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खेचरी मुद्रा – मुद्रा से आरोग्य एवं आध्यात्मिक लाभ

खेचरी मुद्रा :- सारे रोगों का नाश करने वाली रहस्यमयी मुद्राओं का खुलासा

खेचरी मुद्रा हठयोग के अन्तर्गत वर्णित हैं। मुद्राओं का तत्काल और सूक्ष्म प्रभाव शरीर की आंतरिक ग्रन्थियों पर पड़ता है। इन मुद्राओं के माध्यम से शरीर के अवयवों तथा उनकी क्रियाओं को प्रभावित, नियन्त्रित किया जा सकता है। विलक्षण चमत्कारी फायदा पहुचाने वाली व आसानी से कुण्डली को जगाने वाली खेचरी मुद्रा की क्रिया विधि और उनके फायदे निम्नलिखित हैं –

मनुष्य की जीभ (जिह्वा) दो तरह की होती हैं- लंबी और छोटी। लंबी जीभ को सर्पजिह्वा कहते हैं। कुछ लोगों की जीभ लंबी होने से वे उसे आसानी से नासिकाग्र पर लगा सकते हैं और खेचरी-मुद्रा कर सकते हैं। मगर जिसकी जीभ छोटी होती है उसे तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले उन्हें अपनी जीभ लंबी करनी पड़ती है इसका अभ्यास करने से कुछ महीनों में जीभ इतनी लंबी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा (उल्टा करने) दिया जाए तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बंद कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

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lign: justify;”>खेचरी मुद्रा – इसे खेचरी मुद्रा इसलिए कहते है क्योकि (ख मतलब आकाश और चर मतलब घूमने वाला) इस मुद्रा को सिद्ध करने पर हवा में उड़ने की शक्ति मिल जाती है ! भगवान हनुमान जी को उनकी वायु में अति तीव्र गति से उड़ने की शक्ति की वजह से उन्हें सबसे बड़ा खेचर कहा जाता है। साथ ही इस मुद्रा को करने से देवताओं के समान सुंदर शरीर और शाश्वत युवा अवस्था प्राप्त होती है।

खेचरी मुद्रा की क्रिया विधि

खेचरी मुद्रा साधना क्रिया योग के अंतर्गत आती है । ध्यान क्रिया योग की 1 अवस्था है । स्तोत्र तंत्र योग के अंतर्गत आता है । विशेष बात ये है । क्रिया योग और तंत्र योग दोनों की साधना विधियां 1 ही स्थान पर पहुंचा देती हैं । जिसे चित्त की क्रिया अवस्था अथवा ध्यान अवस्था कहा जाता है । जीभ को उलटना और तालू के गड़्ढे में जिह्वा की नोंक (अगला भाग) लगा देने को खेचरी मुद्रा कहते हैं। तालू के अन्त भाग में एक पोला स्थान है जिसमें आगे चलकर माँस की एक सूँड सी लटकती है, उसे कपिल कुहर भी कहते हैं। इसी सूंड से जीभ के अगले भाग को बार बार सटाने का प्रयास करना होता है, और रोज रोज प्रयास करने से कुछ महीने में धीरे धीरे जीभ लम्बी होकर कुहर से सट जाती है। और जीभ के सटते ही, कपाल गह्वर में होकर प्राण-शक्ति का संचार होने लगता है और सहस्रदल कमल में स्थित अमृत झरने लगता है, जिसके आस्वादन से एक बड़ा ही दिव्य आनन्द आता है और शरीर में दिव्य शक्तियां जागृत होने लगती है । खेचरी मुद्रा द्वारा ब्रह्माण्ड स्थित शेषशायी सहस्रदल निवासी भगवान से साक्षात्कार भी होता है। यह मुद्रा बड़ी ही महत्वपूर्ण है।

दूसरी ओर तंत्र मार्ग का साधक हो । या ध्यान मार्ग का साधक हो । उनको खेचरी मुद्रा स्वतः गठित होती है । क्योंकि अंततः वह भी ध्यान में प्रवेश करते हैं । लेकिन जो खेचरी मुद्रा घटित होती है । और जो खेचरी मुद्रा की विधि साधी जाती है । उन दोनो में अंतर है । जो स्वतः घटती है । उसमे जिह्वा तालू से स्वतः लग जाती है । और जिह्वा मुढ कर हलक की ओर नहीं खिंचती । साथ ही साधक ध्यान समाधि में प्रवेश कर जाता है । वास्तव में हमारे तालू के मध्य में 1 केन्द्र है । 1 स्रोत है । जैसे ही ऊर्जा उसको भेदती है । वैक्यूम बनता है । और जिह्वा तालू से चिपक जाती है । कबीर उस केन्द्र के लिए ही बोलते हैं – गगन बीच अमृत का कुंआ झरे सदा सुख कारी रे । तालू के मध्य वह स्रोत है । जहाँ से स्राव होता है ।

” ल ” वर्णाक्षर नाद का मूलाधार चक्र और खेचरी मुद्रा दोनों से पूरक सम्बन्ध है । जब मैं इस स्तोत्र को टाइप कर रहा था । तब मैंने ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव किया । इसके उच्चारण में त्रुटि न हो । इसको ध्यान में रखकर मैंने इसको सन्धि विच्छेद द्वारा सरल कर दिया है । इसको लय के साथ उच्चारण करने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है । तन्त्र शास्त्र के अनुसार कुण्डलनी शक्ति के जागरण और ऊर्ध्व गमन हेतु देवी ललिता त्रिपुर सुन्दरी की तंत्रोक साधना का प्रावधान है । ये स्तोत्र देवी ललिता की उपासना खण्ड से ही लिया गया है । श्री ललिता लकार सतनाम स्तोत्र इसका पूर्ण नाम है । ये स्तोत्र बहुत ही दुर्लभ है । वर्त्तमान काल में इसको खोजकर प्राप्त करना कठिन हैं ।
विधि – सर्वप्रथम इस स्तोत्र का साधक को कण्ठस्थ होना अति आवश्यक है । विधि प्रारम्भ करने से पूर्व इसको कण्ठस्थ कर लें । उच्चारण शुद्ध और लयबद्ध होना चाहिए ।
 
