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मुद्रा से आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ

मुद्रा से आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ

मुद्रा:- हस्त मुद्रा को लेकर सभी जन मानस में अलग अलग तरह की अवधारणा है कोई सोचता है की ये मुश्किल है कोई सोचता है की इनका करने से क्या फायदा होगा और किसी किसी का तो ये मत भी है की ये सिर्फ योगी ऋषि मुनियों के लिए ही है लेकिन जब तक हम किसी बात को समझेंगे ही नहीं तो उसके बारे में अपनी राय देना या अपने विचारों को दिशाविहीन केर देना मेरी राय में तो गलत है ! सभी मुद्रा योग को जानने वालों ने इसे अपने अपने तरीके से समझाया है एक कोशिश मेरी भी है शायद आप लोग इसको जानने के बाद अपने आप को आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ से दूर नहीं कर पाएंगे ! क्योंकि जिस का भी जन्म हुआ है उसको आरोग्य जीवन जीने का और अपनी शक्ति को पहचान कर उसका सदुपयोग करना चाहिये !

हमारे शरीर को रक्त संचालित करता है यदि कही उसके रास्तें में रुकावट आती है तो वहां से हमे बीमारी लगनी शुरु हो जाती है मुद्रा के करने रक्त एक प्रेशर के साथ गति करता है जिस के कारण रक्त में पैदा हुआ अवरोध खुल जाता है और हमे आरोग्यता प्राप्त होती है कुछ योगियों का कहना है की हमारी ऊर्जा का लगातार विसर्जन होता रहता है यदि उस ऊर्जा का उपयोग किया जाये तो भी हम आरोग्यता प्राप्त कर सकते हैं

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मुद्राओं में आरोग्य का राज छिपा हुआ है यदि में आसान तरीके से समझा सकता हूँ तो इतना ही कहूँगा की मान लीजिये किसी कमरे में अलग अलग वाद्ययंत्र बज रहे हैं सब अपनी मर्जी से उसे बजा रहे है बिना किसी लय और ताल के तो आपके सर में दर्द होना शुरु हो जाएगा लेकिन यदि उनको एक लय और ताल से बजाया जाये तो वो संगीत का रूप ले लेगा जो मन को भायेगा और आप आनन्द लेंगे शरीर की भी यही परिभाषा है जब किसी मुद्रा को प्राणायाम के साथ किया जाता है तो आपको आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ जरूर मिलेगा !

योग अनुसार आसन और प्राणायाम की स्थिति को मुद्रा कहा जाता है। बंध, क्रिया और मुद्रा में आसन और प्राणायाम दोनों का ही कार्य होता है। योग में मुद्राओं को आसन और प्राणायाम से भी बढ़कर माना जाता है।आसन से शरीर की हड्डियाँ लचीली और मजबूत होती है जबकि मुद्राओं से शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास होता है। मुद्राओं का संबंध शरीर के खुद काम करने वाले अंगों और स्नायुओं से है। मुद्राओं की संख्या को लेकर काफी मतभेद पाए जाते हैं। मुद्रा और दूसरे योगासनों के बारे में बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ घेरण्ड संहिता है। हठयोग पर आधारित इस ग्रंथ को महर्षि घेरण्ड ने लिखा था। घेरंड में 25 और हठयोग प्रदीपिका में 10 मुद्राओं का उल्लेख मिलता है, लेकिन सभी योग के ग्रंथों की मुद्राओं को मिलाकर कुल 50 से 60 हस्त मुद्राएँ हैं।

मानव-सरीर अनन्त रहस्यों से भरा हुआ है । शरीर की अपनी एक मुद्रामयी भाषा है । जिसे करने से शारीरिक स्वास्थ्य-लाभ में सहयोग होता है । यह शरीर पंच तत्त्वों के योग से बना है । पाँच तत्त्व ये हैं- (1) पृथ्वी, (2)जल, (3) अग्नि, (4) वायु, एवं (5) आकाश । हस्त-मुद्रा-चिकित्सा के अनुसार हाथ तथा हाथों की अँगुलियों और अँगुलियों से बनने वाली मुद्राओं में आरोग्य का राज छिपा हुआ है । हाथ की अँगुलियों में पंचतत्त्व प्रतिष्ठित हैं। अँगुली में पंच तत्व – हाथों की 10 अँगुलियों से विशेष प्रकार की आकृतियाँ बनाना ही हस्त मुद्रा कही गई है। हाथों की सारी अँगुलियों में पाँचों तत्व मौजूद होते हैं जैसे अँगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी अँगुली में वायु तत्व,मध्यमा अँगुली में आकाश तत्व, अनामिका अँगुली में पृथ्वी तत्व और कनिष्का अँगुली में जल तत्व। अँगुलियोंके पाँचों वर्ग से अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अँगुलियों का रोगानुसार आपसी स्पर्श करते हैं, तब रुकी हुई या असंतुलित विद्युत बहकर शरीर की शक्ति को पुनः जाग देती है और हमारा शरीर निरोग होने लगता है। ये अद्भुत मुद्राएँ करते ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं।

महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयान बंध, मूलबंध, जालंधर बंध, विपरीत करणी, बज्रोली और शक्तिचालन। उक्त 10 मुद्राओं को सही तरीके से अभ्यास करने से बुढ़ापा जल्दी नहीं आ सकता। दो मुद्राओं को विशेषरूप से कुंडलिनी जागरण में उपयोगी माना गया है- सांभवी मुद्रा, खेचरी मुद्रा।

मुद्राओं के प्रकार – मुख्यतः 6 आसन मुद्राएँ – 1.व्रक्त मुद्रा, 2.अश्विनी मुद्रा, 3.महामुद्रा, 4.योग मुद्रा, 5.विपरीत करणी मुद्रा, 6.शोभवनी मुद्रा। जगतगुरु रामानंद स्वामी पंच मुद्राओं को भी राजयोग का साधनमानते हैं, ये है- 1.चाचरी, 2.खेचरी, 3.भोचरी, 4.अगोचरी, 5.उन्न्युनी मुद्रा।

 दस हस्त मुद्राएँ -(1) ज्ञान मुद्रा, (2) पृथ्वी मुद्रा, (3)वरुण मुद्रा, (4)वायु मुद्रा, (5) शून्य मुद्रा, (6)सूर्य मुद्रा, (7) प्राण मुद्रा, (8) लिंग मुद्रा, (9) अपान मुद्रा, (10) अपान वायु मुद्रा।

मुद्राओं का उपयोग कुंडलिनी या ऊर्जा स्रोत को जाग्रत करने के लिए मुद्राओं का अभ्यास सहायक सिद्ध होता है।कुछ मुद्राओं के अभ्यास से आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है। इससे योगानुसार अष्ट सिद्धियों और नौनिधियों की प्राप्ति संभव है। यह संपूर्ण योग का सार स्वरूप है।

सबसे पहली मुद्रा आती है महामुद्रा 

यह मुद्रा समस्त प्रकार के रोगों का नाश करती है और कुंडलिनी जागरण में अत्यंत सहयोगी है |विशेष रूप से पाचन तंत्र को सुव्यवस्थित करती है |प्रायः समस्त योग ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है |इस मुद्रा के साथ विधिपूर्वक किया गया प्राणायाम अत्यंत लाभकारी होता है |

मूलबंध लगाकर अर्थात कंठ को सिकोड़कर कुम्भक द्वारा वायु को रोकें |दाहिनी एड़ी से कंद (मलद्वार और जननांग का मध्य भाग) को दबाएँ। बाएँ पैर को सीधा रखें। अथवा बाएं पैर की एडी से योनी स्थान को दबाकर दायें पैर को सामने सीधा फैलाएं |आगे की ओर झुककर बाएँ पैर के अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़े।अर्थात फैले हुए पैर के तलवों या अंगूठे को हाथों से पकडे | सिर को नीचे झुका कर बाएँ घुटने का स्पर्श कराएँ। इस स्थिति को जानुशिरासन भी कहते हैं।[इस प्रयास में फैले पैर का घुटना मुड़ने न पाए |इसके अभ्यास से डंडे द्वारा पीते गए सर्प की भाँती कुंडलिनी दंड के सामान सहसा खड़ी हो जाती है |दोनों नासापुटों से प्राणायाम की साम्यावस्था हो जाए तब वायु को शनैः शनैः निकाल दें |यह महामुद्रा कहलाती है |

गोरक्ष संहिता में इस मुद्रा में किये जाने वाले प्राणायाम का विधान उपलब्ध है |यथा ह्रदय में ठोढ़ी को दृढ़ता से स्थापित करें |बाएं पैर की एडी को योनिस्थान में दृढ़ता से लगाएं व् दायें पैर को सामने फैलाकर दोनों हाथों से उसका तलवा पकड़ लें |फिर पूरक द्वारा उदार में वायु को भरकर कुम्भक करें |बाद में शनैः शनैः रेचक करें |यह रोगों का नाश करने वाली श्रेष्ठ महामुद्रा कही जाती है |इसका अभ्यास प्रथम चन्द्र नाडी से और फिर सूर्य नाडी से करना चाहिए |इस प्रकार दिनों नथुनों से प्राणायाम समान मात्रा में पूर्ण हो जाने पर यह मुद्रा छोड़ दें |

