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चाय (Tea) सेहत के लिये फायदेमंद और नुक्सानदायक

चाय (Tea) का इतिहास

चाय के पौधे का उत्पादन भारत में पहली बार सन् 1834 में अंग्रेज़ सरकार द्वारा परीक्षण के रूप में व्यापारिक पैमाने पर किया गया था। यद्यपि जंगली अवस्था में यह असम में पहले से ही पैदा होती थी। इंग्लैण्ड को इसका निर्यात असम की चाय कम्पनी द्वारा किया गया। सन् 1815 में कुछ अंग्रेज़ यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया, जिससे स्थानीय क़बाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड बैंटिक ने 1834 में चाय की परंपरा भारत में शुरू करने और उसका उत्पादन करने की संभावना तलाश करने के लिए एक समिति का गठन किया। इसके बाद 1835 में असम में चाय के बाग़ लगाए गए। कहते हैं कि एक दिन चीन के सम्राट ‘शैन नुंग’ के सामने रखे गर्म पानी के प्याले में, कुछ सूखी पत्तियाँ आकर गिरीं, जिनसे पानी में रंग आया और जब उन्होंने उसकी चुस्की ली तो उन्हें उसका स्वाद बहुत पसंद आया। बस यहीं से शुरू होता है चाय का सफ़र। ये बात ईसा से 2737 साल पहले की है। सन् 350 में चाय पीने की परंपरा का पहला उल्लेख मिलता है। सन् 1610 में डच व्यापारी चीन से चाययूरोप ले गए और धीरे-धीरे ये समूची दुनिया का प्रिय पेय बन गया।

चाय चीन, जापान, लंका एव बर्मा में प्रचुर मात्रा में उगाई जाती है| भारत में विशेषत: देहरादून, नीलगिरी, दार्जिलिंग और आसाम में चाय की खेती की जाती है| चाय का प्रभाव मृदु उत्तेजक होने से ज्ञान तंतुओं पर इसका विशेष असर पड़ता है| तृषा,माईग्रेन ,नेत्रशूल, बवासीर, शौथ, शिरोवेदना, मूत्र कष्ट, नाड़ी की अति दुर्बलता, आँतों के रोग तथा चिरकारी वृक्क प्रदाह में चाय उपयोगी है| मस्तिष्क के लिए चाय लाब्ज दायक है| यह निद्रा का नाश करने वाली है| जो जागृत रहना चाहते हैं चाय उनके लिए उत्तम है| भारत में गुजरात के लोग चाय के काफी शौकी न प्रतीत होते है| चाय,दूध,शकर आवश्यक मात्रा में लेकर खूब उबालते हैं फिर छानकर पीते हैं| लेकिन इस प्रकार से बनाई गयी चाय शरीर और मस्तिष्क को नुक्सान पहुंचाती है|

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चाय बनाने का सही तरीका

पानी, दूध, शकर आवश्यक मात्रा में उबालें|जब उबाल आ जाये तब नीचे उतारलें और उसमें आवश्यक मात्रा में चाय पती डालकर पांच से १० मिनिट ढँक कर रखें| इसके बाद इसे छानने के बाद कुछ नाश्ता करें फिर शांति पूर्वक चाय पान करें यह चाय शरीर के लिए आरोग्यप्रद है| चाय को अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए पुदीना, इलायची , काली मिर्च, सौंठ का पावडर , लौंग तुलसी के पत्ती भी इच्छानुसार डाले जा सकते है|

