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गुग्गल (gugal) के आयुर्वेदिक व औषधीय गुण

गुग्गल से स्वास्थ्य लाभ

गुग्गल एक वृक्ष है। गुग्गल ब्रूसेरेसी कुल का एक बहुशाकीय झाड़ीनुमा पौधा है। अग्रेंजी में इसे इण्डियन बेदेलिया भी कहते हैं। रेजिन का रंग हल्का पीला होता है परन्तु शुद्ध रेजिन पारदर्शी होता है। यह पेड़ पूरे भारत के सूखे क्षेत्रों में पाया जाता है। यह पौधा छोटा होता है एवं शीतकाल और गीष्मकाल में धीमी गति से बढ़ता है। इसके विकास के लिए वर्षा ऋतु उत्तम रहती है। इस पेड़ के गोंद को गुग्गुलु, गम गुग्गुलु या गुग्गल के नाम से जाना जाता है। गोंद को पेड़ के तने से चीरा लगा के निकाला जाता है। गुग्गुलु सुगंधित पीले-सुनहरे रंग का जमा हुआ लेटेक्स होता है। अधिक कटाई होने से यह आसानी से प्राप्त नहीं होता है। आयुर्वेद में दवा की तरह नए गोंद का ही प्रयोग होता है।

सुश्रुत संहिता, में गुग्गुलु का प्रयोग मेद रोग के उपचार (उच्च रक्त कोलेस्ट्रॉल, धमनियों का सख्त होना) के लिए निर्धारित किया गया है। यह वसा के स्तर को सामान्य रखने और शरीर में सूजन कम करने में लाभकारी है। इससे प्राप्त राल जैसे पदार्थ को भी ‘गुग्गल’ कहा जाता है। इसमें मीठी महक रहती है। इसको अग्नि में डालने पर स्थान सुंगध से भर जाता है। इसलिये इसका धूप में उपयोग किया जाता है। यह कटुतिक्त तथा उष्ण है और कफ, बात, कास, कृमि, क्लेद, शोथ और अर्शनाशक है।

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गुग्गल एक छोटा पेड है जिसके पत्ते छोटे और एकान्तर सरल होते हैं। यह सिर्फ वर्षा ऋतु में ही वृद्धि करता है तथा इसी समय इस पर पत्ते दिखाई देते हैं। शेष समय यानि सर्दी तथा गर्मी के मौसम में इसकी वृद्धि अवरूद्ध हो जाती है तथा पर्णहीन हो जाता है। सामान्यत: गुग्गल का पेड 3-4 मीटर ऊंचा होता है। इसके तने से सफेद रंग का दूध निकलता है जो इसका का उपयोगी भाग है। प्राकृतिक रूप से गुग्गल भारत के कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात तथा मघ्यप्रदेश राज्यों में उगता है। भारत में गुग्गल विलुप्तावस्था के कगार पर आ गया है, अत: बडे क्षेत्रों मे इसकी खेती करने की जरूरत है। हमारे देश में गुग्गल की मांग अधिक तथा उत्पादन कम होने के कारण अफगानिस्तान व पाकिस्तान से इसका आयात
किया जाता है।

गुग्गल शुद्ध करने का तरीका 

गुग्गल शुद्ध करने के लिए इसे त्रिफला के काढ़े और दूध में पका लें. गिलोय के काढ़े में गुग्गल को मिलाकर छान कर और सुखाने से भी गुग्गल शुद्ध हो जाता है. इसकी प्रकृति गर्म होती है. इसलिए गाय के दूध या घी के साथ सेवन करे,. इसे प्रयोग करते समय रात्री जागरण , दिन में सोना , खट्टा भोजन , अत्याधिक भोजन , धुप , मद्य , क्रोध आदि ना करें.इसका अधिक मात्रा में सेवन ना करें.

गुग्गल में शांतिदायक demulcent, मल को ढीला करनेवाले aperient, रक्त को साफ़ करनेवाले purifier of blood, वसा कम करनेवाले, सूजन घटाने के और कोलेस्ट्रॉल कम करने के गुण होते है।

पारंपरिक चिकित्सीय उपयोग Traditional Therapeutic Uses

गुग्गल को सदियों से आयुर्वेद में विभिन्न बिमारियों के उपचार में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसमें प्रमुख है जोड़ों का दर्द, गठिया, मोटापे में एक वजन कम करने के लिए और रक्त वाहिकाओं के सख्त होना। इसके अतिरिक्त इसे जिगर की समस्याओं diseases of liver, ट्यूमर, अल्सर और घावों ulcer and wounds, मूत्र शिकायतें urinary complain, पेट के कीड़े intestinal worms, सूजन swelling, दिल के टॉनिक tonic for heart, तंत्रिका रोग nervous diseases, गंडमाला scrofulous affections, त्वचा रोगों में, दुर्बलता, मधुमेह, वसा को कम करने, बवासीर, अपच, ल्यूकोरिया, लूम्बेगो, मासिक धर्म के नियामक, स्नायु संबंधी विकार, न्युरोसिस, मोटापा, मसूड़ों और गले अल्सर, विष को कम करने, आमवाती विकारों में दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है।

