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नवरात्रों में नवदुर्गा की पूजा करने के सरल और आसान विधि

नवरात्रों में नवदुर्गा की पूजा करने का विशेष महत्व है आप लोगों की जानकारी के लिए बता देना जरुरी है की साल भर में ४ नवरात्रों आते  हैं जिनमे से 2 नवरात्रों सभी के लिए होते हैं और जो प्रमुख भी है और 2 नवरात्रों गुप्त नवरात्रों होते हैं जिनमे तांत्रिक लोग विशेष पूजा करते हैं  1 अक्टूबर से जो नवरात्रों शुरु हो रहे हैं उन्हें शारदीय नवरात्रों कहते हैं इन नवरात्रों में शक्ति की उपासना की जाती है और यदि साथ में अपने इष्ट की भी आराधना की जाये तो श्रद्धालुओं को शुभ फल प्राप्त होता है।

नवरात्रों में नौ दिनों तक होने वाली नौ दुर्गा उपासना की विधि

नवरात्रों के प्रथम दिन कलश स्थापना कर व्रत का संकल्प लेना होता है । इस बार कलश स्थापना  का समय 01 अक्टूबर को सुबह 06:17 मिनट से लेकर 07:29 तक शुभ है। नवरात्र व्रत भी प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना से की जाती है।

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नवरात्रों के नौ दिन प्रात:, दोपहर और संध्या के समय भगवती माँ दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। और श्रद्धानुसार अष्टमी या नवमी के दिन हवन और कुमारी पूजा कर माँ दुर्गा को प्रसन्न करना चाहिए।

नवरात्रों में हवन और कन्या पूजन जरुर करना चाहिए। हमारे धर्म ग्रंथ नारदपुराण के अनुसार हवन और कन्या पूजन के बिना नवरात्रों की पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। साथ ही नवरात्रों  में “श्री दुर्गा सप्तशती” का पाठ जरुर प्रतिदिन करना चाहिए। यह पाठ करने से घर में किसी भी तरह की बाधा नहीं रहती और माँ दुर्गा की विशेष कृपा बरसती है और कोशिश करनी चाहिये की माँ दुर्गा को लाल रंग के फूल अर्पित करें.

नवदुर्गा के नाम का रहस्य

  1. प्रथम शैलपुत्री –  पहाड़ों की पुत्री है।
  2. दूसरा ब्रह्मचारिणी – ब्रह्मचर्य का पालन करने वाली  ब्रह्मचारीणी।
  3. तीसरी चंद्रघंटा – चाँद की तरह चमकने वाली।
  4. चौथी कूष्माण्डा – पूरा जगत जिनके पैर में है।
  5. पांचवी स्कंदमाता – कार्तिक स्वामी की माता।
  6. छठी कात्यायनी – कात्यायन आश्रम में जन्मि।
  7. सातवी कालरात्रि –  काल का नाश करने वली।
  8. आठवी महागौरी – सफेद रंग वाली मां।
  9. और नौवी सिद्धिदात्री –  सर्व तरह की सिद्धि देने वाली।

सबसे पहले शारदीय नवरात्रों पूजन श्रीरामचंद्रजी ने इस पूजा की शुरआत समुद्र तट पर की थी और उसके बाद दसवें दिन लंका पर चढाई कर विजय प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत के लिए आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्रों के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है।जो सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन हैं। नवरात्रों के नौवें दिन इन्ही की उपासना की जाती है।

नवरात्रों में कलश स्थापना

1 अक्टूबर प्रतिपदा तिथि को , शनिवार के दिन कलश स्थापना की जाएगी. इस दिन सूर्योदय से प्रतिपदा तिथि को सूर्य और चन्द्रमा कन्या राशि में होंगे और  हस्त नक्षत्र व  ब्रह्म योग होगा

नवरात्रा कलश स्थापना  शुभ महूर्त में किया जाता हैं | इसके लिए पूजन की आवश्यक सभी सामग्री और माँ दुर्गा की प्रतिमा ,कलश ,आम के पत्ते ,जौ ,गाय के दूध मिठाई या पांच मेवे आदि सभी सामग्री होना जरुरी  है |

