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तिल (Sesame) के आयुर्वेदिक एवं औषधीय गुण

तिल के आयुर्वेदिक एवं औषधीय गुण

तिल तीन प्रकार के होते हैं – काले, सफेद और लाल। लाल तिल का प्रयोग कम किया जाता है। ।काले तिलों का प्रयोग भारतीय समाज में पूजा पाठ में होता आया है। और काले तिल ही सेहत के लिए कारगर होते हैं। भारतीय खानपान में तिलों का बहुत महत्व है। सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर सक्रिय रहता है। तिलों में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्लेमिक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्वन पाये जाते हैं। तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड (mono-unsaturated fatty acid) होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. (HDL) को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य (atherosclerosis) के संभावना को कम करता है।तिलों का सेवन करने से तनाव दूर होता है और मानसिक दुर्बलता नही होती। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाये रखने के लिए तिलों का प्रयोग किया जाता रहा है। तिलों का तेल भी बहुत फायदेमंद होता है। आइए हम आपको तिलों के औषधीय गुणों के बारे में बताते हैं।

    1. तिलों में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होता है। और इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है। कफ जैसी बीमारी को दूर करने में तिल का सेवन करना फायदेमंद है।
    2. तिलों के सेवन से भूख बढ़ती है। और यह आपके नर्वस सिस्टम को बल देता है। यह वात, पित्त और कफ को नष्ट करता है।
  1. तिलों का तेल शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। क्योंकी यह एक आक्सीडेंट है। तिल के तेल से शरीर में मालिश करने से शरीर में बुढ़ापा जल्दी नहीं आता। इसकी मालिश करने से थकावट भी दूर होती है।
  2. यह बालों को काला, घना और मजबूत बनाता है।
  3. यह त्वचा को सनबर्न से मुक्ति दिलाता है।

सर्दियों में तिल के तेल को त्वचा पर लगाने से त्वचा का रूखापन दूर होता है। और चेहरे में कांती आती है।

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तिल के औषधीय गुण 

कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता है(Provides protection from cancer)- तिल में सेसमीन (sesamin) नाम का एन्टीऑक्सिडेंट (antioxidant) होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।

तनाव को कम करता है (Reduces stress)- इसमें नियासिन (niacin) नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।

हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है (Helps maintain the health of the heart muscle)

तिल में ज़रूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है।

शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है (Strengthens the baby’s bones)- तिलों में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिलों में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

गर्भवती महिला और भ्रूण (foetus) को स्वस्थ रखने में मदद करता है-

तिलों में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।

शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता है-

अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।

अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-

तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।

मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है(Makes effective medicines for diabetes)

डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।

गर्भाशय की पीड़ा(Uterine Pain)-तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।

प्रमेह- तिल तथा अजवायन को दो एक के अनुपात में मिलाकर पीस लें और समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करवायें।

शीघ्र प्रसव- शीघ्र प्रसव हो सके इसके लिये 70 ग्राम की मात्रा मे काले तिल कूटकर 24 घन्टें के लिये जल में भिगों दे। सुबह उन्हें छानकर प्रसव महिला को पीला दें। बच्चा शीघ्र हो जायेगा।

रक्त स्त्राव- प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।

रक्तार्श- लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।

पेट दर्द-  20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।

सूजाक- 15-15 ग्राम की मात्रा में काले तिल तथा देशी खाड बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध के साथ रोग की स्थिति के अनुसार सेवन करने से लाभ हो जाता है।

बवासीर- 1. काले तिल चबाकर उपर से ठंडा जल पीने से बादी बवासीर ठीक हो जाता है।
2. तिल पीसकर गर्म करके मस्सो पर लेप करने या बाधने से भी बवासीर में लाभ होता है। इसके साथ तिल के तेल का एनिमा (बासी) देने से आते चिकनी होकर शौच के गुच्छे निकल जाते है। जिससे धीरे धीरे रोग समाप्त हो जाने लगता है।

खूनी दस्त रक्तातिसार- काले तिल एक भाग में मिश्री 5 भाग मिलाकर पीसकर बकरी के दूध के साथ देने से रक्तातिसार में लाभ हो जाता है।

वात रक्त- तिलों भूनकर दूध में बुझाकर बारीक पीसकर लेप करने से वात रक्त का रोग दूर हो जाता है।

भगन्दर- भयंकर व्याधि भगन्दर या वेदनायुक्त वातजन्य धावों में तिल या असली को भूनकर परन्तु गर्भ स्थिति में दूध में बुझाकर व उसी दूध में पीसकर लेप करना चाहिए। भगन्दर रोग मिट जायेगा।

बहुमात्र-प्रातः साय तिल मोदक (तिल के लड्डू) खाने से अधिक पेशाब आना बन्द हो जाता है।

कब्ज- लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।

बालों में रूसी होना- बालो में तिल के तेल की मालिश कर लगभग 30 मिनट के पश्चात गर्म पानी में भीगी एंव निचोडी हुई तौलिया सिर पर लपेंटें। तौलिया के ठंडे होने पर पुनः तौलिया गर्म जल में भिगोकर निचोड़कर सिर पर लपेटे। यह क्रिया लगभग 5 मिनट तक करे। फिर कुछ देर के बाद शीतल जल से सिर धो लेने पर रूसी दूर हो जायेगी ।

