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मूत्राशय (Bladder) के रोग, कारण और उनके घरेलू उपचार

मूत्राशय

मूत्राशय के रोग अधिकतर उन लोगों को होते हैं जो बहुत कम पानी पीते हैं या पेशाब को बहुत देर टेक रोके रखते हैं या संभोग के समय वीर्य को बाहर पूरा ना निकाल कर उसको रोक लेते हैं और संभोग के बाद इंद्री की सफाई नहीं करते तो मूत्राशय से सम्बंधित रोग होने लगते हैं उनके लक्षण धीरे धीरे होने शुरु हो जाते हैं जैसे मूत्राशय में इन्फेक्शन , पेशाब के साथ जलन, पेशाब पर कोई कण्ट्रोल नहीं होना , मूत्राशय में पथरी, वीर्यशय की पथरी आदि अनेक रोग पैदा होने लगते हैं जिनका कारण जब तक पता लगता है तब तक इन्फेक्शन ज्यदा हो जाता है

स्वस्थ मूत्राशय की परिभाषा :- जो व्यक्ति दिन में 4 से 6 बार और रात को 2 बार पेशाब जाता है तो उसका मूत्राशय स्वस्थ मन जाता है 

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मूत्राशय की पथरी रोग होने के अनेक कारण हैं-

मनुष्य के शरीर में रक्त का दूषित द्रव्य गुर्दों के द्वारा छनकर पेशाब के रूप में मूत्राशय में जमा होता रहता है जहां वह मूत्र की नलिकाओं के द्वारा शरीर से बाहर हो जाता है। जब शरीर या मूत्रयंत्रों में किसी प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाने के कारण उनकी कार्य प्रणाली में कोई गड़बड़ी हो जाती है तो मूत्राशय के अन्दर आया हुआ दूषित द्रव्य सूखकर पत्थर की तरह कठोर हो जाता है जिसे मूत्राशय की पथरी का रोग कहते हैं।

वीर्यशय की पथरी रोग होने के कारण हैं

जो पुरुष संभोग क्रिया के समय में अधिक आनन्द प्राप्त करने के लिए स्थानाच्युत या निकलते हुए वीर्य को रोक लेते हैं उन व्यक्तियों का वीर्य रास्ते में ही अटक कर रह जाता है और बाहर नहीं निकल पाता है। जब अटका हुए वीर्य वायु लिंग तथा फोतों के बीच में अर्थात मूत्राशय के मुंह पर आकर सूख जाता है तो वह वीर्य की पथरी कहलाता है।

