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मकर सक्रांति (Makar Sankranti ) का रहस्य

मकर सक्रांति  (Makar Sankranti )

मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पूत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं । शास्त्र में इस अवधि को विशेष शुभ माना गया है । सम्पूर्ण भारत वर्ष में मकर सक्रांति का पर्व आदिकाल से ही सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों व वेदों में सूर्य को आत्मा माना गया है। निर्णय सिंधु के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा जब एक ही साथ माघ मास में मकर राशि पर आते हैं, तो उसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। मकर सक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवतायों की रात्री अर्थात मकरात्मकता का प्रतीक तथा उतरायन को देवतायों का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप , तप , दान , स्नान , श्राद्ध ,तर्पण आदि धार्मिक क्रिया कलापों का विशेष महत्त्व है | धारणा है की इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुनः प्राप्त होता है | इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है |

भारत त्यौंहारों का देश है। यह कहा जाता है कि यहां बारह महीनों में पंद्रह त्यौंहार होते हैं। त्यौंहार ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, सामाजिक संबंधों में मजबूती प्रदान करने व जीवन में उल्लास खुशी मनाने के लिए मनाए जाते हैं। इसी तरह त्यौंहार है मकर सक्रांति। मकर सक्रांति का पर्व पूरी सृष्टि के लिए ऊर्जा क स्रोत सूर्य की अराधना के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है । एक स्थान से दूसरे स्थान में प्रवेश को सक्रांति कहते हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाने को सूर्य की सक्रांति कहते हैं। एक सक्रांति से दूसरी सक्रांति की अवधि ही सौर मास है। वैसे तो प्रतिमाह सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और इस कारण सूर्य की बारह सक्रांति होती है लेकिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करने के समय को विशेष महत्व दिया गया है और इसी को सूर्य की मकर सक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसी समय में सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर रूख करता है जिसे सूर्य का उत्तराण में आना कहते है और सूर्य का उत्तरायण में आना भी पर्व के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में मकर सक्रांति सूर्य के उत्तरायण में आने का पर्व है और भगवान कृष्ण ने गीता में भी सूर्य के उत्तरायण में आने का महत्व बताते हुए कहा है कि इस काल में देह त्याग करने से पुर्नजन्म नहीं लेना पड़ता और इसीलिए महाभारत काल में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण में आने पर ही देह त्याग किया था। ऐसा माना जाता है कि सूर्य के उत्तरायण में आने पर सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पूरी तरह से पड़ती है और यह धरा प्रकाशमय हो जाती है।

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उत्तर भारत में यह पर्व मकर सक्रांति, पंजाब में लोहड़ी, दक्षिण भारत में पोंगल, पूर्वी भारत में बिहू, केरल में मकर ज्योति के नाम से मनाए जाते हैं। यह कहा जाता है कि मकर सक्रांति के बाद प्रत्येक दिन तिल के जितना बड़ा होता रहता है इसीलिए प्रतीक रूप में इस दिन तिल का दान करने, तिल से स्नान करने, तिल से बना भोजन खाने, तिल से अपने पितरों को श्राद्ध अर्पण करने का काफी महत्व है। इस दिन लोग गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी सहित पवित्र नदियों में सूर्योदय से पहले स्नान करते हैं और दान पुण्य करतंे हैं।

हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व १३ जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिये लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारम्परिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का आनन्द भी उठाया जाता है

पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश करते हैं, वैसे तो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य व शनि में शत्रुता बताई गई है लेकिन इस दिन पिता सूर्य स्वयं अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं तो इस दिन को पिता पुत्र के तालमेल के दिन के दिन व पिता पुत्र में नए संबंधो की शुरूआत के दिन के रूप में भी देखा गया है।

इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार करके असुरो के सिर को मंदार पर्वत पर दबा कर युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी थी। इसलिए यह दिन बुराईयों को समाप्त कर सकारात्मक ऊर्जा की शुरूआत के रूप में भी मनाया जाता है।

पुराणों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज व गंगा को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण किया था और तर्पण के बाद गंगा इसी दिन सागर में समा गई थी और इसीलिए इस दिन गंगासागर में मकर सक्रांति के दिन मेला भरता है।

मकर सक्रांति तब ही मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करें वैसे तो यह दिन 14 लं 15 जनवरी का ही होता है। वास्तव में सूर्य का प्रति वर्ष धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश बीस मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घण्टे बाद व बहत्तर साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। इस हिसाब से वर्तमान से लगभग एक हजार साल पहले मकर सक्रांति 31 दिसम्बर को मनाई गई थी पिछले एक हजार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने से यह 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा हे कि पाॅंच हजार साल बाद मकर सक्रांति फरवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।

