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गोंद कतीरा के आयुर्वेदिक और औषधीय उपयोग

गोंद कतीरा /Gond Katira / Hog-Gum

गोंद कतीरा तासीर में ठंडा है, इसलिए गर्मी में इसका सेवन करें। सर्दी में सेवन उचित नहीं माना जाता। इसके सेवन से शरीर में ताक़त बनी रहती है पेशाब में जलन और पेशाब सम्बंधित बीमारी में यह रामबाण की तरह काम करता है गोंद कतीरा का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोगों को दूर करने के लिए किया जाता है।

देशी गोंद कतीरा को अंग्रजी में हॉग-गम Hog-Gum कहा जाता है।

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एक और गोंद गम-ट्रागाकैंथ Gum Tragacanth विदेशी कतीरा है जो की एक अन्य पेड़ एस्ट्रागैलस गमिफ़र Astragalus gummifer जो की एशिया-माईनर, ईरान, सीरिया, रूस आदि में पाया जाता है, से प्राप्त किया जाता है।

देसी गोंद कतीरा को काक्लोस्पर्मम रेलिजिओसम Cochlospermum religiosum (Synonym Bombax gossypium L., C. gossypium (L.) DC., Maximilianea gossypium (L.) Kuntze.), Cotton tree से प्राप्त किया जाता है।

देसी गोंद कतीरा के पेड़ के अन्य नाम हैं:

  • हिंदी: पीली कपास
  • English: Golden Silk tree, White
  • Silk Cotton tree गोल्डन सिल्क तरी, वाइट सिल्क कॉटन ट्री
  • यूनानी Unani: Samagh, कतीरा (substitute for gum tragacanth)

Siddha/Tamil: Tanaku

रंग : कतीरा का रंग सफेद और पीला होता है।

स्वाद : यह फीका व हल्का खट्टा होता है।

स्वरूप : कतीरा एक कांटेदार पेड़ का गोंद है।

स्वभावः यह ठंडा होता है।

हानिकारक : कतीरा का अधिक मात्रा में उपयोग करने से पेट में गोटी बन सकता है।

दोषों को दूर करने वाला : अनीसून, कतीरा में मौजूद दोषों को दूर करता है।

तुलना : बबूल का गोंद और लौकी के बीज से कतीरा की तुलना की जा सकती है।

मात्रा : इस 4 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए।

गुण : गोंद कतीरा शरीर के खून को गाढ़ा करता है, हृदय की कठोरता को दूर करता है और आंतों की खराश को दूर करके बलवान बनाता है। यह शरीर से निकलने वाले खून को रोकता है, सांस रोग को दूर करता, खांसी को नष्ट करता व कफ दूर करता है। यह छाती की खरखराहट और फेफड़ों के जख्मों को खत्म करता है। इसका प्रयोग जहर को उतारने के लिए भी किया जाता है विशेषकर गर्म मिजाज वालों व्यक्ति के जहर को। पेशाब की जलन, मासिकस्राव का कम आना, हाथ-पैरों की जलन, सिर की जलन, खुश्की, अधिक प्यास लगना आदि रोग ठीक होते हैं।

गोंद कतीरा के औषधीय उपयोग :

1. जीभ की प्रदाह और सूजन: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा को रात को भिगोकर रख दें और सुबह कतीरा को उसी पानी में अच्छी तरह से घोटकर मिश्री मिलाकर पीएं। इसी तरह सुबह को भिगोंकर शाम को पीएं और शाम को भिगोंकर सुबह को पीएं। इससे जीभ की जलन तथा सूजन खत्म होती है।

2. मूत्ररोग: 10 ग्राम से 20 ग्राम गोंद कतीरा सुबह शाम फुलाकर मिश्री के साथ शर्बत घोटकर पीने से मूत्ररोग में लाभ मिलता है।

3. मासिक-धर्म सम्बंधी परेशानियां: गोंद कतीरा तथा मिश्र को बराबर की मात्रा में मिलाकर पीस लें और 2 चम्मच की मात्रा में कच्चे दूध के साथ सेवन करें। इससे मासिक धर्म सम्बंधी सभी परेशानी दूर होती है।

4. कौआ गिरना: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा को पानी में फुला लें और फिर इसे मिश्री मिले शर्बत में घोटकर प्रतिदिन सुबह-शाम पीएं। इससे कौआ का बढ़ना ठीक होता है।

5. पेचिश: 6 ग्राम गोंद कतीरा को 250 मिलीलीटर पानी में भिगोकर रख दें। सुबह कतीरा को छानकर 10 ग्राम चीनी मिलाकर पीने से पेचिश का रोग ठीक होता है।

6. गर्मी अधिक लगना: अगर शरीर अधिक गर्म महसूस हो तो कतीरा को पानी में भिगोकर मिश्री मिले शर्बत के साथ घोटकर सुबह-शाम सेवन करें। इससे शरीर की गर्मी दूर होती है।

7. रक्तप्रदर: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा रात को पानी में भिगो दें और सुबह उसी पानी में मिश्री मिलाकर शर्बत बनाकर सेवन करें। इससे रक्तप्रदर दूर होता है।

8. सिर का दर्द: लगभग 4 ग्राम मेंहदी के फूल और लगभग 3 ग्राम कतीरा को मिट्टी के बर्तन में भिगोकर रख दें और सुबह मिश्री के साथ पीस कर पीएं। इससे सिर दर्द के अलावा जलन और सिर के बालों का झड़ना भी बंद होता है।