कलश स्थापना की सामग्री –

  1. जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र। यह वेदी कहलाती है।
  2. जौ बोने के लिए शुद्ध साफ़ की हुई मिटटी जिसमे कंकर आदि ना हो।
  3. पात्र में बोने के लिए जौ ( गेहूं भी ले सकते है )
  4. कलश स्थापना के लिए मिट्टी का कलश  ( सोने, चांदी या तांबे  का कलश भी ले सकते है )
  5. कलश में भरने के लिए शुद्ध जल
  6. गंगाजल
  7. रोली , मौली
  8. इत्र
  9. पूजा में काम आने वाली साबुत सुपारी
  10. दूर्वा
  11. कलश में रखने के लिए सिक्का ( किसी भी प्रकार का कुछ लोग चांदी या सोने का सिक्का भी रखते है )
  12. पंचरत्न ( हीरा , नीलम , पन्ना , माणक और मोती )
  13. पीपल , बरगद , जामुन , अशोक और आम के पत्ते  ( सभी ना मिल पायें तो कोई भी दो प्रकार के पत्ते ले सकते है )
  14. कलश ढकने के लिए ढक्कन ( मिट्टी का या तांबे का )
  15. ढक्कन में रखने के लिए साबुत चावल
  16. नारियल
  17. लाल कपडा
  18. फूल माला
  19. फल तथा मिठाई
  20. दीपक , धूप , अगरबत्ती

इस दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर व्रत का संकल्प किया जाता है. तथा उसके पश्चात वेद पाठी ब्राह्मण द्वारा या स्वयं ही मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोये जाते है. इसी वेदी पर कलश की स्थापना की जाती है.

सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें जिसमे कलश रखने के बाद भी आस पास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी शुद्ध होनी चाहिए । पात्र के बीच में कलश रखने की जगह छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिट्टी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का छिड़काव करें।

कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनायें। कलश के गले में मौली बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें। कलश में साबुत सुपारी , फूल और दूर्वा डालें। कलश में इत्र , पंचरत्न तथा सिक्का डालें। अब कलश में पांचों प्रकार के पत्ते डालें। कुछ पत्ते थोड़े बाहर दिखाई दें इस प्रकार लगाएँ। चारों तरफ पत्ते लगाकर ढ़क्कन लगा दें। इस ढ़क्कन में अक्षत यानि साबुत चावल भर दें।

नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर मौली बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुँह आपकी तरफ होना चाहिए। यदि नारियल का मुँह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ हो तो शत्रु बढ़ाने वाला मानते है , पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते है। नारियल का मुंह वह होता है जहाँ से वह पेड़ से जुड़ा होता है ।

अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किये गये पात्र के बीच में रख दें। अब देवी देवताओं का आह्वान करते हुए प्रार्थना करें कि ” हे समस्त देवी देवता आप सभी नौ दिन के लिए कृपया कलश में विराजमान हों “।

आह्वान करने के बाद ये मानते हुए कि सभी देवता गण कलश में विराजमान है। कलश की पूजा करें। कलश को टीका करें, अक्षत चढ़ाएं, फूल माला अर्पित करें, इत्र अर्पित करें, नैवेद्य यानि फल मिठाई आदि अर्पित करें

