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पेठे के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण

पेठे के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण

गर्मी के दिनों में पानी के साथ जो पेठा खाया जाता है, वह ना केवल एक स्‍वादिष्‍ट मिठाई ही है बल्कि सेहत के लिये भी लाजवाब होती है। पेठा हिंदुस्तान के कई अन्य राज्यों में भी बनाया जाता है, लेकिन जितना मशहूर आगरे का पेठा पूरी दुनिया में है उतना दूसरा और कोई नहीं। पेठे को भतुआ, कोंहड़ा या फिर कूष्मांड नामक सब्‍जी से बनाया जाता है। कोंहड़े से ना केवल पेठा बनता है बल्कि इसकी सब्‍जी, मुरब्बे, पाक, अवलेह, ठंढाई, घृत आदि भी बनाए जाते हैं। हमारे आयुर्वेद में पेठे को शरीर के लिये बहुत ही उपयोगी माना गया है। पेठे में औषधीय गुण भी होते हैं। पेठा पुष्टिकारक, बल देने वाला व रक्त के विकार को दूर करता है। साथ ही पेट को साफ करता है।

कुम्हड़ा के बीजों का उपयोग खाद्य पदार्थों के रूप में किया जाता है। इसके ताजे बीज कृमिनाशक होते हैं। इसलिए इसके बीजों का उपयोग ओषधि के रूप में होता है। तो आइये जानते हैं पेठा खाने से हमारे स्‍वास्‍थ्‍य पर क्‍या लाभ होता है।

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आगरा को ‘ताज नगरी’ के साथ साथ ‘पेठा नगरी’ के रूप में भी जाना जाता है. ताज की तरह पेठे की भी विश्व स्तरीय पहचान है.

इतिहास

पेठे के बदलते स्वाद की बात करें तो 1940 से पूर्व पेठा आयुर्वेदिक औषिधि के रूप में तैयार किया जाता था. इसका उपयोग वैद्य लोग अम्लावित्त, रक्तविकार, बात प्रकोप और जिगर कि बीमारी के लिए करते थे.

पेठा कुम्हड़ा नाम के फल से बनाया जाता है. औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण इसका उल्लेख इसके संस्कृत शब्द कूष्मांड के नाम से अनेक चिकित्सीय विधियों में आता है.

लेकिन 1945 के बाद इसके स्वाद में बदलाव का दौर प्रारंभ हुआ और गोकुल चंद गोयल ने पेठे में नया प्रयोग किया. इसको गोदकर और खांड के स्थान पर चीनी और सुगंध का प्रयोग करते हुए सूखा पेठा के साथ रसीला पेठा भी बनाया जिसे अंगूरी पेठा कहा जाने लगा.

इसे मिटटी की हांडी में रखकर बेचा जाता था. जिससे इसका स्वाद काफ़ी उम्दा हो जाता था. श्री गोयल ने नूरी दरवाज़ा मोहल्ले में पेठा बनाना शुरू किया जो आज तक जारी है.

गोकुल चंद गोयल के पड़पोते और प्राचीन पेठा स्टोर के मालिक राजेश अग्रवाल बताते हैं, “चीनी और सुगंध के बाद पेठे में केसर और इलाइची के साथ नए ज़ायक़े का उदय हुआ.”

उन्होंने कहा कि 1958 के बाद सूखे मेवे पिस्ते, काजू, बादाम आदि का भी प्रयोग किया जाने लगा जो धीरे धीरे देश विदेश की पसंद बनता चला गया.

वर्षों तक यही स्वाद लोगो की ज़ुबान पर छाया रहा. लेकिन सन 2000 के बाद पेठे के स्वाद की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव आया और सैंडविच पेठा जिसमें की काजू, किशमिश, चिरोंजी आदि का पेस्ट बनाकर पेठा बनाया गया.

इसके बाद तो स्वाद की एक श्रृंखला ही बनती गई और फिर पान गिलोरी, गुजिया पेठा, चोकलेट कोको, लाल पेठा , दिलकश पेठा, पिस्ता पसंद, पेठा रस भरी, पेठा मेवावाटी, शाही अंगूर, पेठा बर्फ़ी, पेठा कोकोनटस, संतरा स्पेशल, पेठा चेरी, पेठा शालीमार, गुलाब लड्डू बनना प्रारंभ हो गया.

गुलाब लड्डू में पेठे को घिसकर पेस्ट बनाकर गुलकंद और मेवा भरकर बनाया जाता है.

प्रक्रिया

पेठा बनाने की प्रक्रिया काफ़ी जटिल और मेहनत का काम है. पेठे को धोकर उसके 4 टुकड़े कर लिए जाते है. बीज वाला हिस्सा और छिल्कों को अलग कर जो गूदा बचता है उसे एक विशेष प्रकार की गोदनी से गोदा जाता है.

गोदन प्रक्रिया के बाद पेठे के टुकरो को लगभग एक घंटे तक चूने के पानी में डाला जाता है. इसके बाद सांचों की मदद से छोटे छोटे टुकड़े काटकर 100 किलो पेठा 400 लीटर पानी से तीन बार धोया जाता है. जब यह टुकड़े पूरी तरह साफ़ हो जाते है तो इनको उबाला जाता है.