चाय में केफीन तत्त्व होता है जो बेहद हानिकारक होता है| यह मूत्रल होता है,नाड़ी मंडल को उत्तेजित करता है और मांस पेशियों की ताकत में कमी लाता है| केफीन शरीर में तुरंत अवशोषित हो जाता है| यह शरीर से पसीने के द्वारा बाहर निकलता है| इसी केफीन के कारण चाय पीने पर स्फूर्ति का अनुभव होता है| अत; केफीन का उपयोग सर दर्द,मूत्र कृच्छ,जीर्ण वृक्क प्रदाह,ह्रदय तथा फेफड़े के शौथ पर होता है| चाय दिल की धडकन बढाती है| चाय में टेनिन नामक तत्त्व भी होता है जो शरीर को हानि करता है| इससे अनिद्रा रोग पैदा होता है| आरोग्य की दृष्टी से केफीन और टेनिक एसिड दोनों हानि कारक हैं|

ज्यादा उबाली हुई चाय में टेनिक एसिड लीवर को हानि पहुंचाता है| यह रुधिर वाहिनियों की दीवारों को कठोर बनाता है| रक्त संचरण में बाधा डालता है| सस्ती तथा बारीक चुरा जैसी चाय में टेनिक एसीड की मात्रा ज्यादा होती है| चाय का अधिक व्यवहार करने से दुर्बलता आती है चेहरा फीका पड जाता है, पाचन क्रिया मंद और विकृत हो जाती है| कब्ज की बीमारी लग जाती है| ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है|

चाय के अधिक सेवन से नींद न आना, वीर्य का पतलापन, सहनशीलता का नाश,,नाड़ी -शूल,हृदय की क्रिया अनियमित होना, और छाती में दर्द जैसे लक्षण उत्पना हो जाते है| कड़क और ज्यादा मीठी चाय पीने के ज्यादा दुष्प्रभाव होते हैं|

चाय के प्रकार

मोटे तौर पर चाय दो तरह की होती है : प्रोसेस्ड या सीटीसी (कट, टीयर ऐंड कर्ल) और ग्रीन टी (नैचरल टी)।

सीटीसी टी (आम चाय) : यह विभिन्न ब्रैंड्स के तहत बिकने वाली दानेदार चाय होती है, जो आमतौर पर घर, रेस्तरां और होटेल आदि में इस्तेमाल की जाती है। इसमें पत्तों को तोड़कर कर्ल किया जाता है। फिर सुखाकर दानों का रूप दिया जाता है। इस प्रक्रिया में कुछ बदलाव आते हैं। इससे चाय में टेस्ट और महक बढ़ जाती है। लेकिन यह ग्रीन टी जितनी नैचरल नहीं बचती और न ही उतनी फायदेमंद।

ग्रीन टी: इसे प्रोसेस्ड नहीं किया जाता। यह चाय के पौधे के ऊपर के कच्चे पत्ते से बनती है। सीधे पत्तों को तोड़कर भी चाय बना सकते हैं। इसमें एंटी-ऑक्सिडेंट सबसे ज्यादा होते हैं। ग्रीन टी काफी फायदेमंद होती है, खासकर अगर बिना दूध और चीनी पी जाए। इसमें कैलरी भी नहीं होतीं। इसी ग्रीन टी से हर्बल व ऑर्गेनिक आदि चाय तैयार की जाती है। ऑर्गेनिक इंडिया, ट्विनिंग्स इंडिया, लिप्टन कुछ जाने-माने नाम हैं, जो ग्रीन टी मुहैया कराते हैं।

हर्बल टी: ग्रीन टी में कुछ जड़ी-बूटियां मसलन तुलसी, अश्वगंधा, इलायची, दालचीनी आदि मिला देते हैं तो हर्बल टी तैयार होती है। इसमें कोई एक या तीन-चार हर्ब मिलाकर भी डाल सकते हैं। यह मार्किट में तैयार पैकेट्स में भी मिलती है। यह सर्दी-खांसी में काफी फायदेमंद होती है, इसलिए लोग दवा की तरह भी इसका यूज करते हैं।

ऑर्गेनिक टी: जिस चाय के पौधों में पेस्टिसाइड और केमिकल फर्टिलाइजर आदि नहीं डाले जाते, उसे ऑर्गेनिक टी कहा जाता है। यह सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद है।

