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भोजन के बारे में आयुर्वेदिक मत जिसका उल्लंघन करने से शरीर बीमार होता है

भोजन के प्रकार

 प्राचीनकाल में सभी आयुर्वेद के मतानुसार भोजन किया करते थे जिस कारण वो बीमार भी कम होते थे

आयुर्वेद का अनुसार भोजन तीन प्रकार का बताया गया है और साथ ही वह छः रसों (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय तथा तिक्त) और पांच भेदों (भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य  तथा चोष्य ) वाला बतलाया गया है | उसके भोजन करने से शरीर रुपी क्षेत्र की तृप्ति होती है

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  1. सात्विक भोजन :- यह ताजा, रसयुक्त, हल्की चिकनाईयुक्त और पौष्टिक होना चाहिए। इसमें अन्ना, दूध, मक्खन, घी, मट्ठा, दही, हरी-पत्तेदार सब्जियाँ, फल-मेवा आदि शामिल हैं। सात्विक भोजन शीघ्र पचने वाला होता है। इन्हीं के साथ नींबू, नारंगी और मिश्री का शरबत, लस्सी जैसे तरल पदार्थ बहुत लाभप्रद हैं। इनसे चित्त एकाग्र तथा पित्त शांत रहता है। भोजन में ये पदार्थ शामिल होने पर विभिन्न रोग एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से काफी बचाव रहता है।
  2. तामसी भोजन :- इसमें प्रमुख मांसाहार माना जाता है, लेकिन बासी एवं विषम आहार भी शामिल हैं। तामसी भोजन व्यक्ति को क्रोधी एवं आलसी बनाता है, साथ ही कई प्रकार से तन और मन दोनों के लिए प्रतिकूल होता है।
  3. राजसी भोजन :- इसमें सभी प्रकार के पकवान, व्यंजन, मिठाइयाँ, अधिक मिर्च-मसालेदार वस्तुएँ, नाश्ते में शामिल आधुनिक सभी पदार्थ, शक्तिवर्धक दवाएँ, चाय, कॉफी, कोको, सोडा, पान, तंबाकू, मदिरा एवं व्यसन की सभी वस्तुएँ शामिल हैं। राजसी भोज्य पदार्थों के गलत या अधिक इस्तेमाल से कब, क्या तकलीफें हो जाएँ या कोई बीमारी हो जाए, कहा नहीं जा सकता।

इनसे हालाँकि पूरी तरह बचना तो किसी के लिए भी संभव नहीं, किंतु इनका जितना कम से कम प्रयोग किया जाए, यह किसी भी उम्र और स्थिति के व्यक्ति के लिए लाभदायक रहेगा। वर्तमान में होनेवाली अनेक बीमारियों का कारण इसी तरह का खानपान है, इसलिए बीमार होने से पहले इनसे बचा जाए, वही बेहतर है। इसमें सभी प्रकार के पकवान, व्यंजन, मिठाइयाँ, अधिक मिर्च-मसालेदार वस्तुएँ, नाश्ते में शामिल आधुनिक सभी पदार्थ, शक्तिवर्धक दवाएँ, चाय, कॉफी, कोको, सोडा, पान, तंबाकू, मदिरा एवं व्यसन की सभी वस्तुएँ शामिल हैं।

भोजन के छः रस

  1. मधुर – मीठा – गेहूं, चावल, जौ, मक्का, ज्वार, मूंग, मसूर, शहद, चीनी, अधिकांश फल, दूध, मक्खन, घी आदि।
  2. अम्ल – खट्टा – नींबू वंश के फल, खट्टे स्वाद वाले फल जैसे- बेर, आलू बुखारा, जामुन, आड़ू, कीवी आदि तथा टमाटर।
  3. लवण – नमकीन – विभिन्न प्रकार के लवण।
  4. कटु – तीखा – अदरक, लहसुन, काली मिर्च तथा अन्य मसाले।
  5. कषाय या क्षार – कसैले –  पालक, खजूर, अपक या कच्चे फल, अंजीर आदि।
  6. तिक्त – कडवा – करेला, मेंथी आदि।

