खरीदा सोना, हाथी पर रखने से पूजा का विशेष लाभ मिलता है।

माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें। कमल के फूल से पूजन करें।

सोने-चांदी के सिक्के, मिठाई व फल भी रखें। इसके बाद माता लक्ष्मी के आठ रूपों की इन मंत्रों के साथ कुंकुम, चावल और फूल चढ़ाते हुए पूजा करें।

इन आठ रूपों में मां लक्ष्मी की पूजा करें- श्री धन लक्ष्मी मां, श्री गज लक्ष्मी मां, श्री वीर लक्ष्मी मां, श्री ऐश्वर्या लक्ष्मी मां, श्री विजय लक्ष्मी मां, श्री आदि लक्ष्मी मां, श्री धान्य लक्ष्मी मां और श्री संतान लक्ष्मी मां।

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