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मानव शरीर की घड़ी और वयस्कों में नींद संबंधी विकार में क्या संबंध है ?

मानव शरीर की घड़ी क्या है ?/ What is Human Body Clock

मानव शरीर की घड़ी :- मानव के संबंध में भारतीय ऋषियों ने जिस की खोज बहुत पहले केर ली थी विज्ञान उस खोज को आज कर रहा है करे भी क्यों नहीं क्योंकि आज हम ऐसी समस्याओं से घिर चुके हैं की हम भारतीय ऋषियों की उन खोज की तरफ सोचना ही पडेगा .भारतीय ऋषियों ने समय के बारे में बहुत कुछ ज्ञान अर्जित किया जिसे आज की साइंस नकार नहीं सकती

उन्होंने सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों एवं नक्षत्रों की गतिविधियों द्वारा समय का हिसाब-किताब रखने का एक विज्ञान विकसित किया। उन्होंने घड़ी के आविष्कार के पूर्व ही समय को भूत, भविष्य एवं वर्तमान, दिन-रात, प्रात:काल, मध्यकाल, संध्याकाल, क्षण, प्रहर आदि में बांटकर सोने-जागने, खाने-पीने, काम-आराम, मनोरंजन आदि सभी क्रियाकलापों को समयबद्ध तरीके से करने पर बल देकर संपूर्ण दिनचर्या को धार्मिक परंपरा में बांध दिया था। हमारे ऋषियों और आयुर्वेदाचार्यों ने जो जल्दी सोने-जागने एवं आहार-विहार की बातें बताई हुई हैं, उन पर अध्ययन व खोज करके आधुनिक वैज्ञानिक और चिकित्सक अपनी भाषा में उसका पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।

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आपने नाम सुना होगा कलाई घड़ी, दीवार घड़ी, इलेक्ट्रॉनिक घड़ी और इलेक्ट्रॉनिक क्वार्ट्ज घड़ियां आदि का, लेकिन ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) का नाम आपने शायद ही सुना होगा। दरअसल, यह घड़ी आपके भीतर ही होती है। इस घड़ी के भी 3 प्रकार हैं- एक है शारीरिक समय चक्र और दूसरा मानसिक समय चक्र और तीसरा आत्मिक समय चक्र। यहां हम बात करेंगे शारीरिक समय चक्र की जिसे ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) कहा जाता है।

मानव शरीर की घड़ी कैसे काम करती है ?(How the human body Clock works ?)

अंग्रेजी में इसे ‘Body Clock’ ‘Circadian Rhythms’ ‘Biological Rhythms’ या ‘Biological Clock’ कहा जाता है। हमारा शरीर ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock)के अनुरूप कार्य करता है जिसमे रात्री 2बजे हम गहरी नींद में होते हैं प्रातः 4.30 बजे हमारे शरीर का तापमान न्यूनतम होता है 6.45 प्रातः रक्तचाप बढोतरी शुरू होती है फिर हारमोन स्राव शिथिल, 10 बजे प्रातः हमारा शरीर उच्च सतर्कता स्तर पर होता है और बाद दोपहर तीव्र समन्वयन क्षमता पर होता है।

3.30 बजे दिन में तीव्र प्रतिक्रिया समय होता है। उसके बाद 5 बजे उच्च दक्षता युक्त ह्रदय कार्य क्षमता और मांसपेशीय मजबूती होती है तत्पश्चात 6.30 सायं उच्च रक्तचाप सीमा व 7 सायंकाल उच्च शारीरिक तापमान स्तिथि होती है। 9 रात्री हारमोन स्राव अधिक और आंतीय हलचल धीमी होनी शुरू हो जाती है। इस 24 घंटे की जैविक प्रक्रिया ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) कहते हैं।

एक नए अध्ययन से पता चला है कि हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की उच्च और निम्न स्तिथि इसी  ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) पर बहुत निर्भर करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि हम कम नींद लेते हैं तो हमारी ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) प्रभावित होती है साथ साथ हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी प्रभावित होती है।

