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तुलसी (Basil) एक रूप अनेक

तुलसी (Tulsi ) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण

तुलसी का हमारे जीवन में बहुत योगदान है. इसको विष्णुप्रिया भी कहते हैं तुलसी के पौधे को हमेशा घर के बीच स्थान पर लगाना चाहिये इससे घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और घर के लोग बिमारियों से बचे रहते हैं तुलसी का सेवन अमृत के समान है इसलिये इसको चरणामृत में स्थान दिया गया है.

Tulsi की मुख्य जातियां- तुलसी की मुख्यत: दो प्रजातियां अधिकांश घरों में लगाई जाती हैं। इन्हें रामा और श्यामा कहा जाता है। जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . अगर आपके घर में नही है तो बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएंगे!

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रामा के पत्तों का रंग हल्का होता है। इसलिए इसे गौरी कहा जाता है।

– श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग काला होता है। इसमें कफनाशक गुण होते हैं। यही कारण है कि इसे दवा के रूप में अधिक उपयोग में लाया जाता है।

– तुलसी की एक जाति वन तुलसी भी होती है। इसमें जबरदस्त जहरनाशक प्रभाव पाया जाता है, लेकिन इसे घरों में बहुत कम लगाया जाता है। आंखों के रोग, कोढ़ और प्रसव में परेशानी जैसी समस्याओं में यह रामबाण दवा है।

– एक अन्य जाति मरूवक है, जो कम ही पाई जाती है। राजमार्तण्ड ग्रंथ के अनुसार किसी भी तरह का घाव हो जाने पर इसका रस बेहतरीन दवा की तरह काम करता है।

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आप पर या आपके घर, परिवार पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित Tulsi के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। पुराणों और शास्त्रों के अनुसार ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है वहां लक्ष्मी जी का निवास नहीं होता। अगर ज्योतिष की मानें तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा बढ़ता रहता है। घर में Tulsi के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य के समान है। शायद आपने इस बात पर ध्यान ना दिया हो लेकिन मामूली सी दिखने वाली यह Tulsi हमारे घर के समस्त दोष को दूर कर हमारे जीवन को निरोग और सुखमय बनाने में सक्षम है।

तुलसी के गुण :-

Tulsi का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होता है। पूर्व दिशा की खिड़की के पास Tulsi का पौधा रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है।

कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करे तो विवाह जल्दी होता

यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखे Tulsi के पौधे में हर शुक्रवार कच्चा दूध अर्पण करें और किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु दें। इससे व्यवसाय में सफलता मिलती है। है और बाधाएं दूर होती हैं।

नौकरी में यदि उच्चाधिकारी की वजह से परेशानी हो तो ऑफिस में खाली जमीन या किसी गमले में सोमवार को Tulsi के 16 बीज किसी सफेद कपड़े में बांधकर दबा दें, मान-सम्मान में वृद्धि होगी।

मासिक धर्म के दौरान कमर में दर्द हो रहा हो तो एक चम्मच Tulsi का रस लें। इसके अलावा Tulsi के पत्ते चबाने से भी मासिक धर्म नियमित रहता है।

– बारिश के मौसम में रोजाना Tulsi के पांच पत्ते खाने से मौसमी बुखार व जुकाम जैसी समस्याएं दूर रहती है।

Tulsi की कुछ पत्तियों को चबाने से मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है। मुंह के छाले दूर होते हैं व दांत भी स्वस्थ रहते हैं।

– सुबह पानी के साथ Tulsi की पत्तियां निगलने से कई प्रकार की बीमारियां व संक्रामक रोग नहीं होते हैं।

दाद, खुजली और त्वचा की अन्य समस्याओं में रोजाना Tulsi खाने व Tulsi के अर्क को प्रभावित जगह पर लगाने से कुछ ही दिनों में रोग दूर हो जाता है।

– Tulsi की जड़ का काढ़ा ज्वर (बुखार) नाशक होता है।

Tulsi , अदरक और मुलैठी को घोटकर शहद के साथ लेने से सर्दी के बुखार में आराम होता है।

