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भगवान को ना मानने वाले आज आजमा लें भगवान है या नहीं

भगवान (God) है या नहीं ?

भगवान सभी जगह विद्यमान है ये हम सभी जानते हैं लेकिन कुछ लोग जो पश्चिमी सभ्यता में रंग गए हैं उन्हें आप बात बात पर भगवान का मजाक उड़ाते हुए सेख सकते हैं ये उनका कसूर नहीं है उनका ज्ञान ही इतना है वो इससे ज्यादा सोच ही नहीं सकते उनको हर बात में साइंस नज़र आती है की जो कुछ भी है वो साइंस ही है

भगवान के उपर आप कितनी भी बहस कर लो ये विषय ना ख़तम होने वाला है आज हम आपको बतायेंगे की भगवान ही या नहीं आप आज के दिन आजमा सकते हैं ये सिर्फ उन लोगों के लिए है जो भगवान मै यकीं नहीं रखते जो लोग भगवान को मानते हैं उन्हें ये सब करने की जरूरत नहीं है

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भगवान गणेश से जुडी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन की कहानी

भगवान गणेश जी को एक बार चन्द्रलोक से भोजन का निमंत्रण मिला और वो नियत समय पर भोज में पहुँच गए और भोजन किया भोजन में भगवान गणेश जी को मोदक बहुत प्रिय हैं इसलिये सुन्होने वहां पर मोदक पेट भर कर खाये और कुछ मोदक रास्ते के लिए ले लिए जब गणेश जी मोदक ले केर अपनी सवारी मूषक पर घर जा रहे थे तो रास्ते में एक सांप को देख कर चूहा डर गया और अचानक रुक गया जिस कारण भगवान गणेश मोदक को संभल नहीं पाये और वो मोदक गिर गए आकाश में चंद्रमा को ये सब देख कर हंसी आ गयी जिस का भगवान गणेश जी को बहुत बुरा लगा और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया की तुमेह जो भी देखेगा उसपर चोरी का कलंक लगेगा ऐसा सुनना था की चन्द्रमा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान गणेश जी से माफ़ी मांगी और अपना श्राप वापिस लेने को कहा जिस कारण भगवान गणेश न मन कर दिया तब ज्यादा जोर देने पर गणेश जी ने कहा की तुमेह अपनी गलती का एहसास रहे इसलिये ऐसा सिर्फ आज के दिन के लिए होगा जो भी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन करेगा उसी को ये कलंक लगेगा तब से लेकर आज तक ऐसा चल रहा है यही कारण भगवान में यकीं नहीं रखते वो आज 5 सितम्बर २०१६ को चन्द्र दर्शन करें तो उनको 1 साल के अंदर चोरी का या कोई और कलंक जरुर लगता है यदि यकीं ना हो तो आज आजमा लें

भगवान कृष्ण को भी लगा तो ये कलंक

एक बार जरासंध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के मध्य नगरी बसाकर रहने लगे। इसी नगरी का नाम आजकल द्वारिकापुरी है। द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने सूर्यनारायण की आराधना की। तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।

मणि पाकर सत्राजित यादव जब समाज में गया तो श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी।

गणेश चतुर्थी के दिन श्रीकृष्ण अपने महल में थे, उनकी नजर चंद्र पर पड़ गई। यह देख रुक्मिणी डर गईं और सोचने लगीं कि कहीं उनके पति पर कोई आंच ना आ जाए। और उसी दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहां एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।

जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है।

इस लोक-निंदा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए।

रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा पर पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए। वहां उन्होंने देखा कि जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया।

युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे लोग उन्हें मर गया जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह पुष्टि होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी।

श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंती का हाथ श्रीकृष्ण को सौंप दियाअर्थात  विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

श्रीकृष्ण वापस महल लौट आए और उन्होंने वह मणि राजा सत्राजित को लौटा दी। सत्राजित को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। पश्चाताप करने के लिए सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भगवान कृष्ण से संपन्न किया।

भारतीय शास्त्रों में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन निषेध माना गया हैं इस दिन चंद्र दर्शन करने से व्यक्ति को एक साल तक मिथ्या कलंक लगता हैं। भगवान श्री कृष्ण को भी चंद्र दर्शन का मिथ्या कलंक लगने के प्रमाण हमारे शास्त्रों में विस्तार से वर्णित हैं।

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन कलंक और उसके निवारण के उपाय

हमारे शास्त्रों में वर्णित है की :-

भाद्रशुक्लचतुथ्र्यायो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपिवा।

अभिशापीभवेच्चन्द्रदर्शनाद्भृशदु:खभाग्॥

अर्थातः जो जानबूझ कर अथवा अनजाने में ही भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करेगा, वह अभिशप्त होगा। उसे बहुत दुःख उठाना पडेगा।
गणेशपुराणके अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लेने पर कलंक अवश्य लगता हैं। ऐसा गणेश जी का वचन हैं।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन न करें यदि भूलसे चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के निमित्त श्रीमद्‌भागवत के १०वें स्कंध, ५६-५७वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का का श्रवण करना लाभकारक हैं। जिस्से चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा।
चंद्र-दर्शन दोष निवारण हेतु मंत्र
यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल ग्रहण करना चाहिये। मंत्र का २१, ५४ या १०८ बा जप करे। ऐसा करने से वह तत्काल शुद्ध हो निष्कलंक बना रहता हैं। मंत्र निम्न है

सिंहः प्रसेनमवधीत्‌ , सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः ॥

अर्थात: सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा हैं और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया हैं, अतः तुम रोऒ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार हैं।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः ७८)
एक और अाम धारणा है कि यदि दूज का चांद न देखा हो और गलती से चतुर्थी का चांद दिख जाए, तो किसी भी अनजान व्‍यक्ति के घर में चुपके से कंकर-पत्‍थर फैंकना चाहिए। यदि उस कंकर-पत्‍थर फैंकने के बदले में उस घर के लोग आपको अपशब्‍द कह दें, तब भी इस दोष का निवारण होना माना जाता है। और भी कई तरह की मान्‍यताऐं हो सकती हैं जिन्‍हें यथासम्‍भव आजमा लेना चाहिए अन्‍यथा यदि आपने दूज का चांद भी न देखा हो और आम धारणा के अनुसार किसी परम्‍परा का प्रयोग करते हुए भी चतुर्थी के दोष निवारण का कोई प्रयास न किया हो, तो कलंक आपको भी लग सकता है, क्‍योंकि इसी चतुर्थी के चांद को भगवान कृष्‍ण ने भी देखा था वो भी बच नहीं पाये थे और उन पर भी स्‍यमन्‍तक मणी चुराने का कलंक लगा था।
भगवान की लीला को कोई पार नहीं है ऐसा हम भी जानते हैं लेकिन जो भगवान में यकीं नहीं करते उनके लिए आज सुनहरी मौका है भगवान को आजमाने का क्योंकि उनके लिए तो ये सिर्फ मन गड़ंत कहानी के सिवा कुछ नहीं और भवन को मानने वालों के लिए आज का दिन खतरे से खली नहीं और वो आज चन्द्र दर्शन से बचते हैं.
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4 thoughts on “भगवान को ना मानने वाले आज आजमा लें भगवान है या नहीं

  1. Jay shree swaminarayan bahut achhi jankari milti hai apko aur apke satthi friends ko dhanyavaad

  2. Jay shree swaminarayan bahut achhi jankari milti hai apko aur apke satthi friends ko dhanyavaad bahut dhanyavaad

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