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लीवर :- Do not ignore the inflammation of the liver

लीवर की सूजन के कारण, लक्षण और उपचार 

लीवर की शरीर का सबसे जटिल अंग कह सकते हैं । शरीर के पाचन तंत्र का काम लीवर के हिस्से में आता है । लीवर के बिना जिंदगी किसी काम की नहीं हम जो कुछ भी खाते पीते हैं वो सब लीवर से होकर गुजरता है । यदि आप अपनी दिनचर्या, खान पान पर ध्यान नहीं देते तो आप कभी भी मुसीबत में पड़ सकते हैं । लीवर का सारा दिन बहुत ही पेचीदा काम करने पड़ते हैं जैसे

  • संक्रमणों और बीमारियों से लड़ना।
  • रक्त शर्करा को नियमित करना।
  • शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालना।
  • कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करना।
  • रक्त के थक्के (अधिक मोटा/गाढ़ा करना) में सहायता करना।
  • पित्त निकालना (तरल पाचन तंत्र और वसा को तोड़ने में सहायता करता हैं)।

लीवर में एक खास बात होती है वो ये की वो कभी भी इतनी जल्दी नहीं थकता वो हर संभव पर्यास करता है की ज़िन्दगी की गड्डी चलती रहे । यही कारण है की लीवर की छोटी मोटी बीमारी डॉक्टर की भी पकड़ में नहीं आती हां कुछ लक्षण है जिन से आप आईडिया लगा सकते हैं की लीवर को नुक्सान पहुँचाना शुरु हो गया है । जैसे पीलिया होना, खाना खाने का मन ना करना, लगातार वजन कम होना आदि लीवर की कुछ बिमारियों को निचे दिया गया है ध्यानपूर्वक पढ़े ;-

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लीवर (जिगर) की होने वाली बीमारियां 

1. विषाणुज हैपेटाइटिस (Viral Hepatitis) – हेपेटाइटिस एक ऐसा विकार है । इससे संक्रमित रोगी के लिवर में सूजन आ जाती है। यह आमतौर पर हेपेटाइटिस नामक वायरस से फैलता है । यह मुख्यतः पाँच प्रकार के होते है जिसे A,B,C,D,E के नाम से जानते है  ।
Hepatitis A और E को आम बोलचाल की भाषा में जोडिंस और पीलिया कहा जाता है । आमतौर पर इसका संक्रमण दूषित पानी और दूषित भोजन के सेवन से होता है । Hepatitis C, और D आमतौर पर संक्रमित व्यक्ति के मूत्र,खून अथवा अन्य द्रवय पदार्थों के संपर्क में आने से होता है । और Hepatitis B का संक्रमण संक्रमित व्यक्ति के साथ शारीरिक संसर्ग से फैलता है । इसके अलावा इससे संक्रमित माँ से होने वाले बच्चो को भी हो सकता है ।

2. जोडिंस/पीलिया (Yellow Fever/Jaundice) – जिगर (Liver) के बीमार होने के कारण रोगी को पीलिया होता है । सामान्यत: रक्तरस में पित्तरंजक (Billrubin) का स्तर 1.0 प्रतिशत या इससे कम होता है, किंतु जब इसकी मात्रा 2.5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब जोडिंस/पीलिया के लक्षण प्रकट होते हैं । इसमें उसकी त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है । इसी कारण इस बुखार को पीलिया कहते है । Jaundice में अक्सर मरीजों को तेज बुखार होता और शरीर पीला पड़ जाता है। इस रोग का कारक एक सूक्ष्म विषाणु (Flavivirus) है, जिसका संवहन एडीस ईजिप्टिआई (Aedes Aegypti) जाति के मच्छरों द्वारा होता है ।

3. ऑटोइम्यून डिस्ऑर्डर (Autoimmune Disorder) – यह रोग अधिकतर महिलाओं में पाया जाता है। इसके संक्रमण से शरीर के तंत्रिका तंत्र,कोशिकाओं और उतकों को नुकसान पहुचता है । इस रोग के दौरान लीवर पर भी असर पड़ता है और लीवर का कार्य-क्षमता घटती है ।

4. लीवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) :- Liver Cirrhosis धीमी गति से बढ़ने वाली लीवर की बीमारी है ।जिससे संक्रमित व्यक्ति का लिवर में लिवर अपने वास्तविक आकार में न रहकर सिकुड़ने लगता है और लचीलापन खोकर कठोर हो जाता है। । इस रोग से ग्रसित मनुष्य के Liver की कोशिकाएं बडे पैमाने पर नष्ट हो जाती हैं और उनके स्थान पर फाइबर तंतुओं का निर्माण हो जाता है । जो कि स्वस्थ लीवर के उत्तको को क्षतिग्रस्त कर देता है, और इससे लीवर की कार्यप्रणाली में दिक्कते पैदा हो जाती है. ये स्कार उत्तक रक्त प्रवाह को रोक देते हैं तथा पोषण और हार्मोन की प्रक्रियाओं को धीमा कर देते हैं. साथ ही ये प्रोटीन सहित लीवर द्वारा अन्य स्रावित हार्मोन की प्रक्रिया को धीमा या प्रभावित करता है.

5. फैटी लिवर (Fatty Liver) :- लिवर में वसा यानि fat के अधिक जमाव से उत्पन होने वाला संक्रमण ही फैटी लिवर कहलाता है । यह भी लिवर सिरोसिस की तरह ही लिवर की एक खतरनाक संक्रमण है । वसायुक्त भोजन करने, अनियमित दिनचर्या जैसे व्यायाम न करना, तनाव, मोटापा, शराब का सेवन या किसी बीमारी के कारण लंबे समय तक दवाइयां लेने से फैटी लिवर की समस्या हो सकती है।

6. लिवर फेल्योर(Liver Failure) :- लिवर से संबधित किसी भी बीमारी की समस्या यदि लंबे समय तक चले या उसका ठीक से इलाज न हो तो इसमें अवरोध उत्पन होने लगता है और यह अंग काम करना बंद कर देता है जिसे लिवर फेल्योर कहते हैं। यह समस्या दो तरीके की होती है। पहली एक्यूट लिवर फेल्योर, जिसमें मलेरिया, टायफॉइड, हेपेटाइटिस- ए, बी, सी, डी व ई जैसे वायरल, बैक्टीरियल या फिर किसी अन्य रोग से अचानक हुए संक्रमण से लिवर की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। दूसरा, क्रोनिक लिवर फेल्योर है जो लंबे समय तक LIver से जुड़ी बीमारी के कारण होता है। इन दोनों अवस्थाओं में लिवर ट्रांसप्लांट से स्थायी इलाज होता है।

7. लीवर/यकृत कैंसर (Liver Cancer/Hepatic cancer) यह सबसे घातक रोग है । जो की अमूमन बहुत कम ही देखने को मिलता है । लिवर या यकृत कैंसर लीवर की कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि से उत्पन होने वाला रोग है । मानव शरीर अपनी आवश्यकता अनुसार ही नई कोशिकाओं का निर्माण करता है जब कुछ कोशिकाओं का एक ऐसा समूह जो कि अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है । उनकी बढ़त नियंत्रित नहीं होती है। इसी अवस्था को ही Liver Cancer कहते है । ये कोशिकाएं दो प्रकार की होती है जिसमें पहला बिनाइन ट्यूमर (Benign Tumour) और दूसरा मेलिगनेन्ट ट्यूमर (Malignant Tumour) कहा जाता है। जब मेलिगनेन्ट ट्यूमर असीमित तरीके से बढ़ने लगती है और मानवीय शरीर को प्रभावित करने लगता है और साथ ही साथ  अपने पास के सामान्य ऊतकों (Tissues) को नष्ट करने लगती है इस संक्रमण को Liver Cancer के नाम से हम जानते है ।