मूत्राशय की पथरी के लक्षण- 
  • इस रोग से पीड़ित रोगी दर्द के कारण चीखने-चिल्लाने लगता है।
  • मूत्राशय की पथरी से पीड़ित रोगी अपने लिंग और नाभि को हाथ से दबाए रखता है तथा पेशाब करने के समय में खांसने से वायु के साथ उसका मल भी निकल जाता है। रोगी का पेशाब बूंद-बूंद करके गिरता रहता है।
  • रोगी व्यक्ति के पेड़ू में अत्यंत जलन तथा दर्द होता है और उसमें सुई गड़ने जैसी पीड़ा होती है।
  • रोगी व्यक्ति के हृदय तथा गुर्दे में भी दर्द होता रहता है।
मूत्राशय की पथरी रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
  • मूत्राशय की पथरी रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने गुर्दे का उपचार करना चाहिए ताकि गुर्दे का कार्य मजबूत हो सके और मूत्राशय के कार्य में सुधार हो सके।
  • रोगी व्यक्ति को उचित भोजन करना चाहिए तथा शरीर की आंतरिक सफाई करनी चाहिए ताकि गुर्दे तथा मूत्राशय पर दबाव न पड़े और उनका कार्य ठीक तरीके से हो सके। ऐसा करने से पथरी का बनना रुक जाता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द या कई प्रकार के अन्य रोग भी नहीं होते हैं तथा शरीर के स्वास्थ्य में भी सुधार हो जाता है।
  • रोगी व्यक्ति को 2-4 दिनों तक पानी में नींबू या संतरे का रस मिलाकर पीना चाहिए और उसके बाद 2-3 दिनों तक केवल रसदार खट्टे-मीठे फलों का सेवन करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को एनिमा क्रिया करके पेट की सफाई करनी चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी के गुर्दों के कार्य में सुधार हो जाता है जिसके फलस्वरूप पथरी का बनना बंद हो जाता है।
  • मूत्राशय की पथरी रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में पानी में 1 नीबू का रस मिलाकर पीना चाहिए तथा इसके बाद नाश्ते में 250 मिलीलीटर दूध पीना चाहिए। फिर इसके बाद एक गिलास पानी में एक नींबू का रस मिलाकर दोपहर के समय में पीना चाहिए। रोगी व्यक्ति को दही और भाजी, सलाद तथा लाल चिउड़ा का फल खाना चाहिए तथा शाम के समय में फलों का रस पीना चाहिए।
  • रोगी व्यक्ति को अपनी पाचनक्रिया को ठीक करने के लिए सुबह तथा शाम को टहलना चाहिए तथा हल्का व्यायाम भी नियमित रूप से करना चाहिए। इसके अलावा रोगी को 14 दिनों के बीच में एक बार उपवास रखना चाहिए। इससे रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
  • पथरी के रोग से पीड़ित रोगी को एक दिन में कम से कम 5-6 गिलास शुद्ध ताजा जल या फल का रस पीना चाहिए।
  • पथरी के रोग को ठीक करने के लिए नारियल, ताड़ और खजूर का ताजा मीठा रस, फलों और शाक-सब्जियों का रस, दूध, मखनियां, दही तथा मठा पीना लाभदायक होता है।
  • मूत्राशय की पथरी को ठीक करने के लिए और भी कई प्रकार के फल तथा औषधियां हैं जिनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है जो इस प्रकार हैं- तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी, मक्खन, गूलर, पका केला, चूड़ा, चावल, गेहूं का दलिया, कुलथी का पानी, शहद, किशमिश, पिण्ड खजूर, अंजीर, छुहारा, नारियल की गिरी, मूंगफली तथा बादाम आदि।
  • पथरी के रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली, दाल, अण्डा, चीनी, नमक, पकवान, मिठाई, मिर्च-मसाले, आचार, चटनी, सिरका आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
मूत्रपथ संक्रमण रोग के लक्षण-
  • इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति को पेशाब करते समय दर्द तथा जलन होती है।
  • रोगी व्यक्ति को रात के समय में बार-बार पेशाब आता है।
  • रोगी व्यक्ति के पेशाब के साथ पीब तथा रक्तकण भी निकलने लगता है।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग से पीड़ित रोगी की कमर में दर्द तथा उल्टियां भी होने लगती है।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग हो जाने के कारण स्त्री रोगी को योनि रोग भी हो जाता है।

मूत्रपथ संक्रमण रोग होने के कारण- 

  • जब कोई मनुष्य मूत्र के वेग को बार-बार रोकता है तो उसे यह रोग हो जाता है।
  • पुरुषग्रन्थि के अधिक बढ़ जाने के कारण भी यह रोग हो जाता है।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जिन्हें गुर्दे का रोग होता है।
  • मधुमेह के रोगियों को भी मूत्रपथ संक्रमण रोग हो जाता है।
  • जननांग की ठीक तरह से सफाई न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

मूत्र-पथ संक्रमण 

मूत्रपथ संक्रमण रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार- 

  • इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले 2 दिनों तक उपवास रखना चाहिए। उपवास के समय रोगी व्यक्ति को अधिक मात्रा में फलों का रस पीना चाहिए।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग को ठीक करने के लिए रोगी को खीरे का रस, मूली का रस, पालक का रस तथा नारियल पानी को बराबर मात्रा में मिलाकर कुछ दिनों तक प्रतिदिन सेवन कराना चाहिए।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए। इस रोग में कच्चे नारियल का पानी, जौ का पानी, हरे धनिया का पानी, मट्ठा तथा फटे दूध का सेवन करना भी लाभदायक होता है।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग से पीड़ित रोगी को कुछ दिनों तक बिना पका हुआ भोजन खाना चाहिए तथा भोजन में नमक बिल्कुल भी नहीं खाना चाहिए।
  • काले तिल और शहद को मिलाकर 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से मूत्रपथ संक्रमण रोग कुछ दिनों में ही ठीक हो जाता है।
  • प्रतिदिन तुलसी का सेवन करने से मूत्रपथ संक्रमण रोग ठीक हो जाता है।
  • रोगी व्यक्ति को अपना पेट साफ करने के लिए एनिमा क्रिया करनी चाहिए। रोगी को अपने पेड़ू पर गीली पट्टी करनी चाहिए तथा सोने से पहले कम से कम 15 मिनट तक कटिस्नान करना चाहिए।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग से पीड़ित रोगी को खुली हवा में टहलना चाहिए तथा गहरी सांस लेनी चाहिए।
  • मूत्रपथ संक्रमण रोग से पीड़ित रोगी को भोजन करने के बाद मूत्र त्याग जरूर करना चाहिए ताकि उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाएं।

