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बिच्छू घास (बिच्छू बूटी/Nettle) में है विटामिन और मिनरल्स का खज़ाना

क्या है बिच्छू घास

बिच्छू घास को अंग्रेजी में नेटल (Nettle ) कहा जाता है। इसका बॉटनिकल नाम अर्टिका डाइओका ( Urtica dioica) है। कुमाऊंनी में इसे सिसूण कहते हैं। वह विशुद्ध कुमाऊंनी शब्द है। बिच्छू घास उत्तराखंड और मध्य हिमालय क्षेत्र में होती है। यह घास मैदानी इलाकों में नहीं होती। बिच्छू घास में पतले कांटे होते हैं। यदि किसी को छू जाये तो  इसमें बिच्छू के काटने जैसी पीड़ा होती है और बहुत लगने से सूजन आ जाती है। इसका प्रयोग सजा देने के लिए भी होता रहा है।

बिच्छू घास किस काम आती है

उत्तराखंड में मुझे तकरीबन 1 से 1.5 साल रहने का मौका मिला आज से कुछ समय पहले तक यदि में बात करूँ तो अंदाज़ा 5-7 साल पहले तक इसका उपयोग स्थानीय लोग किसी को सजा देने के लिए करते थे और जो थोड़ा बहुत जड़ी बूटी का ज्ञान रखते हैं वो बुखार आने, शरीर में कमजोरी होने, तंत्र-मंत्र से बीमारी भगाने, पित्त दोष, गठिया, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और मलेरिया जैसे बीमारी को दूर भागने में उपयोग करते हैं

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बिच्छू घास की पत्तियों पर छोटे-छोटे बालों जैसे कांटे होते हैं। पत्तियों के हाथ या शरीर के किसी अन्य अंग में लगते ही उसमें झनझनाहट शुरू हो जाती है, जो कंबल से रगड़ने या तेल मालिश से ही जाती है। अगर उस हिस्से में पानी लग गया तो जलन और बढ़ जाती है।

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बिच्छू घास के बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है।

पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी साग-सब्जी भी बनायी जाती है। इसकी तासीर गर्म होती है और यदि हम स्वाद की बात करे तो पालक के साग की तरह ही स्वादिष्ट भी होती है  इसमें Vitamin A,B,D , आइरन (Iron ) , कैल्सियम और मैगनीज़ प्रचुर मात्रा में होता है.  माना जाता है कि बिच्छू घास में काफी आयरन होता है। जिसे हर्बल डिश कहते हैं.

आम तौर पर दो वर्ष की उम्र वाली बिच्छू घास को गढ़वाल में कंडाली व कुमाऊं में सिसूण के नाम से जाना जाता है। अर्टिकाकेई वनस्पति परिवार के इस पौधे का वानस्पतिक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। बिच्छू घास स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभप्रद है। इसमें ढेर सारे विटामिन और मिनरल्स हैं। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड, एनर्जी, कोलेस्ट्रोल जीरो, विटामिन ए, सोडियम, कैल्शियम और आयरन हैं।

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देहरादून स्थित सरदार भगवान सिंह पीजी इंस्टीट्यूट आफ बायोमेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री विभाग की दो शोध छात्राएं बिच्छू घास से बुखार भगाने की दवा तैयार करने के लिए परीक्षण में जुटी हैं। प्रिलिमनरी फायटोकेमिकल इंवेस्टिगेशन एंड इवैल्यूशन आफ ऐंटी पायरेटिक ऐक्टिविटी आन अर्टिका पर्वीफ्लोरा शीर्षक के तहत शोध कर रही प्रियंका पोखरियाल व अनुपमा सजवाण का कहना है कि चूहों पर परीक्षण के बाद अब महज यह देखना है कि किस रसायन के घोल ने चूहों के बुखार को जल्दी व बेहतर तरीके से खत्म किया। उनका कहना है कि स्थानीय चिकित्सा पद्धति में बिच्छू बूटी के अन्य इलाजों की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए वे अपने प्रयोग जारी रखेंगी।

बिच्छू घास की ताजा चाय की मांग

अल्मोड़ा के निकट चितई के पंत गांव में स्थापित कंपनी पिछले डेढ़ साल में बिच्छू घास से बनी 500 किलो चाय देश भर के बड़े शहरों में बेच चुकी है। अभी सालाना उत्पादन करीब चार क्विंटल है। इसका फ्लेवर खीरे की तरह होता है। कंपनी से जुड़ीं कर्नाटक की अमृता बताती हैं कि करीब छह साल पहले पति संतोष व चितई के पंत गांव निवासी डा. वसुधा पंत के सहयोग से पहाड़वासियों के परंपरागत चीजों के मार्केटिंग की योजना बनाई थी। इसी कड़ी में पहाड़ के परंपरागत सिसूण की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बिच्छू घास की चाय बनाने की सोची। बिच्छू घास की चाय के 50 ग्राम के एक पैकेट की कीमत 110 रुपए है और इसकी काफी मांग है।

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अंत में मै इतना ही कहना चाहूँगा की हम लोग जितना प्रकृति से दूर हो रहे हैं उतनी ही समस्यायों से भी घिर रहे हैं और खास तौर पर बिमारियों की यदि बात करे तो और विदेशी कंपनीज हमारे हे देश की जड़ी बूटी को सस्ते में खरीद कर हमे शहरों में वही दवाई की रूप में हजारों और लाखों रुपए में बेच देती है और ये सारा ज्ञान हमारे बजुर्गों के पास है जिन्हें हम अनदेखा कर रहे हैं और अपनी अमूल्य धरोहर को छोड़ कर विदेशी कंपनी की दवाइयां खा रहे हैं इसी तरह गिलोय जो हमे प्रकृति ने दी है जो डेंगू जैसे रोग में महौषधि की तरह काम करती है यदि हम वो ना लेकर बाहर हॉस्पिटल में इलाज करवाये तो 10-15 दिन में 25-30 हज़ार तक खर्च आता है तो इस उम्मीद के साथ की आप अपने आस-पास इन प्रकृति की संपत्ति को पहचान कर उसे सहेज कर रखेंगे और अपने मित्रों को इसकी जानकारी देंगे ताकि वो भी लाभान्वित हो सके.

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