8. लिवर एबसेस (Liver Abscess) – Liver Abscess को आम बोल चाल के भाषा में जिगर का फोड़ा कहते है ,इससे संक्रमित रोगी के जिगर में सिकुड़न पैदा होती है और फिर उसमें फोड़ा निकल आता है। Liver में उत्पन्न होने वाला यह फोड़ा जब पक जाता है तो रोग सांघातिक हो जाता है। इसके बाद ऑपरेशन करने की नौबत आ जाती है लेकिन अधिकतर देखा गया है इस रोग से पीड़ित रोगी का ऑपरेशन करने पर अधिकतर रोगियों की मृत्यु हो जाती है। जिगर में घाव होने से इससे निकलने वाला दूषित द्रव खून में मिलकर खून को गन्दा कर देता है, जिससे शरीर कमजोर और रोगग्रस्त हो जाता है।

लिवर फक्शन टेस्ट : – यदि आप ड्रग लेते हैं, ज्यादा शराब पीते हैं, अनसेफ सेक्सुअल एक्टिव हो, दिमाग व टीबी के मर्ज की दवा लेते हो, फैमिली में किसी को लिवर की डिसीज हो तो आपको लिवर फक्शन टेस्ट करवाना चाहिए। यह टेस्ट मात्र 100 रुपये में होता है। यह टेस्ट लीवर की क्षमता बताता है। इसके अलावा फैटी लीवर के लिए अल्ट्रासाउंड भी होता है।

लीवर की शुद्धता के लिए सुझाव

  • लहसुन, अंगूर, गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियां, सेब और अखरोट खाएं।
  • जैतून का तेल और सन के बीजों का उपयोग करें।
  • नींबू और नीबू का रस तथा हरी चाय का उपयोग करें।
  • वैकल्पिक अनाज (मोटा अनाज़, बाजरा और कूटू) को प्राथमिकता दें।
  • हरी पत्तेदार सब्जियों (बंद गोभी, ब्रोकोली और गोभी) को शामिल करें।
  • आहार में हल्दी का उपयोग करें।
  • सभी खाद्य समूहों के आहारों जैसे अनाज, प्रोटीन, दुग्ध उत्पादों, फल, सब्जियों और वसा का उपयोग करें।
  • रेशायुक्त ताजे फलों, सब्जियों, मिश्रित अनाज युक्त रोटियों, चावल और अनाजों का उपयोग करें।

शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि एंटीऑक्सीडेंट की अद्वितीय और विविध रचना पॉलीफिनॉल अंगूर यानी Grapes में मौजूद होता है। यह शरीर में वसा का प्रतिशत, आंत और त्वचा के अंदर स्थित वसा तथा लीवर में सूजन कम कर ग्लूकोज सहनशीलता को बेहतर करता है।

लीवर को ठीक रखने के आयुर्वेदिक व घरेलू उपचार :-

1. पाचन क्रिया को ठीक रखने के लिए गिलोय का 20 मिलीलीटर रस + आंवले व एलोवीरा ( ग्वारपाठे ) का 10 – 10 मिलीलीटर रस मिलाकर दिन में दो बार लें

2. यदि लीवर में सूजन है तो मकोय के पत्ते + सफेद पुनर्नवा में हल्दी + काली मिर्च + धनिया व हल्का सेंधा नमक मिला सब्जी बना खाएं, बहुत लाभ मिलेगा

3. 15 मिलीलीटर ताजा गिलोय के रस में 20 – 25 किशमिश कूट मिला कर पीएं, इससे उल्टी – पेट में जलन की समस्या से आराम मिलता है

4. यदि लीवर की समस्या अधिक है तो मूली के पत्ते – चुकंदर के पत्ते व पालक ( तीनों 250 ग्राम मात्रा में ) या दानामेथी के पत्तों के रस में 50 ग्राम चीनी व एक चम्मच नमक मिलाकर खाने से खून की कमी दूर होती है

5. तुलसी के पत्तों का एक चम्मच पेस्ट तैयार कर 200 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में मिला पीना भी इस रोग में लाभकारी है

6.मूली के ताजे पत्ते खून व लीवर से अधिक बिलरुबीन ( तरल जिसे लीवर बनाता है ) निकालने में सक्षम होते हैं – इसके पत्तों को पीस कर 15 – 20 मिलीलीटर रस दिन में दो बार पीने से पाचनक्रिया में सुधार आता है

फेट्टी लीवर क्या है?