पित्ताशय तथा गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी

पथरी का रोग पुरुषों से अधिक स्त्रियों में पाया जाता है। पित्ताशय में जब दूषित द्रव्य जमा होकर ठोस रूप ले लेता है तो इस ठोस पदार्थ को पथरी कहते हैं। पित्ताशय में जब पथरी होती है तो उसे पित्ताशय पथरी कहते हैं। पथरी दूषित द्रव्य का जमा हुआ वह ठोस समूह होता है जो शरीर के विभिन्न स्थानों पर हो सकती है। यह छोटी, बड़ी अनेक तथा विभिन्न आकृतियों की हो सकती है।
पित्ताशय में पथरी रोग होने के लक्षण- 
  • जब किसी व्यक्ति को पित्ताशय में पथरी का रोग हो जाता है तो इसके कारण रोगी व्यक्ति को अरुचि तथा अपच की समस्या हो जाती है।
  • जब रोगी व्यक्ति भोजन कर लेता है तो उसका पेट भारी होने लगता है।
  • रोगी के पित्ताशय के भाग में तेज दर्द होता है तथा उसके शरीर में कम्पन होने लगता है और रोगी को हल्का बुखार भी हो जाता है।
  • रोगी का जी मिचलाने लगता है तथा उसे उल्टियां भी होने लगती हैं।

पित्ताशय में पथरी रोग होने का कारण-

  • यह रोग व्यक्ति को भूख से अधिक भोजन करने के कारण होता है। भोजन में चिकनाई वाली चीजों का अधिक प्रयोग करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • अधिक औषधियों का सेवन करने के कारण भी पथरी का रोग हो सकता है।
  • मिर्च-मसाले वाली चीजों का अधिक सेवन करने के कारण भी पित्ताशय में पथरी का रोग हो सकता है।
  • अधिक सोने, अधिक मात्रा में शराब का सेवन करने, कोई मेहनत का कार्य न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
  • कब्ज बनने के कारण भी यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।
  • मांस, अण्डे का अधिक सेवन करने के कारण भी पित्ताशय में पथरी का रोग हो सकता है।
  • स्त्रियों में यह रोग मासिकधर्म के किसी रोग के हो जाने के कारण से हो सकता है।

गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग होने के लक्षण-

  • जब यह रोग हो जाता है तो रोगी के पेट के आगे के भाग में अचानक बहुत तेज दर्द होने लगता है। कभी-कभी रोगी का जी मिचलाने लगता है और उसे उल्टियां भी होने लगती हैं।
  • जब रोगी व्यक्ति पेशाब करता है तो उसे पेशाब करने में परेशानी होती है और पथरी के कारण रोगी को कभी-कभी बुखार भी आ जाता है।
  • रोगी व्यक्ति को कंपकपी होती है तथा पसीना भी आने लगता है।
  • इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी कभी पेशाब में रक्त (खून) भी आ जाता है।
  • जब रोगी व्यक्ति पेशाब करता है तो पेशाब की धार फट जाती है जिससे पेशाब की धार इधर-उधर गिरने लगती है।
  • कई बार तो पथरी मूत्रयंत्र में बहुत लम्बे समय तक बनी रहती है लेकिन इसके लक्षण सामने दिखाई नहीं देते हैं।

गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग होने का कारण-

  1. जब कोई मनुष्य अपने मूत्र के वेग को बार-बार रोकता है तो उसे यह रोग हो जाता है।
  2. जब कोई व्यक्ति जरूरत से बहुत कम पानी पीता है तो भी उसे यह रोग हो सकता है।
  3. भोजन में अधिक नमक, मिर्च-मसाले, अचार, चीनी तथा मैदे से बनी चीजों का अधिक इस्तेमाल करने के कारण गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी का रोग हो सकता है।
  4. औषधियों का अधिक सेवन करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
  5. तम्बाकू, गुटका तथा शराब का अधिक इस्तेमाल करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
  6. शरीर में विटामिन `ए´, `बी´ तथा `सी´ की कमी हो जाने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।
  7. शारीरिक कार्य अधिक करने तथा मानसिक कार्य करने के कारण भी गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग हो सकता है।

पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में पथरी रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-