नवरात्रों में देवी माँ की चौकी की स्थापना और पूजा विधि

  1. लकड़ी  की एक चौकी को गंगाजल और शुद्ध जल से धोकर पवित्र करें।
  2. साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा दें।
  3. इसे कलश के दांयी तरफ रखें।
  4. चौकी पर माँ दुर्गा की मूर्ती अथवा फ्रेम युक्त फोटो रखें।
  5. माँ को चुनरी ओढ़ाएँ।
  6. धूप , दीपक आदि जलाएँ।
  7. नौ दिन तक जलने वाली माता की अखंड ज्योत जलाएँ।
  8. देवी मां को तिलक लगाए ।
  9. माँ दुर्गा को वस्त्र, चंदन, सुहाग के सामान यानि हलदी, कुमकुम, सिंदूर, अष्टगंध आदि अर्पित करें ।
  10. काजल लगाएँ ।
  11. मंगलसूत्र, हरी चूडियां , फूल माला , इत्र , फल , मिठाई आदि अर्पित करें।
  12. श्रद्धानुसार दुर्गा सप्तशती के पाठ , देवी माँ  के स्रोत , सहस्रनाम आदि का पाठ करें। पाठ पूजन के समय दीप अखंड जलता रहना चाहिए
  13. देवी माँ की आरती करें तथा साथ में प्रसाद वितरण किया जाता हैं |
  14. पूजन के उपरांत वेदी पर बोए अनाज पर जल छिड़कें।

रोजाना देवी माँ का पूजन करें तथा जौ वाले पात्र में जल का हल्का छिड़काव करें। जल बहुत अधिक या कम ना छिड़के । जल इतना हो कि जौ अंकुरित हो सके। ये अंकुरित जौ शुभ माने जाते है। । यदि इनमे से  किसी अंकुर का रंग सफ़ेद हो तो उसे बहुत अच्छा माना जाता है। यह दुर्लभ होता है।

नवरात्रों में कलश स्थापना के वास्तु नियम 

1. ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) को देवताओं की दिशा माना गया है। इसी दिशा में माता की प्रतिमा तथा कलश स्थापना करना उचित रहता है।

2. यदि माता प्रतिमा के समक्ष अखंड ज्योत जला रहे हैं, तो इसे आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) में रखें। पूजा करते समय मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें।

3. कलश की स्थापना चंदन के बाजोट (पटिए) पर करें तो बहुत शुभ होता है। पूजा स्थल के ऊपर यदि टाण्ड हो तो उसे साफ-सुथरी रखें। कोई कपड़ा या गंदी वस्तुएं वहां न रखें।

4. कई लोग नवरात्र पर ध्वजा भी बदलते हैं। ध्वजा की स्थापना घर की छत पर वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में करें।

5. पूजा स्थल के सामने थोड़ा स्थान खुला होना चाहिए, जहां आसानी से बैठा जा सके। स्थापना स्थल के आसपास शौचालय या बाथरूम नहीं होना चाहिए।

6. नवरात्र में माता दुर्गा के सामने नौ दिन तक अखंड ज्योत जलाई जाती है। यह अखंड ज्योत माता के प्रति आपकी अखंड आस्था का प्रतीक स्वरूप होती है। माता के सामने एक एक तेल व एक शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए।

7. मान्यता के अनुसार, मंत्र महोदधि (मंत्रों की शास्त्र पुस्तिका) के अनुसार दीपक या अग्नि के समक्ष किए गए जाप का साधक को हजार गुना फल प्राप्त होता है इसी मान्यता है

दीपम घृत युतम दक्षे, तेल युत: च वामत:।

अर्थात – घी का दीपक देवी के दाहिनी ओर तथा तेल वाला दीपक देवी के बाईं ओर रखना चाहिए। .

8. अखंड ज्योत पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए। इसके लिए एक छोटे दीपक का प्रयोग करें। जब अखंड ज्योत में घी डालना हो, बत्ती ठीक करनी हो तो या गुल झाड़ना हो तो छोटा दीपक अखंड दीपक की लौ से जलाकर अलग रख लें। .

9. यदि अखंड दीपक को ठीक करते हुए ज्योत बुझ जाती है तो छोटे दीपक की लौ से अखंड ज्योत पुन: जलाई जा सकती है छोटे दीपक की लौ को घी में डूबोकर ही बुझाएं।.