वैसे तो तुलसी के पत्तों के फायदों की फेहरिस्त बहुत लंबी है लेकिन हाल में वैज्ञानिक इसकी एक बड़ी उपयोगिता का दावा कर रहे हैं।

वेस्टर्न केंचुकी यूनिवर्सिटी में कुछ भारतीय मूल के वैज्ञानिकों ने तुलसी पत्ते से कैंसर के हर प्रकार पर रोकथाम में सफलता का दावा करते हुए इससे दवा बनाने पर काम शुरू किया है। शोधकर्ता चंद्रकांत इमानी के अनुसार, ”तुलसी के पत्तों में यूजेनॉल नामक तत्व है जो कैंसर को रोकने में बहुत प्रभावी है। इसकी मदद से एंटी कैंसर दवाओं को तैयार किया जा सकता है।” शोधकर्ताओं ने यूजेनॉल की मदद से पहले ब्रेस्ट कैंसर की कोशिकाओं को रोकने में सफलता प्राप्त की और अब वह इससे हर तरह की कैंसर की कोशिकाओं को रोकने का प्रयोग कर रहे हैं। इमानी बताते हैं, ”हमने यूजेनॉल को कैंसर की कोशिकाओं से भरी प्लेट पर रखा औप पाया कि इसकी मौजूदगी से कैंसर की कोशिकाओं का विकास रुक गया। मान सकते हैं कि इसके लंबे समय तक इस्तेमाल से कैंसर को रोकना पूरी तरह संभव हो सकता है।”(amarujala.com)
जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . अगर आपके घर में नही है तो बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएंगे

शीघ्र पतन एवं वीर्य की कमी:: तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से समस्या दूर होती है

नपुंसकता:

तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में बढोतरि होती है।

यौन दुर्बलता :

15 ग्राम तुलसी के बीज और 30 ग्राम सफेद मुसली लेकर चूर्ण बनाएं, फिर उसमें 60 ग्राम मिश्री पीसकर मिला दें। और शीशी में भरकर रख दें। 5 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करें इससे यौन दुर्बलता दूर होती है।

मासिक धर्म में अनियमियता:

जिस दिन मासिक आए उस दिन से जब तक मासिक रहे उस दिन तक तुलसी के बीज 5-5 ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक की समस्या ठीक होती है

गर्भधारण में समस्या:

जिन महिलाओ को गर्भधारण में समस्या है वो मासिक आने पर ५-५ ग्राम तुलसी बीज सुबह शाम पानी के साथ ले जब तक मासिक रहे , मासिक ख़त्म होने के बाद माजूफल का चूर्ण १० ग्राम सुबह शाम पानी के साथ ले ३ दिन तक तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर सब्जा शीतल होता है . इसे फालूदा में इस्तेमाल किया जाता है . इसे भिगाने से यह जेली की तरह फुल जाता है . इसे हम दूध या लस्सी के साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां दाल कर ले तो गर्मी में बहुत ठंडक देता है .इसके अलावा यह पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है .यह पित्त घटाता है ये त्रीदोषनाशक , क्षुधावर्धक है

अथर्ववेद (1-24) में वर्णन मिलता है – सरुपकृत त्वयोषधेसा सरुपमिद कृधि, श्यामा सरुप करणी पृथिव्यां अत्यदभुता। इदम् सुप्रसाधय पुना रुपाणि कल्पय॥ अर्थात् – श्यामा तुलसी मानव के स्वरूप को बनाती है, शरीर के ऊपर के सफेद धब्बे अथवा अन्य प्रकार के त्वचा संबंधी रोगों को नष्ट करने वाली अत्युत्तम महौषधि है।

सुश्रुत महर्षि का मत भी इससे अलग नहीं है। वे लिखते हैं – कफानिलविषश्वासकास दौर्गन्धनाशनः । पित्तकृतकफवातघ्नः सुरसः समुदाहृतः॥ (सूत्र-46) तुलसी, कफ, वात, विष विकार, श्वांस-खाँसी और दुर्गन्ध नाशक है। पित्त को उत्पन्न करती है तथा कफ और वायु को विशेष रूप से नष्ट करती है।