वाइट टी: यह सबसे कम प्रोसेस्ड टी है। कुछ दिनों की कोमल पत्तियों से इसे तैयार किया जाता है। इसका हल्का मीठा स्वाद काफी अच्छा होता है। इसमें कैफीन सबसे कम और एंटी-ऑक्सिडेंट सबसे ज्यादा होते हैं। इसके एक कप में सिर्फ 15 मिग्रा कैफीन होता है, जबकि ब्लैक टी के एक कप में 40 और ग्रीन टी में 20 मिग्रा कैफीन होता है।

ब्लैक टी: कोई भी चाय दूध व चीनी मिलाए बिना पी जाए तो उसे ब्लैक टी कहते हैं। ग्रीन टी या हर्बल टी को तो आमतौर पर दूध मिलाए बिना ही पिया जाता है। लेकिन किसी भी तरह की चाय को ब्लैक टी के रूप में पीना ही सबसे सेहतमंद है। तभी चाय का असली फायदा मिलता है।

इंस्टेंट टी: इस कैटिगरी में टी बैग्स आदि आते हैं, यानी पानी में डालो और तुरंत चाय तैयार। टी बैग्स में टैनिक एसिड होता है, जो नैचरल एस्ट्रिंजेंट होता है। इसमें एंटी-वायरल और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। इन्हीं गुणों की वजह से टी-बैग्स को कॉस्मेटिक्स आदि में भी यूज किया जाता है।

लेमन टी: नीबू की चाय सेहत के लिए अच्छी होती है, क्योंकि चाय के जिन एंटी-ऑक्सिडेंट्स को बॉडी एब्जॉर्ब नहीं कर पाती, नीबू डालने से वे भी एब्जॉर्ब हो जाते हैं।

मशीन वाली चाय: रेस्तरां, दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों, एयरपोर्ट आदि पर आमतौर पर मशीन वाली चाय मिलती है। इस चाय का कोई फायदा नहीं होता क्योंकि इसमें कुछ भी नैचरल फॉर्म में नहीं होता।

अन्य चाय: आजकल स्ट्रेस रीलिविंग, रिजूविनेटिंग, स्लिमिंग टी व आइस टी भी खूब चलन में हैं। इनमें कई तरह की जड़ी-बूटी आदि मिलाई जाती हैं। मसलन, भ्रमी रिलेक्स करता है तो दालचीनी ताजगी प्रदान करती है और तुलसी इमून सिस्टम को मजबूत करती है। इसी तरह स्लिमिंग टी में भी ऐसे तत्व होते हैं, जो वजन कम करने में मदद करते हैं। इनसे मेटाबॉलिक रेट थोड़ा बढ़ जाता है, लेकिन यह सपोर्टिव भर है। सिर्फ इसके सहारे वजन कम नहीं हो सकता। आइस टी में चीनी काफी होती है, इसलिए इसे पीने का कोई फायदा नहीं है।

चाय के फायदे

– चाय में कैफीन और टैनिन होते हैं, जो स्टीमुलेटर होते हैं। इनसे शरीर में फुर्ती का अहसास होता है।

– चाय में मौजूद एल-थियेनाइन नामक अमीनो-एसिड दिमाग को ज्यादा अलर्ट लेकिन शांत रखता है।

– चाय में एंटीजन होते हैं, जो इसे एंटी-बैक्टीरियल क्षमता प्रदान करते हैं।

– इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट तत्व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कई बीमारियों से बचाव करते हैं।

– एंटी-एजिंग गुणों की वजह से चाय बुढ़ापे की रफ्तार को कम करती है और शरीर को उम्र के साथ होनेवाले नुकसान को कम करती है।

– चाय में फ्लोराइड होता है, जो हड्डियों को मजबूत करता है और दांतों में कीड़ा लगने से रोकता है।

