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रीढ की हड्डी :- गर्दन कंधे पीठ व घुटनों में दर्द का प्रमुख कारण

रीढ की हड्डी (spine) कैसे काम करती है ? How the spine works ?

रीढ की हड्डी (spine) से ही हमारा शरीर चलता है और काम करता है। रीढ की हड्डी (spine) human spine सिर के पिछले भाग सिर से शुरू होकर नितम्ब तक एक श्रृंखला के रूप में जाती है। रीढ की हड्डी (spine) अलग-अलग प्रकार के मनकों से बनती है और उन मनकों के बीच में डिस्क होती है और मनकों के दोनों तरफ और बीच में नस होती है। एक वयस्क व्यक्ति (human spine) के शरीर में रीढ की हड्डी (spine) की लम्बाई लगभग 60-70 सेंटीमीटर होती है और इसमें मोहरों जैसी 33 हड्डियाँ अलग-अलग तथा गति वाली तथा शेष नौ आपस में मिलकर सैक्रम तथा कौक्सिक्स का भाग बनाती है।

अगर हमारे मनकों में कोई भी तकलीफ होती है तो उसका सारा असर डिस्क और (Vein)नस पर पढ़ता है। जिसके कारण मरीज की गर्दन, कमर और घुटनों में दर्द रहने लगता है और (Vein)नस की वजह से यह दर्द बाजुओं, घुटनों और टांगों में जाने लगता है। ज्यादातर यह तकलीफ कमर के नीचे वाले हिस्से में होती है और दर्द टांग में निकलता है जिसको हम सिकाटिका का दर्द कहते हैं। जो कि नस (Vein) के दबने की वजह से होती है और मरीज के पैर और टांग सुन्न भी रहने लगती है अगर समय पर इलाज़ न लिया जाये तो यह तकलीफ धीरे-धीरे बढऩे लगती है और मरीज का चलना, फिरना और खड़े रहना भी मुश्किल हो जाता है।

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इस नस (Vein) के दबने का पता एमआरआई से लगता है। इससे पता चलता है कि नस (Vein) कितनी और कहां से दबी है, जिसके अनुसार उसका इलाज करना है अगर मरीज की नस (Vein) हलकी सी दबी है तो वह दवाईयां और कुछ इंजैक्शन से ठीक हो सकती है, अगर मरीज की नस (Vein)ें बहुत ज्यादा और बहुत समय से दबी है तो उसकी टांगों के कमजोरी का खतरा बना रहता है।

गर्दन के भाग में 7 वरट्रीबा (Vrtryba), पीठ के ऊपरी भाग में 12 वरट्रीबा (Vrtryba) और पीठ के बिल्कुल निचले भाग में नितम्ब वाले स्थान पर 5 सैक्रम की तथा 4 कोक्सिजियल हड्डियाँ होती है। रीढ की हड्डी (spine) सीधी नही होती अपितु इसमें चार वक्र होते है।

रीढ की हड्डी (spine) हमारे शरीर का मुख्य आधार है। सिर की हड्डियाँ का सारा बोझ इसी के सहारे टिका होता है। छाती के  पिंजर की सारी पसलियां जो गिनती में 12 जोड़ है, रीढ़ की हड्डी के थोरेसक वरट्रीबा (Vrtryba) से जुड़ी होती है। रीढ की हड्डी (spine) को लचक प्रदान करती है। इसी के कारण हम दाएँ, बाएँ नीचे आसानी से झुक सकते है, ऊपर की ओर सिर उठाकर देख सकते है। और प्रत्येक कार्य को गति के साथ कर सकते है। इसके अतिक्ति केन्द्रीय वात संस्थान का मुख्य भाग मेरूरज्जु (Spinal cord) रीढ की हड्डी (spine) में ही स्थित होता है।

मेरूरज्जु (Spinal cord) से थोडी-थोडी दूरी पर 31 वात नाड़ियों के जोडे निकलते है। वात संस्थान शरीर में समस्त संस्थानों एवं अंगो का नियन्त्रण करता है। पीठ की सारी मांसपेशियों का ताना-बाना भी रीढ की हड्डी (spine) के सहारे ही बुना हुआ और ठहरा हुआ हैं।

यहाँ पर समझ लेना भी आवश्यक हैं कि यदि रीढ की हड्डी (spine) या मेरूरज्जु (Spinal cord) में काफी समय से कोई विकार हो तो उस भाग से सम्बंधित शरीर के अंगो में कोई विकार आ सकता है। ये भाग मुख्यतः रीढ की हड्डी (spine) तथा मेरूरज्जु (Spinal cord) के समानान्तर ही गर्दन तथा पेट में स्थित होते हैं।