9. पैरों की जलन: गोंद कतीरा रात को एक गिलास पानी में भिगोकर रख दें और सुबह इसमें चीनी मिलाकर सेवन करें। इससे हाथों-पैरों की जलन दूर होती है। इसका प्रयोग गर्मियों में बहुत ही लाभदायक है।

10. गले की गांठ: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा को पीसकर व मिश्री मिले पानी में मिलाकर सुबह-शाम पीने से गले के सभी रोग ठीक होते हैं।

11. कण्ठमाला:

  • 2 भाग कतीरा और 2 भाग नानख्वा को बारीक पीसकर धनिये के पत्तों के रस में मिलाकर प्रतिदिन गले पर लेप करने से कंठमाला (गले की गांठ) में आराम मिलता है।
  • लगभग 10 से 20 ग्राम कतीरा को पानी में फुला लें और फिर इसे मिश्री मिले शर्बत में मिलाकर सुबह-शाम पीएं। इससे गले के रोगों में पूरा लाभ मिलता है।

12. स्वरयंत्र की जलन: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा को सुबह-शाम सेवन करने से स्वरयंत्र की जलन दूर होती है। कतीरा को सेवन करने से कुछ घंटे पहले पानी मे भिगों देना चाहिए और फिर मिश्री मिले शर्बत में मिलाकर पीना चाहिए।

13. विनसेण्ट एनजाइना: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा फुलाकर मिश्री मिले शर्बत में मिलाकर सुबह-शाम पीने से विनसेण्ट एनजाइना रोग ठीक होता है।

14. गले की पेशियों का पक्षाघात: 10 से 20 ग्राम गोंद कतीरा को पानी में फूला लें और मिश्री मिले हुए शर्बत में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। इससे गले की पेशियों का पक्षाघात रोग ठीक होता है।

15. स्वप्नदोष :- स्वप्नदोष के लिए, करीब ६ ग्राम गोंद कतीरा, रात को एक कप पानी में भिगा दी जाती है। रात भर में यह गोंद फूल जाता है जिसमे मिश्री १२ ग्राम मिलाकर खाया जाता है। १०-१५ दिन तक इसके सेवन से स्वप्न दोष में लाभ होता है।

अन्य गोंद जो बाकि पेड़ से मिलती हैं :-

कीकर या बबूल का गोंद पौष्टिक होता है . – नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है। इसे ईस्ट इंडिया गम भी कहते है

इसमें भी नीम के औषधीय गुण होते है पलाश के गोंद से हड्डियां मज़बूत होती है. पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है। 

आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है। 

– सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है, यह पित्त का शमन करता है।अतिसार में मोचरस चूर्ण एक से तीन ग्राम को दही के साथ प्रयोग करते हैं। श्वेतप्रदर में इसका चूर्ण समान भाग चीनी मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी होता है। दंत मंजन में मोचरस का प्रयोग किया जाता है।

– बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से गोंद निकलती है जो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है। – हिंग भी एक गोंद है जो फेरूला कुल (अम्बेलीफेरी, दूसरा नाम एपिएसी) के तीन पौधों की जड़ों से निकलने वाला यह सुगंधित गोंद रेज़िननुमा होता है । फेरूला कुल में ही गाजर भी आती है । हींग दो किस्म की होती है (Read Post :- हींग (Asafoetida) के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण)

– एक पानी में घुलनशील होती है जबकि दूसरी तेल में । किसान पौधे के आसपास की मिट्टी हटाकर उसकी मोटी गाजरनुमा जड़ के ऊपरी हिस्से में एक चीरा लगा देते हैं । इस चीरे लगे स्थान से अगले करीब तीन महीनों तक एक दूधिया रेज़िन निकलता रहता है । इस अवधि में लगभग एक किलोग्राम रेज़िन निकलता है । हवा के संपर्क में आकर यह सख्त हो जाता है कत्थई पड़ने लगता है ।

यदि सिंचाई की नाली में हींग की एक थैली रख दें, तो खेतों में सब्ज़ियों की वृद्धि अच्छी होती है और वे संक्रमण मुक्त रहती है । पानी में हींग मिलाने से इल्लियों का सफाया हो जाता है और इससे पौधों की वृद्धि बढ़िया होती – गुग्गुल एक बहुवर्षी झाड़ीनुमा वृक्ष है जिसके तने व शाखाओं से गोंद निकलता है, जो सगंध, गाढ़ा तथा अनेक वर्ण वाला होता है. यह जोड़ों के दर्द के निवारण और धुप अगरबत्ती आदि में इस्तेमाल होता है . 

– प्रपोलीश- यह पौधों द्धारा श्रावित गोंद है जो मधुमक्खियॉं पौधों से इकट्ठा करती है इसका उपयोग डेन्डानसैम्बू बनाने मंच तथा पराबैंगनी किरणों से बचने के रूप में किया जाता है। 

– ग्वार फली के बीज में ग्लैक्टोमेनन नामक गोंद होता है .ग्वार से प्राप्त गम का उपयोग दूध से बने पदार्थों जैसे आइसक्रीम , पनीर आदि में किया जाता है। इसके साथ ही अन्य कई व्यंजनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है.ग्वार के बीजों से बनाया जाने वाला पेस्ट भोजन, औषधीय उपयोग के साथ ही अनेक उद्योगों में भी काम आता है। – इसके अलावा सहजन , बेर , पीपल , अर्जुन आदि पेड़ों के गोंद में उसके औषधीय गुण मौजूद होते है. 

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