महामुद्रा में जानुशिरासन के साथ-साथ, बंध और प्राणायाम, किया जाता है। श्वास लीजिए। श्वास रोकते हुए जालंधर बंध करें (ठुड्डी को छाती के साथ दबाकर रखें)। श्वास छोड़ते हुए उड्डीयान बंध (नाभी को पीठ में सटाना) करें। इसे जितनी देर तक कर सकें करें।यह गोरक्ष संहिता से विधि है ,जबकि घेरंड संहिता ध्यान पर अधिक जोर देती है |

घेरंड ऋषि ने महामुद्रा में प्राणायाम के स्थान पर ध्यान को अधिक महत्वपूर्ण माना है | दाहिने पैर को सीधा रखते हुए बाई एड़ी से कंद को दबाकर इसी क्रिया को पुन: करें। आज्ञाचक्र पर ध्यान करें। भ्रू मध्य दृष्टि रखें। इसके अतिरिक्त सुषुम्ना में कुंडलिनी शक्ति के प्रवाह पर भी ध्यान कर सकते हैं।

जितनी देर तक आप इस मुद्रा को कर सकें उतनी देर तक करें। इसके पश्चात महाबंध और महाभेद का अभ्यास करें। महामुद्रा, महाबंध और महाभेद को एक दूसरे के बाद करना चाहिए।

मुद्रा के लाभ

इस मुद्रा से पेट संबंधी रोग जैसे कब्ज, एसीडिटी, कब्ज, अपच जैसी बीमारियां दूर होती हैं। बवासीर और प्रमेह का नाश होता है। ध्यान के लिए उत्कृष्ट एवं कुंडली जागरण में यह मुद्रा काफी फायदेमंद है। बढ़ी हुई तिल्ली एवं क्षय रोग (टीबी) में भी यह मुद्रा लाभ पहुंचाती है।शाण्डिल्योपनिषद ने इसके अतिरिक्त अन्य फल भी कहे हैं |इससे सभी क्लेशों का नाश होता है |विष भी अमृत के सामान पाच जाता है |क्षय ,गुल्म ,गुदावर्त ,पुराने चर्मरोग नष्ट होते हैं [अर्थात यह रक्तशोधक होता है ]| प्राण को जीतने वाला यह मुद्रा सर्व मृत्यु नाशक है |
गोरक्ष संहिता के अनुसार महामुद्रा के अभ्यास के दृढ हो जाने पर पथ्य ,अपथ्य ,रसीले या नीरस आदि का कुछ भी विचार शेष नहीं रहता |यदि घोर विष का भी पान कर लिया जाए तो वह भी अमृततुल्य हो जाता है |
 
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार यह मुद्रा महान सिद्धियों की कुँजी है। यह प्राण-अपान के सम्मिलित रूप को सुषुम्ना में प्रवाहित कर सुप्त कुंडलिनी जाग्रत करती है। इससे रक्त शुद्ध होता है। यदि समुचित आहार के साथ इसका अभ्यास किया जाय तो यह सुनबहरी जैसे असाध्य रोगों को भी ठीक कर सकती है। बवासीर, कब्ज, अम्लता और शरीर की अन्य दुष्कर व्याधियाँ इस के अभ्यास से दूर की जा सकती हैं। इसके अभ्यास से पाचन क्रिया तीव्र होती है तथा तंत्रिकातंत्र स्वस्थ और संतुलित बनता है।इसके अभ्यास से महक्लेश [अविद्या ,राग ,द्वेष ,अस्मिता तथा अभिनिवेश ]आदि दोष एवं जन्म -मरण आदि [आवागमन चक्र ]नष्ट होते हैं |अर्थात अभ्यास सिद्ध हो जाने पर यह मुद्रा मोक्षदायक तथा आत्मबोध कराने वाली है |इसीलिए इसे महामुद्रा कहा गया है |
 
इस महामुद्रा से कपिल मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी। इससे अहंकार, अविद्या, भय, द्वेष, मोह आदि के पंच क्लेशदायक विकारों का शमन होता है। भगन्दर, बवासीर, संग्रहिणी, प्रमेह आदि रोग दूर होते हैं। शरीर का तेज बढ़ता है और वृद्धावस्था दूर हटती जाती है।
 
विशेष :- कृपा किसी भी मुद्रा को करते समय बल प्रयोग ना करे आराम से मन को अपने गुरु या इष्टदेव में लगाये और धीरे धीरे इसका अभ्यास करें ! शुरु में आप दोनों पैरों से 3- 3 बार कर सकते हैं. फिर यथाशक्ति 1 घंटे तक ले जाएं ! जिनकी कमर में दर्द हो या हाई ब्लडप्रेशर के रोगी और हार्ट के रोगी को बिना किसी योग्य चिकित्सक के नहीं करना चाहिये !
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