मकर सक्रांति पर ऐसे करें पूजा

+ सूर्य की पूजा यदि प्रतिदिन करना संभव न हो, तो वर्ष में मकर संक्रांति के दिन विधि अनुसार सूर्य भगवान की पूजा जरुर करें । इस दिन स्नानादि करके लाल वस्त्र पहन कर सूर्य देव को जल अवश्य दें ।
+ यदि जनेऊ धारण किया है, तो वैदिक मंत्रों से भी पूजन करने का विधान है ।
+ सूर्य भगवान को नित्य तांबे के लौटे से कघ्र्य देना भी शुभकारी होता है ।
+ मकर संक्रांति के दिन तिल से बनी चीजें, गुड़, खिचड़ी, कंबल इत्यादि का दान भी शुभ माना गया है ।
+ गेहूं, गुड़ , घी, लाल चंदन, लाल वस्त्र, तांबे के बर्तन, मणिक्य, सूर्य यंत्र, सामथ्र्यनुसार सोना, लाल या भूरी गाय का भी दान कर सकते है ।
+ सूर्य द्वारा पीड़ित जातक सूर्य के रत्न माणिक्य का विधिपूर्वक रत्न प्रतिष्ठा करके धारण करें ।

तिल गुड़ के लड्डू

तिल से बने खाने गर्मी और ऊर्जा दोनों देते हैं, जिसकी हमें इस जनवरी की ठंड के मौसम में अत्यधिक आवश्यकता होती है. तिल और गुड़ को मिलाकर बनाये गये लड्डू मकर संक्रांति पर अवश्य बनाये जाते हैं, तिल गुड लड्डू (til gud laddoo) को तिल कुटा (Tilkut recipe) भी कहा जाता है. ये लड्डू बनाने में बड़े ही आसान हैं और खाने में बहुत ही स्वादिष्ट.

आवश्यक सामग्री – Ingredients for Tilkut

  • तिल – 500 ग्राम (4 कप)
  • गुड़ – 500 ग्राम (टूटा हुआ 2/1/2 कप)
  • घी – 2 छोटी चम्मच

विधि – तिल गुड़ के लड्डू

तिल को अच्छी तरह साफ कर लीजिये.

भारी तले की कढ़ाई लेकर गरम कीजिये, मीडियम आग पर, लगातार चमचे से चलाते हुये,  तिल को हल्के ब्राउन होने तक( तिल हाथ से मसले तो चूरा होने लगे) भून लीजिये.  तिल बहुत जल्द जल जाते हैं, ध्यान रहे कि तिल जले नहीं, जलने पर इनका स्वाद कड़वा हो जायेगा.  भुने तिल से आधे तिल हल्का सा कूट लीजिये या मिक्सी से हल्का सा चलाकर दरदरा कर लीजिये. साबुत और हल्के कुटे तिल मिला दीजिये.

गुड़ को तोड़कर छोटे छोटे टुकड़े कर लीजिये. कढ़ाई में एक चम्मच घी डालकर गरम कीजिये, गुड़ के टुकड़े डालिये और बिलकुल धीमी आग पर गुड़ को पिघला लीजिये, गुड़ पिघलने पर आग तुरन्त बन्द कर दीजिये.

पिघले गुड़ में भुने कुटे हुये तिल डालिये और अच्छी तरह मिलाइये. गुड़ तिल के लड्डू बनाने का मिश्रण तैयार है.

हाथ से घी लगाकर चिकना कीजिये, मिश्रण से थोड़ा थोड़ा मिश्रण, लगभग एक टेबल स्पून उठाइये(लड्डू गरम मिश्रण से ही बनाने पड़ते हैं, मिश्रण ठंडा होने पर जमने लगता है और लड्डू बनाना मुश्किल होता है). गोल लड्डू बनाकर थाली में लगाइये, सारे मिश्रण से लड्डू बनाकर थाली में लगा लीजिये.

तिल गुड़ के लड्डू (til gud laddoo) तैयार हैं, आप ये स्वादिष्ट लड्डू अभी खा सकते हैं. तैयार लड्डू को 4-5 घंटे खुले हवा में छोड़ दीजिये, लड्डू खुश्क होने के बाद आप उन्हैं एअर टाइट कन्टेनर में भर कर रख लीजिये और जब भी आपका मन करे, 3 महिने तक कन्टेनर से लड्डू (Tilkut) निकालिये और खाइये.

सुझाव: आप चाहें तो साबुत तिल से लड्डू बना सकते हैं, तिल गुड़ लड्डू में अपनी मन पसन्द के सूखे मेवे भी मिला सकते हैं, लड्डू और भी ज्यादा स्वादिष्ट हो जाते हैं.

Article Source :- http://www.swargvibha.in/http://nishamadhulika.com/

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