-नॉन-वेज खाने के बाद दो-तीन कप चाय पीना फायदेमंद होता है। इससे नॉन-वेज में जो कैंसर पैदा करने करनेवाले केमिकल होते हैं, उनका असर कम करने में मदद मिलती है।

– चाय की पत्तियों के पानी को गुलाब के पौधे की जड़ों में डालना चाहिए।

– चाय की पत्तियों को पानी में उबाल कर बाल धोने से चमक आ जाती है।

– एक लीटर उबले पानी में पांच टी बैग्स डालें और पांच मिनट के लिए छोड़ दें। इसमें थोड़ी देर के लिए पैर डालकर बैठे रहें। पैरों को काफी राहत मिलती है।

– दो टी बैग्स को ठंडे पानी में डुबोकर निचोड़ लें। फिर दोनों आंखों को बंद कर लें और उनके ऊपर टी बैग्स रखकर कुछ देर के लिए शांति से लेट जाएं। इससे आंखों की सूजन और थकान उतर जाएगी।

– शरीर के किसी भाग में सूजन हो जाए तो उस पर गर्म पानी में भिगोकर टी बैग रखें। इससे दर्द कम होगा और ब्लड सर्कुलेशन सामान्य हो जाएगा।

– गर्म पानी में भीगे हुए टी बैग को रखने से दांत के दर्द में फौरी आराम मिलता है।

चाय की मेडिसनल वैल्यू

चाय को कैंसर, हाई कॉलेस्ट्रॉल, एलर्जी, लिवर और दिल की बीमारियों में फायदेमंद माना जाता है। कई रिसर्च कहती हैं कि चाय कैंसर व ऑर्थराइटस की रोकथाम में भूमिका निभाती है और बैड कॉलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कंट्रोल करती है। साथ ही, हार्ट और लिवर संबंधी समस्याओं को भी कम करती है।

चाय के नुकसान

हमारे गर्म देश में टी और गर्मी बढ़ाती है. पित्त बढ़ाती है. दिन भर में तीन कप से ज्यादा पीने से एसिडिटी हो सकती है।

– आयरन एब्जॉर्ब करने की शरीर की क्षमता को कम कर देती है।

– कैफीन होने के कारण टी पीने की लत लग सकती है।

– ज्यादा पीने से खुश्की आ सकती है।

– पाचन में दिक्कत हो सकती है।

– दांतों पर दाग आ सकते हैं लेकिन कॉफी से ज्यादा दाग आते हैं।

– देर रात पीने से नींद न आने की समस्या हो सकती है।

– टी के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं।

– इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है।

– टी का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।

– टी का सेवन रक्त आदि की वास्तविक उष्मा को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

– दूध से बनी टी का सेवन आमाशय पर बुरा प्रभाव डालता है और पाचन क्रिया को क्षति पहुंचाता है।

– टी में उपलब्ध कैफीन हृदय पर बुरा प्रभाव डालती है, अत: टी का अधिक सेवन प्राय: हृदय के रोग को उत्पन्न करने में सहायक होता है।

– टी में कैफीन तत्व छ: प्रतिशत मात्रा में होता है जो रक्त को दूषित करने के साथ शरीर के अवयवों को कमजोर भी करता है।

– टी पीने से खून गन्दा हो जाता है और चेहरे पर लाल फुंसियां निकल आती है.

– जो लोग टी बहुत पीते है उनकी आंतें जवाब दे जाती है. कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है.

– टी पीने से कैंसर तक होने की संभावना भी रहती है।

– टी से स्नायविक गड़बडियां होती हैं, कमजोरी और पेट में गैस भी।

– टी पीने से अनिद्रा की शिकायत भी बढ़ती जाती है।

– टी से न्यूरोलाजिकल गड़बड़ियां आ जाती है.

– टी में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप टी का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

– इससे दांत खराब होते है.