भाव प्रकाश में उद्धरण है – तुलसी पित्तकृद वात कृमिर्दोर्गन्धनाशिनी। पार्श्वशूलारतिस्वास-कास हिक्काविकारजित॥ तुलसी पित्तनाशक, वात-कृमि तथा दुर्गन्ध नाशक है। पसली का दर्द, अरुचि, खाँसी, श्वांस, हिचकी आदि विकारों को जीतने वाली है। आगे वे लिखते हैं – यह हृदय के लिए हितकर, उष्ण तथा अग्निदीपक है एवं कुष्ट-मूत्र विकार, रक्त विकार, पार्श्वशूल को नष्ट करने वाली है। श्वेत तथा कृष्णा तुलसी दोनों ही गुणों में समान हैं।

आधुनिक मत एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के निष्कर्ष

इण्डियन ड्रग्स पत्रिका (अगस्त 1977) के अनुसार Tulsi में विद्यमान रसायन वस्तुतः उतने ही गुणकारी हैं, जितना वर्णन शास्रों में किया गया है। यह कीटनाशक है, कीट प्रतिकारक तथा प्रचण्ड जीवाणुनाशक है। विशेषकर एनांफिलिस जाति के मच्छरों के विरुद्ध इसका कीटनाशी प्रभाव उल्लेखनीय है। डॉ. पुष्पगंधन एवं सोबती ने अपने खोजपूर्ण लेख में बड़े विस्तार से विश्व में चल रहे प्रयासों की जानकारी दी है।

‘एण्टीवायटिक्स एण्ड कीमोथेरेपी’ पत्रिका के अनुसार Tulsi का ईथर निष्कर्ष टी.वी. के जीवाणु माइक्रोवैक्टीरियम ट्यूवर-कुलोसिस का बढ़ना रोक देता है। सभी आधुनिकतम औषधियों की तुलना में यह निष्कर्ष अधिक सान्द्रता में श्रेष्ठ ही बैठता है। श्री रामास्वामी एवं सिरसी द्वारा दिए गए शोध परिणामों (द इण्डियन जनरल ऑफ फार्मेसी मई-1967) के अनुसार तुलसी की टीबी नाशक क्षमता विलक्षण है इस जीवाणु के ‘ह्यूमन स्ट्रेन की वृद्धि’ को भी यह औषधि रोकती है।
‘वेल्थ ऑफ इण्डिया’ के अनुसार तुलसी का स्वरस तथा निष्कर्ष कई अन्य जीवाणुओं के विरुद्ध भी सक्रिय पाया गया है। इनमें प्रमुख हैं – स्टेफिलोकोकस आंरियस, साल्मोनेला टाइफोसा और एक्केरेशिया कोलाई। इसकी जीवाणु नाशी क्षमता कार्बोलिक अम्ल से 6 गुना अधिक है। नवीनतम शोधों में तुलसी की जीवाणुनाशी सक्रियता अन्यान्य जीवाणुओं के विरुद्ध भी सिद्ध की गई है। डॉ. कौल एवं डॉ. निगम (जनरल ऑफ रिसर्च इन इण्डियन मेडीसिन योगा एण्ड होम्योपैथी-12/1977) के अनुसार तुलसी का उत्पत तेल कल्वेसिला न्यूमोंनी, प्रोंटिस बलेगरिस केन्डीडां एल्बीकेन्स जैसे घातक रोगाणुओं के विरुद्ध भी सक्रिय पाया गया है।

डॉ. भाट एवं बोरकर के शोध निष्कर्षों के अनुसार (जे.एस.आई.आर.) तुलसी के बीजों में एण्टोकोएगुलेस संघटक होता है, जो स्टेफिलोकोएगुलेस के रक्त में प्रभाव को निरस्त करता है। इनके अतिरिक्त तुलसी के मधुमेह प्रतिरोधी, गर्भ निरोध तथा ज्वरनाशी प्रभावों पर भी विस्तार से वैज्ञानिक अध्ययन चल रहा है। संभावना है कि शास्रोक्त सभी प्रभावों को अगले दिनों प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकेगा।