आज लगभग हर आदमी कमर दर्द (Back Pain) से परेशान है।अब लोगों के लिए कमर दर्द (Back Pain) भी एक बहुत बड़ी कष्टदायक समस्या बनी हुई है और अब ये दुनिया में एक महामारी का रूप लेता जा रहा है।आज हर उम्र के लोग इससे परेशान हैं  यह गंभीर दर्द कई बार स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) में बदलता है तो कभी-कभी इससे साइटिका हो सकता है।

रीढ की हड्डी (spine) की बनावट (स्पाइनल कॉर्ड और डिस्क) 

Spinal column texture ( spinal cord and discs )

स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) को जानने के लिए रीढ की पूरी बनावट को समझना जरूरी है। स्पाइनल कॉर्ड या रीढ की हड्डी (spine) पर शरीर का पूरा वजन टिका होता है। यह शरीर को गति देती है और पेट, गर्दन, छाती और (Vein)नस की सुरक्षा करती है। स्पाइन वर्टिब्रा से मिलकर बनती है। यह सिर के निचले हिस्से से शुरू होकर टेल बोन तक होती है। स्पाइन को तीन भागों में बांटा जाता है-

1. गर्दन या सर्वाइकल वर्टिब्रा (Neck or cervical vertebrae)

2. छाती (थोरेसिक वर्टिब्रा) Chest ( thoracic vertebra)

3. लोअर बैक (लंबर वर्टिब्रा) The lower back ( lumbar vertebra)

स्पाइन कॉर्ड (Spine Cord) की हड्डियों के बीच कुशन जैसी एक मुलायम चीज होती है, जिसे डिस्क कहा जाता है। ये डिस्क एक-दूसरे से जुडी होती हैं और वर्टिब्रा के बिलकुल बीच में स्थित होती हैं। डिस्क स्पाइन के लिए शॉक एब्जॉर्बर का काम करती है।

आगे-पीछे, दायें-बायें घूमने से डिस्क का फैलाव होता है। गलत तरीके से काम करने, पढने, उठने-बैठने या झुकने से डिस्क पर लगातार जोर पडता है। इससे स्पाइन के न‌र्व्स पर दबाव आ जाता है जो कमर में लगातार होने वाले दर्द का कारण बनता है।

रीढ की हड्डी (spine) से सम्बंधित बीमारी स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) आखिर है क्या ?

आप ने यह शब्द बार बार सुना होगा। दरअसल यह टर्म स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) समूची प्रक्रिया को सही ढंग से नहीं बता पाता। स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) कोई बीमारी नहीं, शरीर की मशीनरी में तकनीकी खराबी है। वास्तव में डिस्क स्लिप नहीं होती, बल्कि स्पाइनल कॉर्ड से कुछ बाहर को आ जाती है।
यदि इसको आसान भाषा में समझाया जाये तो मान लीजिये आप साइकिल पर पीछे कोई सामान लेकर जा रहे हैं और आप की साइकिल खड्डों में जाने के कारण आप के पीछे रखा हुआ सामान किसी एक साइड से ज्यादा बाहर को निकल जाता है तो उसे मेडिकल की भाषा में स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) कह दिया जाता है 
डिस्क का बाहरी हिस्सा एक मजबूत झिल्ली से बना होता है और बीच में तरल जैलीनुमा पदार्थ होता है। डिस्क में मौजूद जैली या कुशन जैसा हिस्सा कनेक्टिव टिश्यूज के सर्कल से बाहर की ओर निकल आता है और आगे बढा हुआ हिस्सा स्पाइन कॉर्ड (Spine Cord) पर दबाव बनाता है। कई बार उम्र के साथ-साथ यह तरल पदार्थ सूखने लगता है या फिर अचानक झटके या दबाव से झिल्ली फट जाती है या कमजोर हो जाती है तो जैलीनुमा पदार्थ निकल कर (Vein)नस पर दबाव बनाने लगता है, जिसकी वजह से पैरों में दर्द या सुन्न होने की समस्या होती है।

रीढ की हड्डी (spine) से सम्बंधित बीमारी स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) होने के कारण कौन-कौन से हैं ?