– रेलवे स्टेशनों या टी स्टालों पर बिकने वाली टी का सेवन यदि न करें तो बेहतर होगा क्योंकि ये बरतन को साफ किये बिना कई बार इसी में टी बनाते रहते हैं जिस कारण कई बार टी विषैली हो जाती है। टी को कभी भी दोबारा गर्म करके न पिएं तो बेहतर होगा।

– बाज़ार की टी अक्सर अल्युमीनियम के भगोने में खदका कर बनाई जाती है। टी के अलावा यह अल्युमीनियम भी घुल कर पेट की प्रणाली को बार्बाद करने में कम भूमिका नहीं निभाता है।

– कई बार हम लोग बची हुई टी को थरमस में डालकर रख देते हैं इसलिए भूलकर भी ज्यादा देर तक थरमस में रखी टी का सेवन न करें। जितना हो सके टीपत्ती को कम उबालें तथा एक बार टी बन जाने पर इस्तेमाल की गई टीपत्ती को फेंक दें।

– शरीर में आयरन अवशोषित ना हो पाने से एनीमिया हो जाता है.

– इसमें मौजूद कैफीन लत लगा देता है. लत हमेशा बुरी ही होती है.

– ज़्यादा टी पिने से खुश्की आ जाती है.आंतों के स्नायु भी कठोर बन जाते हैं।

– टी के हर कप के साथ एक या अधिक चम्मच शकर ली जाती है जो वजन बढाती है.

– अक्सर लोग टी के साथ नमकीन , खारे बिस्कुट , पकौड़ी आदि लेते है. यह विरुद्ध आहार है. इससे त्वचा रोग होते है.

– टी से भूख मर जाती है, दिमाग सूखने लगता है, गुदा और वीर्याशय ढीले पड़ जाते हैं। डायबिटीज़ जैसे रोग होते हैं। दिमाग सूखने से उड़ जाने वाली नींद के कारण आभासित कृत्रिम स्फूर्ति को स्फूर्ति मान लेना, यह बड़ी गलती है।

– टी-कॉफी के विनाशकारी व्यसन में फँसे हुए लोग स्फूर्ति का बहाना बनाकर हारे हुए जुआरी की तरह व्यसन में अधिकाधिक गहरे डूबते जाते हैं वे लोग शरीर, मन, दिमाग और पसीने की कमाई को व्यर्थ गँवा देते हैं और भयंकर व्याधियों के शिकार बन जाते हैं।

अनेक प्रसिद्ध डाक्टरों ने बतलाया है कि टी पीने, प्रत्यक्ष विष पीने में कोई अन्तर नहीं। फिर भी आप प्रति दिन टी पीते हुए स्वयं अपने स्वास्थ्य और अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहें हैं। हानि के विचार से शराब और टी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, अन्तर इतना है कि एक महंगी और दूसरी सस्ती है। शराब, मदहोश बनाकर थोड़े समय के लिए दुःख हरती है, किन्तु टी नींद को उड़ा देती है, अमूल्य जीवन तथा शरीर के स्वास्थ्य को नष्ट करने में यह शराब से अधिक भयंकर है क्योंकि यह उससे सस्ती है इसका प्रचार स्थान-स्थान पर है।