पहला चरण – सुखासन में बैठकर आँखें बन्द कर लें । पश्चात स्तोत्र का पाठ करें । पाठ करते समय 1-1 शब्द स्वयं श्रवण करते हुए उच्चारण करें । उच्चारण करते समय ध्यान जिह्वा पर सतत बना रहे । आप पायेंगे उच्चारण के समय जीभ बारबार तालू से स्पर्श करती है ।
दूसरा चरण – जिह्वा को ऊपर तालू से लगाकर बैठ जाएं । ध्यान पूर्वक जिह्वा को तालू से लगाये रखें । प्रारम्भ के दिनों में प्रयास से लगाये रखना पड़ेगा । किन्तु विधि जैसे जैसे सक्रिय होगी । जिह्वा का तालू से लगे रहना स्वाभाविक हो जायेगा । दूसरे चरण की अवधि 30 मिनट रहेगी ।
तीसरा चरण – शरीर को ढीला छोड़कर लेट जाएं । अवधि 10 मिनट रहेगी ।
विशेष – पहला चरण दिन में जब भी समय मिले, दुकान पर, आफिस में, बस में, कार में, उसको करें, पहला चरण दिन में कभी भी कितनी भी बार किया जा सकता है । सबसे महत्वपूर्ण पहला चरण है । ऐसा करने से दूसरा चरण जल्दी स्वताः घटेगा । किन्तु दिन में 1 बार पूर्ण विधि करनी आवश्यक है ।

श्री ललिता लकार स्तोत्र –

ललिता लक्ष्मी लोलाक्षी लक्ष्मणा लक्ष्मणार्चिता ।

लक्ष्मण प्राणरक्षणि लाकिनी लक्ष्मण प्रिया ।

लोला लकारा लोमेशा, लोल जिव्हा लज्जावती ।

लक्ष्या लाक्ष्या लक्ष रता लकाराक्षर भूषिता ।

लोल लयात्मिका लीला, लीलावती च लांगली ।

लावण्यामृत सारा च लावण्यामृत दीर्घिका ।

लज्जा लज्जा मती लज्जा, ललना ललन प्रिया ।

लवणा लवली लसा लाक्षकी लुब्धा लालसा ।

लोक माता लोक पूज्या, लोक जननी लोलुपा ।

लोहिता लोहिताक्षी च लिंगाख्या चैव लिंगेशी ।

लिंग गीती लिंग भवा, लिंग माला लिंग प्रिया ।

लिंगाभिधायिनी लिंगा लिंग नाम सदानन्दा ।

लिंगामृत प्रीता लिंगार्चन प्रीता लिंग पूज्या ।

लिंगरूपा लिंगस्था च, लिंगा लिंगन तत्परा ।

लता पूजन रता च लता साधक तुष्टिदा ।

लता पूजक रक्षणी, लता साधन सिद्धिदा ।

लता गृह निवासिनी लता पूज्या लता राध्या ।

लता पुष्पा लता रता लता धारा लता मयी ।

लता स्पर्श संतुष्टा, लता आलिंगन हर्षिता ।

लता विद्या लता सारा लता आचार लता निधि ।

लवंग पुष्प संतुष्टा लवंग लता मध्यस्था ।

लवंग लतिका रूपा लवंग होम संतुष्टा ।

लकाराक्षर पूजिता च लकार वर्णोदभवा ।

लकार वर्ण भूषिता लकार वर्ण रुचिरा ।

लकार बीजोदभवा तथा लकाराक्षर स्थिता ।

लकार बीज नीलया, लकार बीज सर्वस्वा ।

लकार वर्ण सर्वांगी लक्ष्य छेदन तत्परा ।

लक्ष्य धरा लक्ष्य घूर्णा, लक्ष्य जापेन सिद्धिदा ।

लक्ष कोटि रूप धरा लक्ष लीला कला लाक्ष्या ।

लोकपालेन अर्चिता च लाक्षा राम विलेपना ।

लोकातीता लोपा मुद्रा, लज्जा बीज रूपिणी ।

लज्जा हीना लज्जा मयी लोक यात्रा विधयिनी ।

लास्या प्रिया लये करी, लोक लया लम्बोदरी लघिमादि सिद्धि दात्री ।

लावण्य निधि दायिनी, लकार वर्ण ग्रथिता, लं बीजा ललिताम्बिका ।

विशेषता : निरंतर अभ्यास करते रहने से जिह्वा जब लंबी हो जाती है, तब उसे नासिका रन्ध्रों में प्रवेश कराया जा सकता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से कपाल मार्ग एवं बिंदु विसर्ग से संबंधित कुछ ग्रंथियों में उद्दीपन होता है। जिसके परिणामस्वरूप अमृत का स्राव आरंभ होता है। उसी अमृत का स्राव होते वक्त एक विशेष प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव होता है। इस अनुभव से सिद्धि और समाधि में तेजी से प्रगति होती है।

चेतावनी : यह आलेख सिर्फ जानकारी हेतु है। कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास न करे, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं।

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Source Article :- http://ohmygod-rajeev.blogspot.in/

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