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दूब अर्थात दूर्वा घास के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण

दूब के आयुर्वेदिक गुण

दूब में उपस्थित अनेक औषधीय गुणों के कारण दूब को ‘महौषधि’ कहा गया है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है। विभिन्न प्रकार के पैत्तिक एवं कफज विकारों को दूर करने के लिए दूब का प्रयोग किया जाता है। समुद्र-मंथन के समय जब देवतागण अम्रत-कलश को ले कर जा रहे थे तो अम्रत-कलश से छलक कर कुछ बूंद प्रथ्वी के दूर्वा घास पर गिर गई थी इसलिए दूर्वा घास अमर हो गई -दूर्वा को बारह साल आप उखाड़ के अलग रख दे और बारह साल बाद भी अगर मिटटी में लगा दे तो भी ये पुनर्जीवित हो  जाती  है जबकि और किसी वनस्पति में ऐसा नहीं है

यह दाह शामक, रक्तदोष, मूर्छा, अतिसार, अर्श, रक्त पित्त, प्रदर, गर्भस्राव, गर्भपात, यौन रोग, मूत्रकृच्छ इत्यादि में विशेष लाभकारी है। दूर्वा कान्तिवर्धक, रक्त स्तंभक, उदर रोग, पीलिया इत्यादि में अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाता है।

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भगवान् कृष्ण ने भी गीता में कहा है जो भी भक्ति के साथ एक दूर्वा पत्ती,एक फूल,एक फल,या पानी के साथ मेरी पूजा करता है में उसे दिल से स्वीकार करता हूँ –
यह घास बारहमासी है और तेजी से बढ़ता है गहरे हरे रंग की होती है इस घास को पूरी तरह उखाड़ लेने के बाद भी वापस जल्दी ही दुबारा उग आती है – इस तरह ..इसका बार-बार अंकुरित होना -जीवन के उत्थान का एक शक्तिशाली प्रतीक , नवीकरण , पुनर्जन्म और प्रजनन क्षमता को परिलक्षित करता है
भगवान गणेश और विश्व पालक नारायण की पूजा में -दूर्वा घास , आवश्यक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है- लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे हिन्दू सनातन धर्म में किसी भी परंपरा को बनाने से पीछे उसका एक ठोस वैज्ञानिक आधार हुआ करता है-और दूर्वा घास के साथ भी यही है
पवित्र दूर्वा घास का आध्यात्मिक और औषधीय महत्व यह प्रत्येक और प्राचीन हिंदू धर्म में हर रस्म न केवल आध्यात्मिक महत्व का है , लेकिन यह भी बहुत हमारे भौतिक जीवन में महत्व है कि यह भी रहते उदाहरणों में से एक है . हिंदू अनुष्ठान में प्राचीन काल से, दूर्वा घास एक महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है. घास से बने छल्ले अक्सर या तो होमा की रस्म शुरू करने से पहले पहने जाते हैं – प्रसाद आग के लिए – और पूजा . घास प्रतिभागियों पर एक सफ़ाई प्रभाव माना जाता है . घास भी गणेश मंदिरों में एक भेंट के रूप में प्रयोग किया जाता है
हमारे देश भारत में दूर्वा घास को पवित्र माना जाता है क्योंकि हिन्दूओं के लगभग हर पूजा में दूर्वा घास का इस्तेमाल किया जाता है, विशेषकर भगवान गणेश की पूजा तो बिना दूर्वा घास के हो ही नहीं सकता।

विभिन्न भाषाओँ में नाम :

  • हिंदी – दूब, दुबडा |
  • संस्कृत – दुर्वा, सहस्त्रवीर्य, अनंत, भार्गवी, शतपर्वा, शतवल्ली |
  • मराठी – पाढरी दूर्वा, काली दूर्वा |
  • गुजराती – धोलाध्रो, नीलाध्रो |
  • अंग्रेजी – कोचग्रास, क्रिपिंग साइनोडन |
  • बंगाली – नील दुर्वा, सादा दुर्वा आदि नामों से जाना जाता है।

दूब के औषधीय गुण  :