प्रायः जो महानुभाव टी के अभ्यासी होते हैं उनकी क्षुधा नष्ट हो जाती है। टी के अतिरिक्त और किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रह जाती, उन व्यक्तियों को जब तक टी का प्याला नहीं मिल जाता, वे अपनी वास्तविक स्थिति में नहीं आ पाते है। इसका मुख्य कारण यह है कि टी पीने से उनकी इन्द्रियाँ टी के विष के वशीभूत हो हृदय की गति को निर्बल कर देती हैं, इसके बिना मन खिन्न, चिड़चिड़ा और मस्तिष्क कार्य रहित सा रहता है। इसका नशा लगभग शराब की भाँति ही है, क्योंकि जब टी का प्रभाव शरीर पर नहीं रहता तो फिर टी पीने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इसी प्रकार टी का विष इन्द्रियों पर अप्रभावित प्रभाव डालकर स्फूर्ति पैदा करता है। परिणाम यह होता है कि शरीर की इन्द्रियाँ समय से पूर्व ही नष्ट हो जाती हैं। भारत के प्रसिद्ध डा. गोपाल भास्कर गडबुल लिखते हैं कि कर्ण इन्द्रिय और अन्य ज्ञान इन्द्रियों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव होकर कुछ दिनों में पक्षाघात (लकवा), बहरापन आदि रोग होते दिमाग पाये जाते हैं और इसके प्रमाण भी हैं। फ्राँस के प्रसिद्ध चिकित्सक ने कहा है कि जो व्यक्ति टी पीते हैं उनके दिमाग की नशे निर्बल पड़ जाती हैं और कानों में साँय की ध्वनि आने लगती हैं। स्त्रियाँ जो मनुष्यों की अपेक्षा निर्बल होती है वे टी की अभ्यासी होकर प्रायः ऐसे रोगों से अधिक ग्रस्त हो जाती हैं।

डाक्टरों की सम्मति है कि टी के सेवन करने से एक नवीन रोग यह उत्पन्न हुआ है कि पहले मस्तिष्क में एक प्रकार का वेग उठता है चेहरे का रंग पीत वर्ण होता चला जाता है किन्तु टी का पीने वाला उसकी चिन्ता नहीं करता है। कुछ समय के पश्चात अतिरिक्त तथा बाह्य कष्ट प्रकट होने लग जाते हैं। चित्त (मिजाज) शुष्क और मुखाकृति अधिक पीत-वर्ण हो जाती है। एक अन्य रोग जिसे चाहरम कहते हैं। जिसमें एक प्रकार की कठिन मूर्छा आँतरिक इन्द्रियों के कार्य शिथिल, हाथ में कंपन जिसका फल यह होता है कि स्वाभाविक शिथिलता प्रकट होने लगती है। टी का विष मूत्राशय (Bladder) पर अप्राकृतिक प्रभाव डालकर उसकी मूत्र रोक रखने की शक्ति कम कर देता है। जिससे उन्हें अधिक काम करते हुये बार-बार मूत्र त्याग करना पड़ता है और आग जलकर मूत्र में मूत्राम्ल (ric Acid), कैल्शियम आरजैलेट तथा अंडलाल (Albumen) आदि जाने लग जाते हैं जिससे अनेक मूत्र सम्बन्धी पीड़ायें उत्पन्न हो जाती हैं।

मद सेवियों के भाँति टी पीने वाले अपने कष्ट की चिकित्सा टी को ही समझा करते हैं। परिणाम यह होता है कि रोग वृद्धि होती जाती है। डा. वेमार्ड ने बहुत से रोगियों की परीक्षा करके ये बातें सिद्ध की हैं कि टी का विष शरीर में एकत्रित होता रहता है और नवयुवकों तथा दुर्बल शरीर वालों पर इसका बहुत हानिकर प्रभाव होता है। इसके सेवन से इसके विष युक्त प्रभाव के अनेक लक्षण-जैसे क्षुधा का नष्ट होना, पाचन विकार, कोष्ठबद्धता, हृदय धड़कन, हृदय स्थान पर पीड़ा, जी मचलाना, कै, मूर्छा, दर्द, गठिया, वाय आदि रोग हो जाते हैं। टी का जो प्रचार भारत में किया जा रहा है, यह उसी प्रकार है जैसे चीन में अफीम का किया गया था। स्वास्थ्य का महत्व समझने वाले हर एक विचार शील व्यक्ति को इस हानिकारक पेय से बचने के लिए सावधान रहना चाहिए।