एक्सप‌र्ट्स के अनुसार  30 से 50 वर्ष की आयु में कमर के निचले हिस्से में स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) की समस्या हो सकती है। 40 से 60 वर्ष की आयु तक गर्दन के पास सर्वाइकल वर्टिब्रा में समस्या होती है।  लेकिन अब 20-25 वर्ष के युवाओं में भी स्लिप डिस्क के लक्षण तेजी से देखे जा रहे हैं। एन सब बातों को देखते हुए कुछ कारण निचे दिया जा रहे हैं जिन से स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) की परेशानी जायदा होती है

  1. देर तक एक ही जगह पर एक ही आसान में बैठ कर कार्य करना
  2. स्पीड में बाइक चलाना और खड्डों में भी या स्पीड ब्रेकर पर भी उसी स्पीड से चलाना
  3. सीट बेल्ट बांधे बिना गाड़ी ड्राइव करना भी इस समस्या को बढ़ा रहा है।
  4. अचानक ब्रेक लगाने से भी शरीर को झटका लगता है और डिस्क को चोट लग सकती है।
  5. गलत पोश्चर इसका आम कारण है। लेट कर या झुक कर ज्यादा पढना या काम करना, कंप्यूटर के आगे बैठे रहना इसका कारण है।
  6. अनियमित दिनचर्या, अचानक झुकने, वजन उठाने, झटका लगने, गलत तरीके से उठने-बैठने की वजह से दर्द हो सकता है।
  7. सुस्त जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियां कम होने, व्यायाम या पैदल न चलने से भी मसल्स कमजोर हो जाती हैं।
  8. अत्यधिक काम करना और थकान में भी आराम न करने से स्पाइन पर जोर पडता है और एक सीमा के बाद समस्या शुरू हो जाती है।
  9. उम्र बढने के साथ-साथ हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और इससे डिस्क पर जोर पडने लगता है।
  10. छोटी उम्र से जैसा आजकल होता है बच्चे हो या बड़े सारा दिन मोबाइल में झुक कर सारा दिन चैटिंग करना या विडियो गेम खेलना या बाइक या गाड़ी चलते समय मोबाइल पर बात करना भी स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) की बीमारी होने के खतरे को बढ़ा देते हैं
  11. गलत तरीके से सोना, हमेशा ढीली चारपाई या लचकदार बिछौना पर सोना, आरामदेह सोफों तथा गद्देदार कुर्सी पर घंटों भर बैठे रहना, ऊँचा सिरहाना तकिया लेना भी इन रोगों का एक मुख्य कारण है।
  12. जो स्त्रियाँ ऊँची ऐड़ी वाले चप्पले, सेंडिल या जूते पहनती है उन्हें भी अक्सर कमर एवं एड़ियों का दर्द हो जाता हैं।
  13. कुछ लोगों की रीढ़ की हड्डी में जन्म से भी कोई विकार होता है, दुर्घटना के समय रीढ़ की हड्डी पर चोट लगने या दबाब पड़ने के कारण उसी समय से या फिर कुछ दिनों, महीनों या वर्षो बाद ऐसे दर्द शुरू हो जाते है।
  14. अशांति, चिन्ता, निराशा, भय तथा सदमा इन रोगों के प्रमुख कारण है।
  15. स्त्रियों को प्रसव तथा लगातार कई प्रसवो के कारण भी ये रोग हो जाते है।
  16. लम्बी दूरी की यात्राओं का रोजाना लम्बे समय तक बैठे रहना या खड़े हो कर ज्यादा सफ़र करने से भी ये समस्या बढती है

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स्लिप्ड डिस्क (Slipped disc) होने के लक्षण :- 
1. (Vein)नस पर दबाव के कारण कमर दर्द (Back Pain), पैरों में दर्द या पैरों, एडी या पैर की अंगुलियों का सुन्न होना
2. पैर के अंगूठे या पंजे में कमजोरी
3. स्पाइनल कॉर्ड के बीच में दबाव पडने से कई बार हिप या थाईज के आसपास सुन्न महसूस करना
4. समस्या बढने पर यूरिन-स्टूल पास करने में परेशानी
5. रीढ के निचले हिस्से में असहनीय दर्द
6. चलने-फिरने, झुकने या सामान्य काम करने में भी दर्द का अनुभव। झुकने या खांसने पर शरीर में करंट सा अनुभव होना।

