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मैदा और आटा से आपका स्वास्थय

मैदा और आटा से आपका स्वास्थय

मैदा और आटा :- क्या आप लोगों को पता है कि मैदा गेहूँ से ही बनता है, उसी गेहूं से जिससे आटा भी बनता है। गेहूं से मैदा बनाने के लिए अलग तरह का मील होता है, जिसे मैदा मील कहते है।

मैदा बनाने के लिए पहले गेहूं को अच्छी तरह साफ किया जाता है। साफ और सूखी गेहूँ मैदा बनने के लिए तैयार होती है। मैदा मिल में सबसे पहले गेहूं की ऊपरी परत निकाली जाती है। इस चरण में मैदा मील में सभी गेहूं के दाने की ऊपरी परत निकलकर अलग हो जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि गेहूं के ज्यादातर पोषक तत्व और प्रोटीन ऊपरी परत में ही होता है, जो कि मैदा बनाने की प्रक्रिया में निकल जाता है। आटा को मैदा बनाने की प्रक्रिया में 10% कैलोरी बढ़ जाती है क्योंकि बहुत कुछ निकल जाता है: लगभग 66% विटामिन ‘बी’ निकल जाता है, लगभग 70% मिनरल निकल जाता है, 79% फाइवर निकल जाता है और 19% प्रोटीन भी निकल जाता है। पौष्टिकता के मामले में आटा सबसे अच्छा है। मैदा भी आटा से ही बनता है। इसलिए, आटे में ज़्यादा पौष्टिकता है। ऊपरी परत निकलने के बाद गेहूं का बीच वाला हिस्सा ही बचा रहता है, यह पूरी तरह सफेद होता है। ऊपरी परत निकालने की प्रक्रिया में गेहूं मोटे टुकड़ों में टूट जाते है। इससे भूसी निकाल दिया जाता है और बचा हुआ कण सूजी कहलाता है। अंतिम चरण में गेहूं के इसी कण की अच्छी तरह पीसाई की जाती है और वह पाउडर के फार्म में आ जाता है। यही पाउडर मैदा कहलाता है।

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अगर आप बाजार के आटे की बजाय घर में ताजा पिसे आटे का इस्तेमाल करें तो इससे शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व तो मिलेंगे ही, साथ ही सेहत भी दुरुस्त रहेगी। ताजा आटा विटामिन बी और विटामिन ई से भरपूर होता है।

मैदा बेंकिग के लिए इस्तेमाल होता है। आटा से हल्का होता है और इसके लिए अच्छा परिणाम मिलता है। आजकल जागरुकता के कारण आटे से बनी ब्रेड और दूसरे व्हीट कॉनफेक्शनरी और बेक्ड गुड्स की डिमान्ड है। कोई भी बिस्कुट या कूकी या केक रेसिपी मैदा के बजाय आटे से बनाई जा सकती है। दोनों में सिर्फ टेक्सचर का अंतर होता है, मैदे के तुलना में इसका घनत्व ज़्यादा होता है। कुछ लोग सलाह देते हैं कि आधा मैदा और आधा आटा का इस्तेमाल करें। आजकल परम्परागत रुमाली रोटी जो सदियों से मैदे से बनाई जाती थी वह रेस्तरां में विशेषकर आटे से बनाई जाती है। मैदे से बनी रुमाली रोटी जैसी मुलायम तो नहीं होती लेकिन पौष्टिकारक होती है। होल व्हीट फ्लॉर से बना नान उतना अच्छा नहीं बनता है।

कई पौराणिक शास्त्रों में ऐसा वर्णित है कि बासी खाना प्रेतों का भोजन होता है और इसका भक्षण करने वाला व्यक्ति जीवन में निराशा, बीमारियां, क्रोध और चिड़चिडे़पन से घिरा रहता है। आजकल अधिकतर भारतीय परिवारों कि महिलाएं समय बचाने समय हेतु रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर रेफ्रिजरेटर में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका इस्तेमाल होता है। गूंथे हुए आटे को उसी पिण्ड समान माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी परिवार में जब गूंथा हुआ आटा रेफ्रिजरेटर में रखने चलन हो जाता है तब प्रेतात्माएं और पितृ इस पिण्ड का भक्षण करने हेतु घर में आना शुरू कर देते हैं। जो प्रेतात्माएं और पितृगण पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं ऐसे में वो रेफ्रिजरेटर में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं।

जिन घरों में भी बासी गूंथे आटे को रेफ्रिजरेटर में रखने का प्रचलन बना हुआ है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य अपना पांव पासार ही लेते हैं। इस बासी और प्रेत भोजन को खाने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इर्दगिर्द पड़ोसियों, दोस्तों, रिश्तेदारों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी दिनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं। आटा गूंथने में लगने वाले समय बचाने हेतु किया जाने वाला यह चलन शास्त्र विरुद्ध और अनुचित है। हमारे पूर्वज सैदेव यही राय देते आए हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में रेफ्रिजरेटर का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी हमारे पूर्वजों को इसके पीछे के रहस्यों की पूरी जानकारी थी।

अगर आप सचमुच स्वास्थ्यवर्द्धक खाने की आदत डालना चाहते है तो बिस्कुट, केक और कूकीज़ को डाएट से कम करें! एक बात ध्यान में रखें कि जब किसी रेसिपी में मैदा के विकल्प में आटे का इस्तेमाल कर रहे हैं तो पकने में ज़्यादा समय लगता है।

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