लीवर में सामान्य कोशिकाओं की अपेक्षा चर्बी-कोशिकाओं का पाया जाना ही ‘फेट्टी-लीवर’ कहलाता है ,अर्थात सामान्य यकृत उतकों के बीच के रिक्त स्थान को ये ‘फेट्टी-लीवर’ कोशिकाएं कब्जा लेती हैं जिस कारण कोशिकाओं के समूह उतकों में काफी फैलाव एवं भारीपन उत्पन्न हो जाता है I

‘फेट्टी-लीवर’ के कारण क्या है ?

लीवर में उत्पन्न इस असामान्य स्थिति के दो प्रमुख कारण हैं :-
1.एल्कोहलिक
2.नान -एल्कोहलिक

अक्सर जो लोग सामान्य या अधिक मात्रा में निरंतर शराब का सेवन करते है वे कालांतर में ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज से पीड़ित हो सकते है इसके अलावा एल्कोहलिक लीवर डिजीज माता-पिता से भी बच्चों में आ सकती है I

इसके अलावा हीपेटाईटिस-सी,आयरन ओवरलोड ,मोटापा एवं खान पान की गड़बड़ी भी इसका कारण बन सकती है I

आज की परिस्थितयों में नान-एल्कोहलिक ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज जिसे ‘एनएएफएलडी’ भी कहा जाता है लीवर सम्बन्धी परेशानियों का बड़ा कारण है I यह तब तक एक सामान्य अवस्था है जबतक कि यह बढकर लीवर में सूजन उत्पन्न कर कोशिकाओं को नष्ट न कर दे !
अर्थात ‘फेट्टी-लीवर’ से पीड़ित लोगों में सामान्य या अधिक मात्रा में शराब का सेवन लीवर के लिए घातक हो सकता है I इस कारण लीवर का साइज सामान्य से बड़ा हो सकता है तथा लीवर की सामान्य कोशिकाओं का स्थान डेमेज्ड कोशिकाएं ले सकती हैं जो आगे चलकर लीवर सिरोसिस,लीवर फेलियर ,लीवर कैंसर या लीवर के बीमार होने के कारण होने वाली मृत्यु का कारण बन सकता है I

नान-एल्कोहलिक ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज के कारण क्या है ?

-कुछ परिवारों में आनुवांशिक रूप से देखा जाता है और कोई स्पष्ट कारण नजर नहीं आता है हां मध्य आयु वर्ग या मोटे लोगों में अचानक इसकी पहचान हो जाती है I

-अत्यधिक दवाओं के सेवन ,वायरल हीपेटायटिस,अचानक वजन कम होने एवं कुपोषण के कारण भी यह उत्पन्न हो सकता है I

-हाल के कुछ अध्ययन अनुसार आँतों में कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं की वृद्धि भी नान-एल्कोहलिक ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज का कारण बन सकती है I

किन लक्षणों से हम इसे पहचान सकते है :

प्रारम्भिक अवस्था में इसमें कोई ख़ास लक्षण उत्पन्न नहीं होते है ,हाँ कभी-कभी पेट की दाहिनी और एक हल्का दर्द महसूस होता है ,जो लीवर में फेट् की वृद्धि के कारण उत्पन्न होता है कालांतर में यह बढ़ते हुए लीवर सिरोसिस की स्थिति उत्पन्न कर देता है जिसे फूले हुए पेट, त्वचा में खुजलाहट, उल्टी, भ्रम , मांसपेशियों में कमजोरी एवं आँखों में उत्पन्न पीलापन से पहचाना जा सकता है I

कैसे बचें फेट्टी-लीवर’ डीजीज से और इसके चिकित्सा क्या है ?