प्रत्येक व्यक्ति का जन्म, जीवन और मृत्यु समय तय है। यह उसने खुद ही प्रकृति के साथ मिलकर तय किया है। हालांकि इसे समझना छोड़ा मुश्किल है। सिर्फ यह समझें कि प्रकृति की अपनी एक घड़ी है, जो संपूर्ण धरती के पेड़-पौधों, प्राणी जगत और मनुष्यों पर लागू होती है। प्रत्येक जीव-जगत उस घड़ी अनुसार ही कार्य करता है, लेकिन मानव ने उसके अनुसार कार्य करना ही छोड़ दिया है। प्रकृति ने हमें यह जो घड़ी दी है वह हमें दिखती तो नहीं है, लेकिन अपना काम सुनिश्चित रूप से निरंतर करती रहती है। प्रकृति में सभी जीव अपने बाह्य एवं आंतरिक वातावरण में हो रहे इन दैनिक, मासिक तथा वार्षिक परिवर्तनों के प्रति सचेत रहते हैं, लेकिन मानव नहीं। वातावरण में होने वाले इन परिवर्तनों की समय-सारिणी के अनुरूप ही उनकी यह आंतरिक ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) शरीर के विभिन्न क्रियाकलापों का संचालन करती है।

सूर्य के उदयकाल की शुरुआत से सूर्यास्त के बाद तक और फिर सूर्यास्त के बाद से सूर्य उदय के काल तक समय एक चक्र की भांति चलता रहता है और उसी के अनुसार शरीर भी जागता, जीता और सोता रहता है। इस दौरान शरीर में उसी तरह परिवर्तन होते रहते हैं, जैसे कि प्रकृति में होते रहते हैं। प्रत्येक प्राणी सूर्य उदय के पूर्व उठ जाता है लेकिन मानव सोया रहता है। बिजली के आविष्कार के बाद तो मानव की संपूर्ण दिनचर्या ही बदल गई है। सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है और उसी के उदय के साथ हमारे शरीर का तापमान बढ़ता और उसके अस्त के बाद घटता जाता है।

जिस तरह सूर्य उदय और अस्त हो रहा है उसी तरह चन्द्र भी उदय और अस्त हो रहा है। मंगल, शुक्र, शनि, बुध और बृहस्पति भी उदय और अस्त हो रहे हैं। सभी के उदय और अस्त होने के बीच में जो एक छाया काल आता है, उसे कुछ लोग राहु और केतु का काल कहते हैं और इसका सबसे ज्यादा असर धरती के ध्रुवों पर होता है। हालांकि राहु और केतु की ज्योतिष में अलग व्याख्या है। इस संपूर्ण चलायमान जगत के साथ ही व्यक्ति की प्रकृति जुड़ी हुई है और उसी के आधार पर उसकी आंतरिक ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) निर्मित हुई है। प्रकृति ने खुद ही व्यक्ति के सोने-जागने, खाने-पीने और अन्य क्रियाएं करने का समय निर्धारण कर रखा है, लेकिन मनुष्य उस समय के विपरीत कार्य करता है।

प्रत्येक वर्षानुसार मनुष्य के शरीर में भी पतझड़, वसंत और बहार आती रहती है। सभी मौसम और दिन-रात के अनुसार शरीर को समयानुसार प्राकृतिक निद्रा, जागरण और पोषण की जरूरत होती है। यदि ऐसा संभव नहीं होता है तो शरीर रोगी बन जाता है। कुछ लोग जब देर से सोते या उठते हैं, तो उनकी ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) गड़बड़ा जाती है। ऐसे में वे रोग से ग्रस्त हो जाते हैं। उनमें आलस्य, अपच, कब्ज, निराशा, क्रोध, चिढ़चिढ़ापन आदि शारीरिक और मानसिक रोग प्रमुख रूप से रहते हैं।

आधुनिक दौर की इस भागमभागभरी जिंदगी में लोगों की अपनी ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) भी गड़बड़ाती जा रही है। परिणाम- अनिद्रा, उद्विग्नता, हृदय एवं तरह-तरह के मानसिक रोग। आओ जानते हैं कि प्राकृतिक रूप से हमारा शरीर किस तरह से कार्य करता है और इस ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) के वैज्ञानिक सत्य को… सच मानें हम जो जानकारी दे रहे हैं उससे आपका जीवन ही बदल जाएगा।

‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) का वैज्ञानिक सत्य : धरती के सारे जीवधारियों के शरीर की आंतरिक ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) बिलकुल एक ही पैटर्न पर काम करती है। 24 घंटे काम करने वाली इस घड़ी के मैकेनिज्म के बारे में धरती पर मिल रहे प्राचीनकाल के शैवालों से इस बारे में जानकारी मिली है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के भारतीय मूल के युवा वैज्ञानिक अभिषेक रेड्डी ने पता लगाया कि किसी भी जीवधारी की कोशिकाओं को 24 घंटे संचालित करने वाली घड़ी का मैकेनिज्म एक-सा रहता है। उन्होंने पता लगाया कि पृथ्वी पर करोड़ों सालों से जीवधारियों की ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) का पैटर्न एक ही तरह का पाया गया है।