तुलसी एक राम बाण औषधि है। यह प्रकृति की अनूठी देन है। इसकी जड़, तना, पत्तियां तथा बीज उपयोगी होते हैं। रासायनिक द्रव्यों एवं गुणों से भरपूर, मानव हितकारी तुलसी रूखी गर्म उत्तेजक, रक्त शोधक, कफ व शोधहर चर्म रोग निवारक एवं बलदायक होती है। यह कुष्ठ रोग का शमन करती है। इसमें कीटाणुनाशक अपार शक्ति हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि तपेदिक, मलेरिया व प्लेग के कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता तुलसी में विद्यमान है। शरीर की रक्त शुद्धि, विभिन्न प्रकार के विषों की शामक, अग्निदीपक आदि गुणों से परिपूर्ण है तुलसी। इसको छू कर आने वाली वायु स्वच्छता दायक एवं स्वास्थ्य कारक होती है। घरों में हरे और काले पत्तों वाली तुलसी पाई जाती है। दोनों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। एक वर्ष तक निरंतर इसका सेवन करने से सभी प्रकार के रोग दूर हो सकते हैं। तुलसी का पौधा जिस घर में हो वहा जीवाणु को पनपने नहीं देता, जो की स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते है।

तुलसी का तेल बनाने की विधि :-

जड़ सहित तुलसी का हरा भरा पौधा लेकर धो लें, इसे पीसकर इसका रस निकालें। आधा लीटर पानी- आधा लीटर तेल डालकर हल्की आंच पर पकाएं, जब तेल रह जाए तो छानकर शीशी में भर कर रख दें। तेल बन गया। इसे सफेद दाग़ पर लगाएं। इन सब इलाज के लिए धैर्य की जरूरत है। कारण ठीक होने में समय लगता है।

उपयोग में सावधानियाँ

तुलसी की प्रकृति गर्म है, इसलिए गर्मी निकालने के लिये इसे दही या छाछ के साथ लें, इसकी उष्ण गुण हल्के हो जाते हैं।

तुलसी अंधेरे में ना तोड़ें, शरीर में विकार आ सकते हैं। कारण अंधेरे में इसकी विद्युत लहरें प्रखर हो जाती हैं।

तुलसी के सेवन के बाद दूध भूलकर भी ना पियें, चर्म रोग हो सकता है।

तुलसी रस को अगर गर्म करना हो तो शहद साथ में ना लें। कारण गर्म वस्तु के साथ शहद विष तुल्य हो जाता है।

तुलसी के साथ दूध, मूली, नमक, प्याज, लहसुन, मांसाहार, खट्टे फल ये सभी का सेवन करना हानिकारक है।

तुलसी के पत्ते दांतो से चबाकर ना खायें, अगर खायें हैं तो तुरंत कुल्ला कर लें। कारण इसका अम्ल दांतों के एनेमल को ख़राब कर देता है।

फायदे को देखते हुए एक साथ अधिक मात्रा में ना लें।

बिना उपयोग तुलसी के पत्तों को तोड़ना उसे नष्ट करने के बराबर है।

प्राकृतिक महत्त्व

जिस घर में तुलसी का पौधा लहलहा रहा हों वहां आकाशीय बिजली का प्रकोप नहीं होता। घर बनाते समय नींव में घड़े में हल्दी से रंगे कपड़े में तुलसी की जड़ रखने से उस घर पर बिजली गिरने का डर नहीं होता। तुलसी का पौधा जहां लगा हो वहा आसपास सांप बिच्छू जैसे ज़हरीले जीव नहीं आते। तुलसी का पौधा दिन रात आक्सीजन देता है, प्रदूषण दूर करता है। तुलसी के पौधे का वातावरण में अनुकूल प्रभाव पड़ता है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि प्रत्येक घर में एक तुलसी का पौधा ज़रूर हो समाजसेवा का इससे अच्छा, सुलभता, सुगमता और निशुल्क उपलब्ध होने वाला और क्या उपाय हो सकता है।

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