नवरात्र व्रत के आरंभ में स्वस्तिक वाचन-शांति पाठ करके संकल्प करें और सर्वप्रथम भगवान श्रीगणेश की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह व वरुण का सविधि पूजन करें। फिर मुख्य मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करें। दुर्गा देवी की आराधना-अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ नौ दिनों तक करना चाहिए। इच्छानुसार फल प्राप्ति के लिए विशेष मंत्र से अनुष्ठान करना या योग्य वैदिक पंडित से विशेष मंत्र से अनुष्ठान करवाना चाहिए।

नवरात्रों में  मां दुर्गा की आरती करने की विधि 

आरती के कुछ विशेष नियम होते हैं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारनी चाहिए। चार बार चरणों पर से, दो बार नाभि पर से, एक बार मुख पर से तथा सात बार पूरे शरीर पर से आरती करने का नियम है। आरती की बत्तियां 1, 5, 7 अर्थात विषम संख्या में ही बत्तियां बनाकर आरती की जानी चाहिए।

नवरात्रों में व्रत उपवास –

नवरात्रों में लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार देवी माँ की भक्ति करते है। कुछ लोग पलंग के ऊपर नहीं सोते। कुछ लोग शेव नहीं करते , कुछ नाखुन नहीं काटते। इस समय नौ दिन तक व्रत,उपवास रखने का बहुत महत्त्व है।अपनी श्रद्धानुसार एक समय भोजन और एक समय फलाहार करके या दोनों समय फलाहार करके उपवास किया जाता है। इससे सिर्फ आध्यात्मिक बल ही प्राप्त नहीं होता , पाचन तंत्र भी मजबूत होता है तथा मेटाबोलिज्म में जबरदस्त सुधार आता है।

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नवरात्रों में कन्‍या पूजा

नवरात्र में सप्‍तमी तिथि से कन्‍या पूजन शुरू हो जाता है| कन्या पूजन तो नौ दिनों तक करना चाहिए और अगर कन्या का हमेशा ही आदर सत्कार करना जरूरी होता हैं क्योकि कन्या को लक्ष्मी व दुर्गा का रूप माना गया हैं और इस दौरान कन्‍याओं को घर बुलाकर उनकी आवभगत की जाती है. दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन इन कन्याओं को नौ देवी का रूप मानकर इनका स्वागत किया जाता है. माना जाता है कि कन्याओं का देवियों की तरह आदर सत्कार और भोज कराने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को सुख समृधि का वरदान देती हैं. |

नवरात्रों में कन्‍या पूजन क्यों और कैसे किया जाता है ?

नवरात्र पर्व के दौरान कन्या पूजन का बड़ा महत्व है. नौ कन्याओं को या कन्या विशेष को नौ देवियों के प्रतिबिंब के रूप में पूजने के बाद ही भक्त का नवरात्र व्रत पूरा होता है. वह अपने सामर्थ्य श्रद्धा के अनुसार उन्हें भोग लगाकर दक्षिणा देने मात्र से ही मां दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं.

नवरात्रों में किस दिन करें कन्या पूजन

वैसे तो कई लोग सप्‍तमी से कन्‍या पूजन करना शुरू कर देते हैं लेकिन जो लोग पूरे नौ दिन का व्रत करते हैं वह तिथि के अनुसार नवमी और दशमी को कन्‍या पूजन करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलते हैं. शास्‍त्रों के अनुसार कन्‍या पूजन के लिए दुर्गाष्‍टमी के दिन को सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और शुभ माना गया है.

कन्या पूजन की विधि

  • कन्‍या भोज और पूजन के लिए कन्‍याओं को एक दिन पहले ही आमंत्रित कर दिया जाता है. .
  • मुख्य कन्या पूजन के दिन इधर-उधर से कन्याओं को पकड़ के लाना सही नहीं होता है. .
  • गृह प्रवेश पर कन्याओं का पूरे परिवार के साथ पुष्प वर्षा से स्वागत करें और नव दुर्गा के सभी नौ नामों के जयकारे लगाएं..
  • अब इन कन्याओं को आरामदायक और स्वच्छ जगह बिठाकर सभी के पैरों को दूध से भरे थाल या थाली में रखकर अपने हाथों से उनके पैर धोने चाहिए और पैर छूकर आशीष लेना चाहिए..
  • उसके बाद माथे पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए. .
  • फिर मां भगवती का ध्यान करके इन देवी रूपी कन्याओं को इच्छा अनुसार भोजन कराएं. .
  • भोजन के बाद कन्याओं को अपने सामर्थ्‍य के अनुसार दक्षिणा, उपहार दें और उनके पुनः पैर छूकर आशीर्वाद लें

कन्या पूजन में कितनी हो कन्याओं की उम्र?

कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष तक होनी चाहिए और इनकी संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए और एक बालक भी होना चाहिए जिसे हनुमानजी का रूप माना जाता है. जिस प्रकार मां की पूजा भैरव के बिना पूर्ण नहीं होती , उसी तरह कन्या-पूजन के समय एक बालक को भी भोजन कराना बहुत जरूरी होता है. यदि 9 से ज्यादा कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति नहीं है.

नवरात्रों में कन्या पूजन से मिलने वाला फल

  • नवरात्र में सभी तिथियों को एक-एक और अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं की पूजा होती है.
  • दो वर्ष की कन्या (कुमारी) के पूजन से दुख और दरिद्रता मां दूर करती हैं. तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति रूप में मानी जाती है. त्रिमूर्ति कन्या के पूजन से धन-धान्‍य आता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है..
  • चार वर्ष की कन्या को कल्याणी माना जाता है. इसकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है. जबकि पांच वर्ष की कन्या रोहिणी कहलाती है. रोहिणी को पूजने से व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है..
  • छह वर्ष की कन्या को कालिका रूप कहा गया है. कालिका रूप से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है. सात वर्ष की कन्या का रूप चंडिका का है. चंडिका रूप का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है..
  • आठ वर्ष की कन्या शाम्‍भवी कहलाती है. इसका पूजन करने से वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है.
  • नौ वर्ष की कन्या दुर्गा कहलाती है. इसका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा असाध्य कार्य पूर्ण होते हैं.
  • दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है. सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूर्ण करती है.

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नवरात्रों में महानवमी और विसर्जन

महानवमी के दिन माँ का विशेष पूजन करके पुन: पधारने का आवाहन कर, स्वस्थान विदा होने के लिए प्रार्थना की जाती है। कलश के जल का छिड़काव परिवार के सदस्यों पर और पूरे घर में किया जाता है। ताकि घर का प्रत्येक स्थान पवित्र हो जाये। अनाज के कुछ अंकुर माँ के पूजन के समय चढ़ाये जाते है। कुछ अंकुर दैनिक पूजा स्थल पर रखे जाते है , शेष अंकुरों को बहते पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है। कुछ लोग इन अंकुर को शमीपूजन के समय शमी वृक्ष को अर्पित करते हैं और लौटते समय इनमें से कुछ अंकुर केश में धारण करते हैं

ध्यान रखने योग्य :- व्रत के समय अंडा, मांस, शराब, प्याज, लहसुन, मसूर दाल, हींग, राई, मेथी दाना आदि वस्तुओं का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसके अलावा  सादा नमक के बजाय सेंधा नमक काम में लेना चाहिए।

गृहस्थ व्यक्ति को जितना ही समय मिले, वह उतने ही समय में नवरात्र में पूजा-पाठ यदि नियम, यम तथा संयम से करे, तो मनचाहा फल प्राप्त कर सकता है। यहां नियम से मतलब है कि व्यक्ति नौ दिनों तक अपना पूजा-पाठ नियम से यानी निश्चित समय पर करे, इस समय को खंडित न करे। यदि सुबह 8 बजे ही वह पूजा कर सकता है, तो प्रतिदिन सुबह 8 बजे ही करे। इस नियम को खंडित न करे। व्यवस्थित तरीके से व्रत, उपवास करें। उपासना के दौरान या पूरे नौ दिनों तक पवित्रता का ख्याल रखें।

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