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जिन लोगों की नियमित दिनचर्या नहीं होती, उनकी ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) का मैकेनिज्म बिगड़ जाता है। इस रिसर्च से मालूम हुआ है कि मनुष्यों की दिनचर्या हजारों सालों से एक जैसी है और उसका कारण उसके भीतर संचालित हो रही ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) है। शोधानुसार मनुष्य में ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) का मूल स्थान उसका मस्तिष्क है। मस्तिष्क हमें जगाता और मस्तिष्क ही हमें सुलाता है। औसतन हम 1 मिनट में 15 से 18 बार सांस लेते हैं तथा हमारा हृदय 72 बार धड़कता है।

यदि यह औसत गड़बड़ाता है तो शरीर रोगी होने लगता है। इसी के आधार पर व्यक्ति के सोचने-समझने की दशा-दिशा, तर्क-वितर्क, निर्णय-क्षमता एवं व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में ध्यान और प्रार्थना को सबसे उत्तम माना गया है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में अनुमानित 60 हजार अरब से 1 लाख अरब जितने कोश होते हैं और हर सेकंड 1 अरब रासायनिक संक्रियाएं होती हैं। उनका नियंत्रण सुनियोजित ढंग से किया जाता है और उचित समय पर हर कार्य का संपादन किया जाता है।

सचेतन मन द्वारा शरीर के सभी संस्थानों को नियत समय पर क्रियाशील करने के आदेश मस्तिष्क की पिनियल ग्रंथि द्वारा स्रावों (हार्मोन्स) के माध्यम से दिए जाते हैं। उनमें मेलाटोनिन और सेरोटोनिन मुख्य हैं जिनका स्राव दिन-रात के कालचक्र के आधार पर होता है। यदि किसी वजह से इस प्राकृतिक शारीरिक कालचक्र या ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) में विक्षेप होता है तो उसके कारण भयंकर रोग होते हैं। इस चक्र के विक्षेप से सिरदर्द व सर्दी से लेकर कैंसर जैसे रोग भी हो सकते हैं। अवसाद, अनिद्रा जैसे मानसिक रोग तथा मूत्र-संस्थान के रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हृदयरोग जैसे शारीरिक रोग भी हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार उचित भोजनकाल में पर्याप्त भोजन करने वालों की अपेक्षा अनुचित समय कम भोजन करने वाले अधिक मोटे होते जाते हैं और इनमें मधुमेह की आशंका बढ़ जाती है। ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) के गड़बड़ाने से व्यक्ति के भीतर की प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने लगती है। ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) के अनुसार किस समय कौन-सा अंग होता है सक्रिय, जानिए रोचक तथ्‍य……….

(मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock)

‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) के अनुसार हम रात्रि 2 बजे गहरी नींद में होते हैं। प्रात: 4.30 बजे हमारे शरीर का तापमान न्यूनतम होता है। 6.45 बजे रक्तचाप में बढ़ोतरी शुरू होती है और 6.30 के बाद इसमें गिरावट शुरू हो जाती है।

सुबह 3 से 5 बजे के बीच:- इस समय में फेफड़े (Lungs) क्रियाशील रहते हैं। यदि हम इस काल में उठकर गुनगुना पानी पीकर थोड़ा खुली हवा में घूमते या प्राणायाम करते हैं तो फेफड़ों (Lungs) की कार्यक्षमता बढ़ती है, क्योंकि इस दौरान मानव शरीर की घड़ीउन्हें शुद्ध और ताजी वायु मिलती है।

सुबह 5 से 7 बजे के बीच:- प्रात: 5 से 7 बजे के बीच बड़ी आंत (Large Intestine) क्रियाशील रहती है अत: इस बीच मल त्यागने का समय होता है। जो व्यक्ति इस वक्त सोते रहते हैं और मल त्याग नहीं करते हैं उनकी आंतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज (Constipation) तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

सुबह 7 से 9 और 9 से 11 बजे के बीच:- सुबह 7 से 9 बजे आमाशय (Stomach) की क्रियाशीलता और 9 से 11 तक अग्न्याशय एवं प्लीहा (Pancreas and spleen) क्रियाशील रहते हैं। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं अत: करीब 9 से 1 बजे का समय भोजन के लिए उपयुक्त है। इस समय अल्पकालिक स्मृति सर्वोच्च स्थिति में होती है तथा एकाग्रता व विचारशक्ति उत्तम होती है। अत: यह तीव्र क्रियाशीलता का समय है।