उबालते समय पानी में ज़रा सी फिटकरी डाली जाती है ताकि चूने का कोई भी अंश शेष न रह जाए. फिर चीनी की पतली चाशनी के घोल में इनको डालकर दो से तीन घंटे तक उबाला जाता है.

अगर सूखा पेठा बनाना है तो चाशनी पूरी तरह मिल जाने पर पेठे को सुखा लिया जाता है और गीला पेठा बनाना हो तो चाशनी की निर्धारित मात्रा बचने पर पेठे को आग से उतारकर सुखाया जाता है.

इस तरह तैयार हो जाती है कोलस्ट्रोल रहित, औषधीय गुणों से युक्त पेठे की मिठाई.

आगरा का लज़ीज़ पेठा खाते समय यह सवाल ज़ेहन में ज़रूर आता है कि पेठा केवल आगरा का ही क्यों है? ऐसा क्या है यहाँ जो और कही नहीं?

पेठा बनाने के जानकार प्राचीन पेठा के मालिक राजेश अग्रवाल बताते है “आगरा के पानी में वो तासीर है जो पेठे जैसे कसैले फल को भी स्वादिष्ट मिठाई में बदल देती है.”

“यहाँ बनने वाला पेठा स्वादिष्ट और चमकीला होता है. यह 15 दिनों तक ख़राब भी नहीं होता. इसके विपरीत यदि आगरा के अलावा इसे बनाने का प्रयास भी किया गया तो न तो वह चमक आई न स्वाद.”

उन्होंने कहा, “दो तीन दिन बाद ही इसका प्राकर्तिक रूप भी बदलकर काला होने लगता है. वर्षों से पेठा बनाने वाले कारीगर भी यहाँ मौजूद है. लगभग 15,000 से ज़्यादा व्यक्ति इस व्यवसाय से जुड़े है. साधारण दिनों में आगरा में लगभग 18 से 20 टन पेठा बनता है. इसकी खपत त्योहारों और शादियों के समय ज़्यादा हो जाती है.”

पेठे के स्वाद का सफ़र निरंतर जारी है और अमीर से लेकर ग़रीब वर्ग सभी के लिए पेठा बाज़ार में 50 रुपये से 200 रूपए किलो उपलब्ध है.

पेठे के आयुर्वेदिक औषधीय गुण

* पेठा या कुम्हडा व्रत में भी लिया जा सकता है .
* आयुर्वेद ग्रंथों में पेठे को बहुत उपयोगी माना गया है। यह पुष्टिकारक, वीर्यवर्ध्दक, भारी, रक्तदोष तथा वात-पित्त को नष्ट करने वाला है।
* कच्चा पेठा पित्त को समाप्त करता है लेकिन जो पेठा अधिक कच्चा भी न हो और अधिक पका भी न हो, वह कफ पैदा करता है किन्तु पका हुआ पेठा बहुत ठंडा, ग्राही, स्वाद खारी, अग्नि बढ़ाने वाला, हल्का, मूत्राशय को शुध्द करने वाला तथा शरीर के सारे दोष दूर करता है।
* यह मानसिक रोगों में जैसे मिरगी, पागलपन आदि में तो बहुत लाभ पहुंचाता है। मानसिक कमजोरी-मानसिक विकारों में विशेषकर याद्दाश्त की कमजोरी में पेठा बहुत उपयोगी रहता है। ऐसे रोगी को 10-20 ग्राम गूदा खाना चाहिए अथवा पेठे का रस पीना चाहिए।
* शरीर में जलन-पेठे के गूदे तथा पत्तों की लुगदी बनाकर लेप करें। साथ-साथ बीजों को पीसकर ठंडाई बनाकर प्रयोग करें। इससे बहुत लाभ होगा।
* नकसीर फूटना- पेठे का रस पीएं या गूदा खाएं। सिर पर इसके बीजों का तेल लगाएं। बहुत लाभ होगा।
* दमा रोग – दमे के रोगियों को पेठा अवश्य खिलाएं। इससे फेफड़ों को शांति मिलती है।
खांसी तथा बुखार- पेठा खाने से खांसी तथा बुखार रोग भी ठीक होते हैं।
* पेशाब के रोग- पेठे का गूदा तथा बीज मूत्र विकारों में बहुत उपयोगी है। यदि मूत्र रूक-रूककर आता हो अथवा पथरी बन गई हो तो पेठा तथा उसके बीज दोनों का प्रयोग करें। लाभ होगा।

* वीर्य का कमी- इस रोग में पेठे का सेवन अति उपयोगी है।
* कब्ज तथा बवासीर-पेठे के सेवन से कब्ज दूर होती है। इसी कारण बवासीर के रोगियों के लिए यह बहुत लाभकारी है। इससे बवासीर में रक्त निकलना भी बंद हो जाता है।
भूख न लगना- जिन लोगों की आंतों में सूजन आ गई है, भूख नहीं लगती, वे सुबह दो कप पेठे का रस पीएं। भूख लगने लगेगी और आंतों की सूजन भी ठीक हो जाएगी।
* खाली पेट पेठा खाने से शारीर में लचीलापन और स्फूर्ति बनी रहती है .

Article Source :- http://www.bbc.com

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