-जैसे यह डायग्नोजड हो वैसे ही तत्काल शराब का सेवन बंद कर देना चाहिए I

-नान-एल्कोहलिक ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज की कोई विशेष चिकित्सा उपलब्ध नहीं है ,जीवनशैली में परिवर्तन लाकर,मोटापा एवं वजन कम कर तथा दैनिक व्यायाम को बढ़ा कर इस स्थिति पर काबू पाया जा सकता है I

अतः निम्न विन्दुओं पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए :-
*वजन कम करना
*हेल्दी डायट का चयन
*शरीर को नियमित व्यायाम के माध्यम से सक्रिय रखना
*डायबीटीज को नियंत्रित रखना
*शरीर में कोलेस्टेरोल की मात्रा को नियंत्रित रखना

‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज और आयुर्वेदिक चिकित्सा :

लीवर से सम्बंधित समस्याओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा एक बेहतर विकल्प है,आयुर्वेदिक् चिकित्सा में अनेक ऐसी औषधियां उपलब्ध हैं जिनका यकृत पर प्रोटेक्टिव प्रभाव देखा जाता है I

ऐसी ही कुछ औषधियां निम्न हैं -यकृतप्लिहान्तक चूर्ण जो भूमि आमल की, कुटकी, पुनर्नवा, मकोय , कालमेघ, कासनी, पुनर्नवा, शर्पुन्खा, भृंगराज जैसी वनस्पतियों का मिश्रंण बेहतरीन मिश्रण है यह लीवर को प्रोटेक्ट करने के साथ-साथ लीवर सिरोसिस एवं एल्कोहलिक लीवर डीजीज में भी बेहतरीन प्रभाव देता है I

-पुनर्नवा-मंडूर भी ‘फेट्टी-लीवर’ डीजीज में एक बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधि के रूप में कार्य करता है, इसमें गौमूत्र, त्रिवृत, पुनर्नवा, शुंठी, पिप्पली, मरीच, विडंग, देवदारू, चित्रकमूल , पुष्करमूल, हरीतकी, विभितकी, आमलकी, दारूहरिद्रा, हरिद्रा, दंतीमूल, चव्य , इन्द्रयव् , पिप्पलीमूल, मुस्तक आदि औषधियों का प्रयोग होता है I

आरोग्यवर्धिनीवटी, फेट्टी-लीवर’ डीजीज में प्रयुक्त होनेवाला एक प्रचलित शास्त्रीय योग है यह लीवर से टाकसिंस को बाहर निकालकर इसे स्वस्थ रखता है I यह कुटकी शुद्ध पारद ,शुद्ध गंधक, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, ताम्र भस्म , हरीतकी, विभितकी, आमलकी, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध गुगुलू एवं चित्रक मूल इन सभी के संयोग से बना एक विशिष्ट योग है जो लीवर से अतिरिक्त फेट को बाहर निकाल देता है तथा इसकी क्रियाशीलता को बढाता है I

अपने लीवर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं। स्वस्थ और संतुलित आहार का उपयोग करें तथा अपने लीवर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें।

अल्कोहल, धूम्रपान और ड्रग्स को “न” बोलें : लीवर कोशिकाओं को अल्कोहल धूम्रपान और ड्रग्स नुकसान अथवा नष्ट कर देता हैं। यहाँ तक कि निष्क्रिय धूम्रपान के संपर्क में भी नहीं आना चाहिए।

नोट : – किसी भी दवा को शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें, आजकल लिवर से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसा शराब और बिगड़ते लाइफस्टाइल की वजह से हो रहा है। यदि लीवर खराब हो जाए तो ट्रांसप्लांट के अलावा कोई इलाज नहीं है, जो काफी खर्चीला है।

आप सभी के स्वास्थ्य की मंगलकामनाओं के साथ !
नोट :उपरोक्त जानकारी जनसामान्य को लीवर डीजीज के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से दी गयी है,किसी भी प्रकार की औषधि का प्रयोग चिकित्सक के निर्देशन में ही किया जाना चाहिए I

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