इन सबके अलावा दूर्वा घास का एक अलग ही पहलू है। आयुर्वेदिक दवा बनाने में दूर्वा घास का प्रयोग किया जाता है। दूब कैल्सियम, फॉस्फोरस, फाइबर, पोटाशियम, प्रोटीन का स्रोत है। इसके अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी इसका योगदान अतुलनीय है।

  • दूब के काढ़े से कुल्ले करने से मूंह के छाले मिट जाते है |
  • नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है |
  • दूब के रस को हरा रक्त कहा जाता है . इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है |
  • इस पर नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है |
  • दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन (उल्टी ) ठीक हो जाता है |
  • दूब कुष्ठ (कोढ़), दांतों का दर्द, पित्त की गर्मी के लिए लाभदायक है। इसका लेप लगाने से खुजली शान्त होती है।
  • दूब में रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को कम करने की क्षमता होती है। इसी कारण यह मधुमेह रोग नियंत्रित करने में भी सहायक है।
  • दूर्वा घास शरीर में प्रतिरोधक क्षमता को उन्नत करने में सहायता करती है। इसमें एंटीवायरल और एंटीमाइक्रोबायल (रोगाणुरोधी-बीमारी को रोकने की क्षमता) गुण होने के कारण यह शरीर के किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता है।
  • दूर्वा के प्रयोग से स्त्रियों के स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं जैसे- सफ़ेद योनि स्राव, बवासीर आदि से राहत मिलती है | इसके लिए दही के साथ दूर्वा घास को मिलाकर सेवन कर सकते हैं।
  • दूब यू.टी.आई-यूरेनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (मूत्र मार्ग संक्रमण) के उपचार में प्रभावकारी रूप से काम करती है।
  • महिलाओं में जो माँ बच्चों को दूध पिला रही हैं उनके लिए भी लाभकारी होता है क्योंकि यह प्रोलेक्टिन हॉर्मोन को उन्नत करने में भी मदद करती है।
  • दूर्वा घास के लगातार सेवन से पेट की बीमारी का खतरा कुछ हद तक कम होने के साथ पाचन शक्ति भी बढ़ती है। यह कब्ज़,एसिडटी से राहत दिलाने में भी मदद करती है।
  • यह सर्दी-खांसी एवं कफ विकारों को समाप्त करने में मद्दद्गार है।
  • दूबमसूड़ों से रक्त बहने और मुँह से दुर्गंध निकलने की समस्या (पायरिया)से भी राहत दिलाती है।
  • दूर्वा घास त्वचा संबंधी समस्या से भी राहत दिलाने में सहायता करती है। इसमें एन्टी-इन्फ्लैमटेरी (सूजन और जलन को कम करने वाला), एन्टीसेप्टिक गुण होने के कारण त्वचा संबंधी कई समस्याओं, जैसे- खुजली, त्वचा पर चकत्ते और एक्जिमा आदि समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करती है। दूर्वा घास को हल्दी के साथ पीसकर पेस्ट बनाकर त्वचा के ऊपर लगाने से त्वचा संबंधी समस्याओं से कुछ हद तक राहत मिल सकती है। कुष्ठ रोग और खुजली जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में भी सहायता करती है।
  • दूब फ्लेवनाइड का प्रधान स्रोत होता है, जिसके कारण यह अल्सर को रोकने में मदद करती है। यह सर्दी-खांसी के बीमारी से भी लड़ने में मदद करती है, क्योंकि इसके सेवन से बलगम कम होता है।
  • दूब रक्त को शुद्ध करती है एवं लाल रक्त कोशिकाओं को बढ़ाने में मदद करती है जिसके कारण हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है। (Read more :- गेहूँ का ज्वारा के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण )
  • दूब रक्त में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करके हृदय को मजबूती प्रदान करती है।

रोगों में ली जाने वाली मात्रा :

  • दूब का रस 10-20 मिलीलीटर।
  • काढ़ा 40-80 मिलीलीटर।
  • पत्तियों का चूर्ण 1-3 ग्राम।
  • जड़ का चूर्ण 3-6 ग्राम।

दूब पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण शरीर को सक्रिय और ऊर्जायुक्त बनाये रखने में बहुत सहायता करती है। यह अनिद्रा रोग, थकान, तनाव जैसे रोगों में प्रभावकारी है।

Article Source :- http://www.upcharaurprayog.com/,

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