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विपरीतकरणी मुद्रा से आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ

विपरीतकरणी मुद्रा (VIPRITKARANI MUDRA)

विपरीतकरणी मुद्रा में पैर उपर एवं सिर नीचे अर्थात शरीर की विपरीत स्थिति होने से इसे विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं |इस मुद्रा को सर्वांगासन की पूर्व स्थिति भी कहा जाता है |

अथ विपरीतकरणीमुद्राकथनम्।
नाभिमूलेवसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः। अमृतं ग्रसते मृत्युस्ततो मृत्युवशो नरः ॥३३॥
ऊर्ध्वं च जायते सूर्यश्चन्द्रं च अध आनयेत्। विपरीतकरीमुद्रा सर्वतन्त्रेषुगोपिता ॥३४॥
भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मा समाहितः। ऊर्ध्वपादः स्थिरोभूत्वा विपरीतकरीमता ॥३५॥

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अथ विपरीतकरणीमुद्राकथनम्।
मुद्रेयं साधिता नित्यं जरा मृत्युं च नाशयेत्। स सिद्धः सर्वलोकेषु प्रलयेऽपि न सीदति ॥३६॥

विपरीतकरणी मुद्रा करने की विधि : 

जमीन पर चटाई या कम्बल बिछाकर सीधे लेट जाएँ, दोनों हाथ शरीर से सटे हुए एवं पैर के पंजे आपस में मिले रहें |

  1. सर्वांगासन की तरह पैरों को धीरे से क्रमशः 30 डिग्री,60-90 डिग्री तक उठा लें |
  2. हाथों को जमीन पर दबाते हुए पैरों को पीछे 120 डिग्री तक ले जाएँ |दोनों हाथों से कमर व नितम्ब को सहारा दें एवं पैरों को सीधा करें |
  3. अपना ध्यान गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के बीच वाले स्थान (Perineum)पर केन्द्रित करें एवं नितम्बों को सिकोड़ते हुए गुदा द्वार को संकुचित (मूलबन्ध)करें तथा अपनी जिह्वा को अंदर की तरफ मोड़कर तालू में लगा दें | श्वास सामान्य रूप से चलती रहे |
  4. आराम से जितनी देर इस मुद्रा में रह सकते हैं,उतनी देर रहें तत्पश्चात मूलबन्ध को खोलकर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएँ |

सावधानियां :

उच्चरक्तचाप एवं कमर दर्द  की अवस्था में विपरीतकरणी मुद्रा नही करनी चाहिए |

  • विपरीतकरणी मुद्रा करते समय यदि गले में कड़वा सा रस महसूस हो तो तत्काल इस मुद्रा को बंद कर सामान्य अवस्था में आ जाएँ एवं कुछ देर शवासन की अवस्था में लेटे रहें |
  • जो व्यक्ति शरीर का वजन अधिक होने के कारण इस मुद्रा को नही कर सकते वे प्रारंभ में पैरों की तरफ कोई ऊँची चीज जैसे स्टूल आदि रखकर दोनों पैर उस पर टिका सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 

  1. विपरीतकरणी मुद्रा का अभ्यास प्रातः खाली पेट या सायं जब भोजन करे कम से कम 4 घंटे हो चुके हो तब करना चाहिए |
  2. इस मुद्रा को प्रारंभ में 30 सेकंड से करके धीरे-धीरे लगभग 1 घंटे तक किया जा सकता है।

मुद्रा के चिकित्सकीय लाभ : 

  1. विपरीतकरणी मुद्रा बबासीर एवं यौन रोगों को नष्ट करती है |
  2. हठयोग के अनुसार विपरीतकरणी मुद्रा शरीर के ताप को सन्तुलित कर समस्त आधि-व्याधि का नाश करती है |
  3. यह जठराग्नि को प्रदीप्त कर पाचन संस्थान को सबल बनाती है तथा शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है |
  4. विपरीतकरणी मुद्रा के अभ्यास से चेहरे पर कान्ति बढ़ती है एवं बुढ़ापा व अकाल मृत्यु नही सताती है |
  5. इस मुद्रा के अभ्यास से स्त्रियों के मासिकधर्म संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं | यह मुद्रा बांझपन दूर करने में भी सहायक है।
  6. विपरीतकरणी मुद्रा के नियमित अभ्यास से गले के समस्त रोगों से छुटकारा मिल जाता है, एवं पैरों की थकान भी दूर होती है |
  7. इस मुद्रा से मष्तिस्क में रक्त की आपूर्ति होती है जिससे सिरदर्द,असमय बाल सफेद होना जैसे रोग नष्ट हो जाते हैं | यह स्मरण शक्ति को भी बढ़ाती है |

आध्यात्मिक लाभ : 

      1. हठयोग के अनुसार मनुष्य के तालुमूल में चन्द्रनाड़ी एवं नाभिमूल सूर्य नाड़ी स्थित है | सामान्य रूप से जब सहस्रार चक्र से चन्द्रामृत का प्रवाह होता है तो वह नाभि मूल में पहुंचकर सूर्य नाड़ी के ताप से नष्ट हो जाता है | विपरीतकरणी मुद्रा में यह अमृत तालुमूल में सुरक्षित रहता है,यदि यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रहे तो शरीर अमरता तक भी प्राप्त कर सकता है |
      2. विपरीतकरणी मुद्रा का कुण्डलिनी जागरण करने में महत्वपूर्ण स्थान है |

Article Source ;- http://returnwithnature.blogspot.in/

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