सुखी खासी- यदि सर्दी के कारण सूखी खासी हो तो 4-5 चम्मच मिश्री एंव इतने ही तिल मिश्रित कर ले। इन्हे एक गिलास मे आधा पानी रहने तक उबाले। इसे प्रतिदिन प्रातः साय एंव रात्री के समय पीये।

आग से जलना- तिल जल में चटनी की भाती पीस लें। इस का दग्ध जले स्थान पर मोटा लेप करने से जलन शान्त हो जाती है।

मोच आना- तिल की खल लेकर उसे पीसे एंव पानी मे गर्म करे फिर उतारकर गर्म ही मोच आये स्थान पर बाधने से मोच के दर्द में लाभ होता है।

मानसिक दूर्बलता- तिल गुड दोनो सममात्रा में लेकर मिला लें।उसके लड्डू बना ले। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एंव तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है। कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है।

दंत चिकित्सा- प्रातः काल तथा साय काल लगभग 50-50 ग्राम की मात्रा में (बिना मिठा मिलाये) धीरे धीरे काले तिल चबाकर उपर से पानी पीने से दात मजबूत मल रहित हो जाते है। और हिलते हुए दात भी पुनः जम जाते है।

पथरी- तिल क्षार को रोग की दशानुसार देशी शहद में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पथरी रोग में लाभ होता है।

मकड़ी का विष- तिलो को पिलवाकर तेल निकाल लेने के उपरान्त बचे भाग खली में थोड़ी हल्दी मिलाकर पानी में पीसकर रोग स्थान पर लेप कर देने से मकड़ी का विष समाप्त हो जाता है।

मुहासे- मुहासो के लिए तिल की खली को जलाकर इसकी राख में गोमूत्र मिलाकर लेप करने से कुछ दिनों में मुहासे ठीक हो जाते है।

नारू रोग- खली तिल की को काफी में पीसकर लेप करने से नारू रोग में लाभ होता है।

बहुमूत्रता- जाड़े के दिनो में गुड़ तिल की गर्म ताजा गजक खाने से अधिक पेशाब आना और गले की खुजली ठीक हो जाती है।

बिस्तर पर पेशान आना:बच्चा सोते समय पेशाब करता हो़ तो भुने काले तिलों को गुड़ के साथ मिलाकर उसका लड्डू बना लीजिए। बच्चेस को यह लड्डू हर रोज रात में सोने से पहले खिलाइए, बच्चान सोते वक्त पेशाब नही करेगा।

मोटापा: काले तिल एक चम्मच खाने के बाद चबा चबा कर खाए, चर्बी खत्म हो जाएगी

मुंह के छाले : मुंह में छाले होने पर तिल के तेल में थोड़ा सा सेंधा नमक मिला कर मुंह के छालों में लगाइए, इससे मुंह के छाले ठीक हो जाएंगे।

तिल के अन्य गुण :-यदि आपको त्वचा से संबंधित बीमारी है तो आपको नियमित तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। यह त्वचा के रूखेपन को दूर करता है। और आपके चेहरे को चिकना बनाता है।

तिल आपके दांतों के लिए भी बहुत लाभकारी है। यह दातों को मजबूत और चमकदार बनाता है। आपको सुबह ब्रश करने के बाद काले तिलों को बारीक चबाकर खाना चाहिए यह प्राकृतिक रूप से दांतों को सुंदर और मजबूत बनाता है। यदि दांत में दर्द हो तो थोड़ा सा तिल के तेल से मुंह में कुला करें। दांतों के दर्द में राहत देता है।

तिल के तेल को सिर पर लगाने से आपकी बालों की समस्या तो दूर होती ही है, साथ के साथ यह बालों का झड़ना, उनका सफेद होना और गंजेपन की शिकायत दूर करता है।

यदि पेट में दर्द हो रहा हो तो थोड़े से काले तिलों को गुनगुने पानी के साथ सेवन करें।

जोड़ों में दर्द हो या कमर का दर्द हो तो आप तिल के तेल में थोड़ा-थोड़ा हींग और सोंठ डालकर उसे गरम करें और फिर इस तेल की मालिश करें। इससे आपको कमर और जोड़ों के दर्द से राहत मिलेगी।

पैरों पर मोच आने पर तिलों को पीसकर उसे गरम पानी में डाल दें। ध्यान रहे पानी उतना ही हो जिससे तिल का पेस्ट बन सके और इस पेस्ट को मोच वाली जगह लेप कर उस पर कपड़ा बांध ले। राहत मिलेगी।

जले हुए स्थान पर तिलों के पेस्ट में थोड़ा घी और गुड मिलाकर लगाएं।

जो बहने अपने शिशु को स्तनपान कराती है, उन्हें जरूर तिलों का सेवन करना चाहिए। क्योंकि एैसा करने से दूध में बढ़ोतरी होती है।

यदि आपको कब्ज की शिकायत है तो आप गुड़ में 50 ग्राम तिल मिलाकर सेवन करें। आपकी कब्ज की शिकायत दूर होगी।

इस तरह से तिलों को सेवन करने से आपको फायदा होगा। तिलों में बहुत ताकत होती है। सर्दियों में खासतौर पर तिलों का सेवन आप किसी न किसी रूप में जरूर करते रहें।

घाव होना- पानी में तिलों को पीसकर पुल्टिस बांधने से अशुद्ध घाव साफ होकर शीघ्र भर जाता है।

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