भोजन के पांच भेद

  1. भक्ष्य – खाने योग्य
  2. भोज्य – भोजन ( छहों रसों से युक्त )
  3. पेय – पीने लायक तरल
  4. लेह्य – चाटने योग्य जैसे चटनी या अचार
  5. चोष्य – चूसने योग्य जैसे आम

आयुर्वेद के मतानुसार

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ अध्याय १७

    अर्थात – खाने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया, स्वादहीन, वियोजित एवं सड़ा, जूठा तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन उन लोगों को प्रिय होता है, जो तामसी होते हैं ।

    आहार का उद्देश्य आयु को बढ़ाना, मस्तिष्क को शुद्ध करना तथा शरीर को शक्ति पहुँचाना है, प्राचीन काल में विद्वान पुरुष ऐसा भोजन चुनते थे, जो स्वास्थ्य तथा आयु को बढ़ाने वाला हो, यथा दूध के व्यंजन, चीनी, चावल, गेंहूँ, फ़ल तथा तरकारियाँ । ये भोजन सतोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त प्रिय होते हैं। ये सारे भोजन स्वभाव से ही शुद्ध हैं ।

भोजन की खास बातें जो ध्यान रखनी चाहिये

  • जब जल्दी में हों, तनाव में हों, अशांत हों, क्रोध में हों तो ऐसी स्थिति में भोजन न किया जाए, यही बेहतर है।
  • आयुर्वेद के अनुसार जो मनुष्य खाना खाता है, शरीर के प्रति
  • उसका कर्तव्य है कि वह व्यायाम अवश्य करें।
  • बुजुर्गों के लिए टहलना ही पाचन के लिए पर्याप्त व्यायाम है।
  • भोजन ऋतु, स्थान और समय के अनुसार ही करें। बार-बार न खाएँ। यदि समय अधिक निकल जाए तो भोजन न करना ज्यादा अच्छा है।
  • भोजन के साथ पानी न पीएँ। आधे घंटे पहले और एक घंटे बाद पीएँ।
  • भूख को टालना ठीक नहीं। यह शरीर के लिए नुकसानदायक है।

आजकल हम दोपहर का टिफ़िन ले जाते हैं, जो कि वाकई तीन घंटे से ज्यादा हमें रखना पड़ता है और वह बासी हो गया होता है, सब्जी का रस सूख गया होता है, दाल बासी हो गई होती है । अब हम स्वभाव से ही तामसी होते जा रहे हैं, कहने को भले ही मजबूरी हो परंतु सत्य तो यही है।

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    हमारा जीवन जीने का स्तर अब तामसी और राजसी हो चला है, जहाँ हमें अपना समय और खान पान चुनने की आजादी नहीं है और वैसे ही बच्चों को भी हम आदत डाल रहे हैं, जैसे बच्चों को सुबह आठ बजे स्कूल जाना होता है और उनका भोजन का समय १२ बजे दोपहर का होता है तो वे कम से कम ४-५ घंटे  बासी खाना खाते हैं, यह बचपन से ही तामसी प्रवृत्ति की और धकेलने की कवायद है। बच्चों को स्कूल में ही ताजा खाना पका पकाया दिया जाना चाहिये। जिस प्रकार पूर्व में आश्रम में शिष्यों को ताजा आहार मिलता था।

सरकारों ने भोजन पर ध्यान देना तो शुरु किया है चाहे वो अनजाने में ही क्यों न हो आजकल govt. स्कूल में जो #mid #day #meal शुरु किया है वो एक अच्छी सुरुआत है जिस इ बच्चों को भोजन ताज़ा मिलता है और उनमे सात्विक विचार आयेंगे.

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