गुग्गल के फायदे Benefits of Guggul

त्वचा / ऊतक skin/tissue के रिजनरेशन में उपयोगी।
इसमें सूजन को कम करने का Antiinflammatory गुण है। ये आयुर्वेद की मानी हुई गठिया, आर्थराइटिस, रुमेंटिज्म की दवा है।
विषाक्त पदार्थों को शरीर से कम करने लाभप्रद।
वात, पित्त और कफ को संतुलित करता है।
यह शरीर से वसा को कम करने मदद करता है और वजन घटाने के साथ मदद करता है।
यह कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।
गुग्गुलु में एक ही समय में ‘अच्छा कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाने’, जबकि शरीर में सीरम कोलेस्ट्रॉल को कम करने के गुण हैं।
यह लिपिड hypolipidemic, ट्राईग्लीसराइडिस triglycerides lowering को कम करने का काम करता है.
यह एक एंटीऑक्सीडेंट है।
यह रक्त वाहिकाओं का सख्त होने Atherosclerosis से रोकने में मददगार है।

गुग्गल के बिभिन्न योग —-

कैशोर गुग्गल : वात रक्त और खून की खराबी के कारण शरीर में फोड़ा, फुंसी या चकत्ता होना, कुष्ठ, व्रण आदि व्याधियों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली सुबह-शाम गर्म जल से।

नवक गुग्गल : मेद वृद्धि (मोटापा) व आमवात नाशक। मात्रा 2-2 गोली सुबह-शाम।

पुनर्नविद गुग्गल : वातरक्त, शोथ, गृध्रसी तथा प्रबल आमवात का नाश होता है। मात्रा 1 से 2 गोली सुबह-शाम गर्म जल से।

महायोगराज गुग्गल : 80 प्रकार के वात रोगों में लाभकारी। समस्तवात विकार, संधिवान, अर्द्धगावात, कमर व मेरुदण्ड का दर्द, सर्वांगशूल, व्रण, भगंदर, अर्श वात रक्त आदि रोगों की प्रसिद्ध दवा। मात्र 1 से 2 रत्ती गोली सुबह-शाम रास्नादि क्वाथ, गर्म जलया चाय के साथ।

योगराज गुग्गल: महायोगराज गूगल के समान गुण पर कुछ कम असरकरने वाली।

रास्नादि गुग्गल : आमवात, गठिया जोड़ों का दर्द आदि विकारों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह-शाम।

लाक्षादि गुग्गल : हड्डियों की बीमारी व सूजन, चोट लगने के बाद होने वाले दर्द, टूटी हड्डियों को जोड़ने एवं रक्त के जमाव को दूर करने में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली सुबह-शाम गर्म जल अथवा दूध से।

सप्तविंशति गुग्गल : भगंदर, पुराने घाव, शूल आदि रोगों में लाभकारी। बवासीर, नाड़ी त्रण, आंत्र वृद्धि तथा वस्ति विकारों पर। मात्रा 1से 2 गोली सुबह-शाम गर्म जल से।

सिंहनाथ गुग्गल : वातरक्त, आमावत, संधिवात, गुल्म, शूल, उदर रोग, पथरी व कुष्ठ आदि में लाभदायक। अग्निदीपक है। मात्रा 1 से 2 गोली जल या रास्नादि काढ़े के साथ।

त्रियोदांश गुग्गल : गृध्रसी आदि भयंकर वात रोगों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली सुबह-शाम।

त्रिफला गुग्गल: भगंदर, गुल्म सूजन और बवासीर आदि में अत्यंत लाभकारी। मात्रा 1 से 2 गोली सुबह-शाम।

गुग्गुल का उपयोग —-
– 35 मिलीलीटर पानी में 3.50 मिलीग्रम गुग्गुल घोल लें फिर इस घोल में रुई भिंगोकर इसे दांत के गड्ढ़े रखें इससे कीड़े मरकर लार के
साथ बाहर आ जाएंगे और दर्द से भी आराम मिलेगा।
– 10 ग्राम गुग्गुल लेकर इसे 20 ग्राम गुड़ में मिलाकर पीसकर इसकी छोटी-छोटी गोलिया बना लें। सुबह-शाम कुछ दिनों तक 1-1गोली घी के साथ लेने से घुटने का दर्द दूर हो जाता है।

– चने का आटा और गुग्गुल बराबर मात्रा में लेकर पानी की सहायता से टिकिया बनाकर गर्म कर लें। यह टिकिया गर्म-गर्म ही ग्रंथि पर बांधने ग्रंथि शीघ्र ही बैठ जाती है।
– दमा रोग में गुग्गुल लगभग आधा से 1 ग्राम मात्रा को सुबह-शाम दोनों समय घी के साथ सेवन करना लाभकारी होगा।