दूध से खत्म होते हैं टी के गुण

दूध और चीनी मिलाने से टी के गुण कम हो जाते हैं। दूध मिलाने से एंटी-ऑक्सिडेंट तत्वों की ऐक्टिविटी भी कम हो जाती है। चीनी डालने से कैल्शियम घट जाता है और वजन बढ़ता है। इससे एसिडिटी (जलन) की आशंका बढ़ जाती है। दरअसल, टी में फाइब्रीन व एल्ब्यूमिन होते हैं, जबकि टी में टैनिन। ये आपस में मिलकर ड्रिंक को गंदला कर देते हैं। दूध में मौजूद प्रोटीन टी के फायदों को खत्म करता है।

ताजा पानी लें। उसे एक उबाल आने तक उबालें। पानी को आधे मिनट से ज्यादा नहीं उबालें। एक सूखे बर्तन में टी पत्ती डालें। इसके बाद बर्तन में पानी उड़ेल दें। पांच-सात मिनट के लिए बर्तन को ढक दें। इसके बाद कप में छान लें। स्वाद के मुताबिक दूध और चीनी मिलाएं। एक कप टी बनाने के लिए आधा चम्मच टी पत्ती काफी होती है। टी पत्ती, दूध और चीनी को एक साथ उबालकर टी बनाने का तरीका सही नहीं है। इससे टी के सारे फायदे खत्म हो जाते हैं। इससे टी काफी स्ट्रॉन्ग भी हो जाती है और उसमें कड़वापन आ जाता है।

चाय कब पिएं

यूं तो टी कभी भी पी सकते हैं लेकिन बेड-टी और सोने से ठीक पहले टी पीने से बचना चाहिए। दरअसल, रात को सोने और आराम करने से इंटेस्टाइन (आंत) फ्रेश होती है। ऐसे में सुबह उठकर सबसे पहले टी पीना सही नहीं है। देर रात में टी पीने से नींद आने में दिक्कत हो सकती है।

चाय के साथ में क्या खाएं

– जिन लोगों को एसिडिटी की दिक्कत है, उन्हें खाली चाय नहीं पीनी चाहिए। साथ में एक-दो बिस्कुट ले लें।

– ग्रीन टी हर्बल ड्रिंक है, इसलिए इसे खाली ही पीना बेहतर है। साथ में कुछ न खाएं तो इसका गुणकारी असर ज्यादा होता है।

चाय कितने कप पिएं

बिना दूध और चीनी की हर्बल चाय तो कितनी बार भी पी सकते हैं। लेकिन दूध-चीनी डालकर और सभी चीजें एक साथ उबालकर बनाई गई चाय तीन कप से ज्यादा नहीं पीनी चाहिए।

चाय कितनी गर्म पिएं

चाय को कप में डालने के 2-3 मिनट बाद पीना ठीक रहता है। वैसे जीभ खुद एक सेंस ऑर्गन है। चाय के ज्यादा गर्म होने पर उसमें जलन हो जाती है और हमें पता चल जाता है कि चाय ज्यादा गर्म है।

रखी हुई चाय न पिएं

चाय ताजा बनाकर ही पीनी चाहिए। आधे घंटे से ज्यादा रखी हुई चाय को ठंडा या दोबारा गर्म करके नहीं पीना चाहिए। इसी तरह एक ही पत्ती को बार-बार उबालकर पीना और भी नुकसानदेह है। अक्सर ढाबों और गली-मुहल्ले की चाय की दुकानों पर चाय बनानेवाले बर्तन में पुरानी ही पत्ती में और पत्ती डालकर चाय बनाई जाती है। इससे चाय में नुकसानदायक तत्व बनने लगते हैं।

जिन्हें आदत पड़ गई है और नहीं छोड़ सकते वे चाय के विकल्प के तौर पर तुलसी, बनफसा, अदरक, मुनक्का, ब्राह्मी जैसी लाभदायक औषधियों को पानी में उबाल कर चाय का काम ले सकते हैं। यह शरीर और मन के लिए हितकारी है|

Source :- https://hi-in.facebook.com/

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