दोपहर 11 से 1 बजे के बीच:- दोपहर 11 से 1 बजे के बीच के समय में ऊर्जा का प्रवाह हृदय (Heart) में प्रवाहित होता है इसीलिए यह क्रियाशील रहता है। दोपहर 12 बजे के आसपास सभी प्राथमिक, उचित और मांगलिक कार्य निपटा लेना चाहिए। भारतीय संस्कृति में इस समय करुणा, दया, प्रेम आदि जैसी भावनाएं एवं संवेदनाओं को विकसित करने के लिए मध्याह्न-संध्या करने का विधान है।

दोपहर 1 से 3 के बजे के बीच:- दोपहर 1 से 3 बजे के बीच छोटी आंत (small intestine)सक्रिय होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आंत की ओर ढकेलना होता है। इस समय पानी पीने का महत्व है। ऐसा करने से त्याज्य पदार्थ को आगे बड़ी आंत में जाने में सहायता मिलती है। इस समय यदि आप चाय पीते हैं तो उससे नुकसान ही होगा और यदि इस समय आप भोजन करते या सोते हैं तो पोषक आहार रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होगा और इससे शरीर रोगी और दुर्बल बन जाएगा।

दोपहर 3 से 5 बजे के बीच:- दोपहर 3 से 5 बजे के बीच मूत्राशय (Bladder)  की सक्रियता का काल रहता है। मूत्र का संग्रहण (Collection of Urine) करना मूत्राशय का कार्य है। 2-4 घंटे पहले पीया गया जल मूत्र में बदल जाता है इसलिए इस समय मूत्रत्याग की इच्छा होती है।

शाम 5 से 7 बजे के बीच का समय:- इस समय शरीर के गुर्दों की एयर विशेष प्रवाहित होने लगती है। इसका मतलब कि सुबह लिए गए भोजन की पाचन क्रिया पूर्ण हो जाती है अत: इस काल में (सायं भुक्त्वा लघु हितं- अष्टांगसंग्रह) हल्का भोजन कर लेना चाहिए। शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें। जैन मतावलंबी इस नियम का अभी भी पालन करते हैं

और जो हिन्दू जानकार हैं वे भी इसी नियम से चलते हैं। सुश्रुत संहिता के अनुसार ‘न संध्ययो: भुत्र्जीत’ अर्थात संध्याकाल में भोजन नहीं करना चाहिए। ‘न अति सायं अन्नं अश्नीयात’ (अष्टांगसंग्रह) सायंकाल (रात्रिकाल) में बहुत विलंब करके भोजन वर्जित है। देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है, यह अनुभवगम्य है। सुबह भोजन के 2 घंटे पहले तथा शाम को भोजन के 3 घंटे दूध पी सकते हैं।

रात्रि 7 से 9 बजे के बीच:- इस समय मस्तिष्क विशेष सक्रिय रहता है अत: प्रात:काल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है। शाम को 7.12 बजे दीप जलाकर प्रार्थना करना चाहिए और उसके बाद शयन में जाने से पूर्व स्वाध्याय करना चाहिए।

रात्रि 9 से 11 बजे के बीच:- इस समय ऊर्जा का प्रवाह रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord)  में स्थित मेरुरज्जु में रहता है। इस समय पीठ के बल या बाईं करवट लेकर विश्राम करने से मेरुरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक शांति देने वाली होती है। रात्रि 9 बजे पश्चात पाचन संस्थान के अवयव विश्रांति प्राप्त करते हैं अत: यदि इस समय भोजन किया जाए तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहकर सड़ जाता है। उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं, जो अम्ल (एसिड) के साथ आंतों में जाम रोग उत्पन्न करते हैं इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

रात्रि 11 से 1 बजे के बीच का समय:- इस समय पित्ताशय (Gallbladder) सक्रिय होता है। पित्त का संग्रहण पित्ताशय (Gallbladder) का मुख्य कार्य है। इस समय यदि आप जाग्रत रहते हैं तो पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त-विकार तथा नेत्ररोग उत्पन्न होते हैं।

रात्रि को 12 बजने के बाद दिन में किए गए भोजन द्वारा शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं (Damaged Cells) के बदले में नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। इस समय जागते रहने से बुढ़ापा जल्दी आता है।