रीढ की हड्डी (spine) से सम्बंधित बीमारी से बचना है तो अपनाये ये तरीके :-

  1. नियमित तीन से छह किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलें। यह सर्वोत्तम व्यायाम है हर व्यक्ति के लिए।
  2. देर तक स्टूल या कुर्सी पर झुक कर न बैठें। अगर डेस्क जॉब करते हैं तो ध्यान रखें कि कुर्सी आरामदेह हो और इसमें कमर को पूरा सपोर्ट मिले।
  3. शारीरिक श्रम मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। लेकिन इतना भी परिश्रम न करें कि शरीर को आघात पहुंचे।
  4. देर तक न तो एक ही पोश्चर में खडे रहें और न एक स्थिति में बैठे रहें।
  5. किसी भी सामान को उठाने या रखने में जल्दबाजी न करें। पानी से भरी बाल्टी उठाने, आलमारियां-मेज खिसकाने, भारी सूटकेस उठाते समय सावधानी बरतें। ये सारे कार्य इत्मीनान से करें और हडबडी न बरतें।
  6. अगर भारी सामान उठाना पडे तो उसे उठाने के बजाय धकेल कर दूसरे स्थान पर ले जाने की कोशिश करें।
  7. हाई हील्स और फ्लैट चप्पलों से बचें। अध्ययन बताते हैं कि हाई हील्स से कमर पर दबाव पडता है। साथ ही पूरी तरह फ्लैट चप्पलें भी पैरों के आर्च को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे शरीर का संतुलन बिगड सकता है।
  8. सीढियां चढते-उतरते समय विशेष सावधानी रखें।
  9. कुर्सी पर सही पोश्चर में बैठें। कभी एक पैर पर दूसरा पैर चढा कर न बैठें।
  10. जमीन से कोई सामान उठाना हो तो झुकें नहीं, बल्कि किसी छोटे स्टूल पर बैठें या घुटनों के बल नीचे बैठें और सामान उठाएं।
  11. वजन नियंत्रित रखें। वजन बढने और खासतौर पर पेट के आसपास चर्बी बढने से रीढ की हड्डी (spine) पर सीधा प्रभाव पडता है।
  12. अत्यधिक मुलायम और सख्त गद्दे पर न सोएं। स्प्रिंगदार गद्दों या ढीले निवार वाले पलंग पर सोने से भी बचें।
  13. पीठ के बल सोते हैं तो कमर के नीचे एक टॉवल फोल्ड करके रखें, इससे रीढ को सपोर्ट मिलेगा।
  14. कभी भी अधिक मोटा तकिया सिर के नीचे न रखें। साधारण और सिर को हलकी सी ऊंचाई देता तकिया ही बेहतर होता है।
  15. मॉल्स में शॉपिंग के दौरान या किसी इवेंट या आयोजन में अधिक देर तक एक ही स्थिति में न खडे रहें। बीच-बीच में स्थिति बदलें। अगर देर तक खडे होकर काम करना पडे तो एक पैर को दूसरे पैर से छह इंच ऊपर किसी छोटे स्टूल पर रखना चाहिए।
  16. अचानक झटके के साथ न उठें-बैठें।
  17. देर तक ड्राइविंग करनी हो तो गर्दन और पीठ के लिए कुशंस रखें। ड्राइविंग सीट को कुछ आगे की ओर रखें, ताकि पीठ सीधी रहे।
  18. दायें-बायें या पीछे देखने के लिए गर्दन को ज्यादा घुमाने के बजाय शरीर को घुमाएं।
  19. पेट के बल या उलटे होकर न सोएं।
  20. कमर झुका कर काम न करें। अपनी पीठ को हमेशा सीधा रखें।

हमारा आपसे अनुरोध है की जब तक आपको रीढ की हड्डी (spine) में कोई चोट ना लगे तब तक रीढ की हड्डी (spine) का ऑपरेशन ना करवाएं रीढ की हड्डी (spine) से सम्बंधित कोई भी बीमारी हो तो आप हमारे मित्र श्रीजी से संपर्क कर सकते हैं वो ड्रग फ्री थरेपी में विश्वास रखते हैं और बहुत से रोगी ठीक कर चुके है जिनमे से कुछ डॉक्टर भी हैं आप चाहे तो उनस (Vein)े एक बार रीढ की हड्डी (spine) का ऑपरेशन करवाने से पहले या आप को इसका इलाज ना मिल रहा हो तो आप उनस (Vein)े संपर्क कर सकते है वो अभी पंचकुला और पुणे में अपनी सर्विस दे रहें हैं उनका मोबाइल नंबर है 09467616060

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