गुग्गल के औषधीय गुण

– गुग्गुल की लगभग 0.12 ग्राम से 0.96 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गुड़ के साथ सेवन करने से कई प्रकार के गर्भाशय के रोग ठीक हो जाते हैं। जब तक गर्भाशय से सम्बंधित रोग ठीक न हो जाए तब तक 4 से 6 घंटे के अन्तर पर इसका सेवन करते रहना चाहिए।
– गुग्गुल के चूर्ण को नारियल के तेल या घी में घिसकर लेप बना लें और इसे घाव पर दिन में 3 बार लगाएं इससे घाव ठीक हो जाते हैं।
– गुग्गुल का धुंआ कान में लेने से कान के सारे कीड़े मर जाते हैं।
3 ग्राम शुद्ध गुग्गुल की गुठली निकालें और उसे 1 छुआरे में रख दें फिर इसके ऊपर गीले आटे का लेप कर दें। इसके बाद इसे गर्म राख में रख कर भून लें और इसे पीसकर चने के बराबर गोलियां बना लें और छाया  में रखकर सुखा लें। इसमें से 1 गोली सुबह-शाम साफ साफ पानी के साथ लेने से कमर दर्द ठीक हो जाता है।
– लगभग 240 मिलीग्राम से 960 मिलीग्राम कैशोर गुग्गल के साथ रास्ना एवं घी सुबह और शाम को सेवन करने से लकवे में फायदा मिलता है।
– सलई गुग्गुल गर्म पानी में घिसकर सुबह-शाम गिल्टी यानी ट्यूमर पर बांधने से फायदा मिलता है। 600 से 1200 मिलीग्राम गुग्गल रोजाना सुबह-शाम सेवन करने से रोग में इस रोग में लाभ होता है।
– लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में गुग्गल और त्रिफला के चूर्ण को मिलाकर रात में हल्का गर्म पानी के साथ सेवन करने से लम्बे समय से बनी हुई कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है तथा शरीर में होने वाले सूजन भी दूर हो जाते हैं।
– शुद्ध गुग्गुलु की 1 से 2 ग्राम को गर्म पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से मोटापन दूर होता है।
– गुग्गुलको गुड़ के साथ रोजाना दिन में 3 से 4 खुराक के रूप में सेवन करने से पेट में सूजन और जलोदर ठीक हो जाता है।
– गुग्गुल को मुंह में रखने से या गर्म पानी में घोलकर दिन में 3 से 4 बार इससे कुल्ला व गरारे करने से मुंह के अन्दर के घाव, छाले व जलन ठीक हो जाते हैं।
– कनखजूरे के काटने पर गुग्गल को आग में जलाकर धूंनी देने से लाभ मिलता है।
– गुग्गल को सिरके में घोटकर सुबह-शाम नियमित रूप से सिर पर गंजेपन वाले स्थान पर लगाएं इससे लाभ मिलेगा।
– 1 चम्मच गुग्गल का चूर्ण 1 कप पानी में गलाकर 1 घंटे बाद छान लें। भोजन के बाद दोनों समय इस गुग्गल का सेवन करने से अम्लपित्त (खट्टी डकार ) से छुटकारा मिल जाता है।
– 240 मिलीग्राम से लेकर 960 मिलीग्राम गुग्गल की मात्रा सुबह और शाम सेवन करने से आमाशय के जख्म में लाभ मिलता है।
साइड-ईफ्क्ट्स Side-effects

गुग्गुल उपयोग से कोई खतरनाक प्रभाव नहीं होता है फिर इसका लंबे समय तक उपयोग करने से हल्के पेट दर्द की शिकायत होती है।
गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
गुग्गल, थायराइड फंक्शन को प्रभावित करता है, इसलिए थायराइड की किसिस भी समस्या में इसका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, गुग्गल को अन्य दवा के साथ लेने पर दवा का शरीर पर असर कम हो सकता है।

हरियाणा सरकार के कहने पर नथानी ने अरावली में फिलहाल सिर्फ गुग्गल पर ही फोकस किया है। इस वक्त अरावली में सभी औषधियों और वनस्पतियों में सबसे ज्यादा मात्रा में गुग्गल मौजूद है। नथानी ने अपनी रिसर्च में पाया है कि अरावली में 60 पर्सेंट सिर्फ गुग्गल है। नथानी का कहना है कि गुग्गल कई बीमारियों में काफी कारगर है। इसका इस्तेमाल पूजा में किया जाता है। गुग्गल का धुआं जहा-जहां जाता है वहां पर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और हवा शुद्ध हो जाती है। इसके अलावा ऑर्थराइटिस, हार्ट डिजीज, जोड़ों व मोच के दर्द आदि में यह रामबाण का काम करता है। गुग्गल के अलावा अरावली में झड़ बेर, शतावर, शतावरी, हथौर, नागफनी व अपंशिया औषधि मौजूद हैं। हालांकि इनकी संख्या व अन्य औषधियों की उपलब्धता पर रिसर्च किया जाना बाकी है।

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