रात्रि 1 से 3 बजे के बीच का समय:- इस समय यकृत अर्थात लिवर (Liver) क्रियाशील होता है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यकृत का कार्य है। इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति न होने पर पाचन तंत्र बिगड़ जाता है। जिस समय शरीर नींद के वश में होकर नि‍ष्क्रिय रहता है उस समय जागते रहते से दृष्टि मंद होकर भ्रमित अवस्था में रहती है। ऐसे समय में ही अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।

दिन की दवा रात में न खाएं : यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया के शोधकर्ताओं के मुताबिक शरीर की ‘जैविक घड़ी’ (मानव शरीर की घड़ी/ Human Body Clock) दवाओं के असर को बुरी तरह प्रभावित करती है। उनका दावा है कि दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली 100 दवाओं में से 56 पर दिन और रात के अंतर का जबरदस्त प्रभाव पड़ता है।

इन दवाओं में सर्दी-जुकाम की सामान्य दवाओं से लेकर कैंसर की दवाएं तक शामिल हैं। शोधकर्ता जॉन होजेनेच के मुताबिक दवा खाने का वक्त इसके प्रभाव से लेकर दुष्प्रभाव तक को नियंत्रित करता है। दिनभर शरीर के अंगों की कार्यप्रणाली बदलती रहती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इस खोज से साबित होता है कि दवा खाने का समय भी महत्वपूर्ण होता है। सही वक्त पर दवा खाने से दवा फायदेमंद साबित होती है, वहीं गलत समय पर ली गई दवा नुकसानदेह हो जाती है।

24 घंटे के दैनिक चक्र ‘सिकेडीयन क्लाक’ (Circadian Clock) के रूप में जाना जाता है येल विश्वविद्यालय के स्कूल आफ मेडिसिन के वरिष्ठ लेखक ऑथर डा. इरोल फाईक्रिग के अनुसार ” नींद के आभाव में हमारी दैनिक लय बिगड़ने से हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रभावित होती है”

अपने अध्ययन में शोधदल के सदस्यों की रूचि ‘Circadian Rhythm Sleep Disorder ‘ के अंतर्गत प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा रोगजनक कारक और बावक्त प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का पता लगाने में थी। डा. फाईक्रिग और सहयोगियों ने क्षतिकारक रिसेप्टर- 9 (TLR9) की कार्य प्रणाली को समझा और पाया कि यह प्रतिरक्षा प्रोटीन जीवाणु और विषाणु DNA को पहचानता है जब शोधकर्ताओं ने चूहों का प्रतिरक्षण TLR9 से किया तो उनमे  ‘Circadian Clock’ ‘जैवलय’ नियंत्रित हुई और पाया कि TLR9 शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढाने का एक महत्वपूर्ण नमूना साबित हुआ। रोगग्रस्त मनुष्य में रात्री 2 से 6 बजे के बीच जान का खतरा अधिकतम होता है यह निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली और  ‘Circadian Clock” ‘जैवलय’  के बीच सीधे आणविक लिंक हैं।

वयस्कों में निद्रा विकार/Sleep Disorders In Adults

वयस्कों में अनियमित आदतों की वजेह से और असुविधाजनक वातावरण , नशीले पदार्थों का सेवन और रात को देर से सोना और सुबह लेट समय में उठना, उठने का बाद चाय या कॉफ़ी का सेवन बेड पर ही करना (Bed Tea ) फिर फ्रेश ना होना (मल त्याग न करना) 11-12 बजे ब्रेकफास्ट , उसके बाद सारा दिन एक ही मुद्रा में काम करना या कैरिएर को लेकर देर तक पढना नींद न आये उसके लिए बार बार चाय और कॉफ़ी या कोल्ड ड्रिंक पीना , खाने का समय भूक लगने पर फ़ास्ट फ़ूड का सेवन और फिर दोबारा लेट तक जागना, दिन में पानी ना पीना या उसकी जगह ज्यादा ठाडा पानी पीना या सारा दिन एक ही रूम या ऑफिस में निकल देना , कोई व्यायाम न करना या जिम ज्वाइन कर के महंगी suppliments लेना ऐसा बहुत से कारणों से ही वजह बनती है जिस कारण वयस्कों में निद्रा विकार बढता जा रहा है.

निद्रा विकार (Sleep Disorder) से ग्रसित हैं तो करें ये उपाय
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