    1. जब किसी व्यक्ति को यह रोग हो जाता है तो उसे ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को हल्के गर्म पानी में नींबू का रस मिलाकर पिलाना चाहिए तथा उपवास रखवाना चाहिए। इसके बाद 3 से 7 दिनों तक सफेद पेठे का रस और केले के डण्डे के रस को नारियल पानी में मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी के पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
    2. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी को कुछ दिनों तक उपवास रखना चाहिए। उपवास के दौरान उसे तरबूज, गाजर, संतरा, लौकी आदि का रस अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को 6 सप्ताह तक फलों का रस पीना चाहिए और अधिक मात्रा में अंगूर, सेब, नाशपाती, अनन्नास तथा आंवला का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
    3. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने में पका जामुन, बथुआ, मेथी, चौलाई, धनिया, पुदीना के पत्तों का साग बहुत लाभकारी रहता है।
    4. पालक के रस में शहद मिलाकर प्रतिदिन पीने से कुछ ही दिनों में पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी ठीक हो जाती है।
    5. गाजर एवं चुकन्दर का रस प्रतिदिन दिन में 3-4 बार पीने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी ठीक हो जाती है।
    6. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाले पथरी को ठीक करने के लिए सब्जियों का रस पीना लाभदायक रहता है।
    7. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी से पीड़ित रोगी को प्रोटीन युक्त खाद्य-पदार्थ, मलाई, दूध, पनीर, घी आदि वसायुक्त पदार्थों का तथा मांसाहार पदार्थों का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
    8. लगभग 7-8 ग्राम पपीते की जड़ को अच्छी तरह धोकर पानी के साथ पीसकर और कपड़े से छानकर सुबह के समय में खाली पेट 3 सप्ताह तक पीना चाहिए। जिसके परिणाम स्वरूप पित्ताशय की पथरी गलकर निकल जाती है और रोगी का यह रोग ठीक हो जाता है।
    9. कुलथी की दाल को सुबह के समय में पानी में भिगोकर रख दें तथा शाम के समय में इसे पानी में पीसकर उस पानी को पी लें। इस प्रकार से प्रतिदिन प्रयोग करने से कुछ ही दिनों में हर प्रकार की पथरी गलकर शरीर से बाहर हो जाती है।
    10. तुलसी के पत्तों के साथ अंजीर को प्रतिदिन खाने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
    11. तुलसी के रस को शहद के साथ मिलाकर प्रतिदिन 6 महीने तक सेवन करने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी ठीक हो जाती है।
  1. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को पेट पर मिट्टी की पट्टी करनी चाहिए। फिर इसके बाद एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। फिर पेट की गर्म ठण्डी सिंकाई करनी चाहिए और रोगी को कटिस्नान, भापस्नान, गर्म पादस्नान, मेहन स्नान करना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी को अपने शरीर पर कुछ मिनटों के लिए गीली चादर लपेटनी चाहिए और अपने शरीर को सूखे कपड़े से पोछना चाहिए। रोगी को अपने रीढ़ की हड्डी तथा गर्दन के पास मालिश करनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन यह प्रयोग करने से रोगी के पथरी सम्बन्धित सभी रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
  2. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए रोगी को सूर्यतप्त सफेद बोतल का जल प्रतिदिन पीना चाहिए ताकि शरीर में विटामिन `डी´ सही मात्रा में मिल सके जो की कैल्शियम को हजम करता है पथरी को दूर करता है।
  3. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिन्हें करने से ये ठीक हो जाती हैं ये आसन इस प्रकार हैं- हलासन, धनुरासन, योगमुद्रासन, भुजंगासन, शलभासन, पश्चिमोत्तानासन, सर्वांगासन तथा प्राणायाम आदि।
  4. पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी से पीड़ित रोगी के पेट या मूत्रसंस्थान तथा गुर्दे में दर्द होने लगे तो उसे दूर करने के लिए गर्म पानी के टब में बैठ जाएं तथा जब पानी ठंडा हो जाए तो उसमें फिर से थोड़ा गर्म पानी डालकर बैठ जाए। यदि गर्म पानी के टब में बैठना मुश्किल हो तो गर्म पानी से भीगा हुआ तौलिया अपने पेट पर रखें तथा तौलिये को गर्म पानी में भिगोकर बदलते रहना चाहिए।
  5. इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से पित्ताशय, गुर्दे और मूत्रसंस्थान में होने वाली पथरी जल्दी ही  ठीक हो जाती है।

Article Source :- http://bharatkaayurvedicgyan.blogspot.in/

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