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खस (Vetiver) वेटीवर की महक के दीवाने हजारों हैं

खस (Vetiver) वेटीवर क्या है ?

खस (Vetiver) वेटीवर को पर्यावरण संरक्षण के उपयोगी साधन के रूप में काफी लोकप्रियता मिली है। हालांकि भारतीय कृषि व पर्यावरण विभागों व इनसे संबद्ध वैज्ञानिकों ने इसमें खासी रुचि नहीं दिखायी। नतीजा यह है कि भारत में लोकप्रियता की बात तो दूर, इस पौधे का चलन कम होने लगा है।आप भले एयरकंडीशंड घरों में रहते हों, लेकिन गर्मियों में खस की टट्टियों की याद जरूर आती होगी। इस बात को अधिक से अधिक लोगों को जानने की जरूरत है कि इस वनस्‍पति की उपयोगिता आपके कमरों के तापमान को नियंत्रित रखने में ही नहीं, पर्यावरण को अनुकूलित रखने में भी है

खस (Vetiver) वेटीवर की ऊपर की पत्तियों को काट दिया जाता है और नीचे की जड़ से खस के परदे तैयार किए जाते हैं। बताते हैं कि इसके करीब 75 प्रभेद हैं, जिनमें भारत में वेटीवेरिया जाईजेनियोडीज (Vetiveria zizanioides) अधिक उगाया जाता है।

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खस (Vetiver) वेटीवर यानी खस घास के नाम से जानी जाने वाली यह घास देश के किसी भी कोने में, किसी भी तापमान में उगने में सक्षम है।

खस (Vetiver) वेटीवरकी जड़ें दो मीटर से चार मीटर तक जमीन में चली जाती हैं, जिससे यह किन्नौर के उरनी ढांक सहित सोलन और मंडी के राष्ट्रीय राजमार्गो में हो रहे भूमि कटाव को रोकने में पूरी तरह से सक्षम है। इस घास को उगाने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के अधिकारी प्रोत्साहित कर रहे हैं। हिमाचल के अधिकारियों को भी जागरूक किया जा रहा है।

प्रदेश में भूमि कटाव बहुत बड़ी समस्या है। इससे कई मकान जमींदोज हो चुके हैं। प्रदेश कृषि एवं बागवानी विभाग भूमि कटाव को रोकने के लिए ऐसे पौधों की तलाश कर रहा है, जो भूमि कटाव को रोकने का कार्य कर सकता है। मात्र एक पौधा लगाने से यह बढ़ता जाता है और दो सौ से तीन सौ पौधे हो जाते हैं। इसकी जड़े हर रोज पांच सेंटीमीटर तक बढ़ जाती हैं। खस घास लगभग पांच फुट तक जमीन से ऊपर बढ़ती है। गहरी जड़ों के कारण यह बड़े से बड़े वेग को सहन करने की क्षमता रखती है।

संरक्षण हेतु श्रेष्ठ व उपयुक्त है तथा अनावृष्टि, बाढ़ आदि से प्रभावित नहीं होती है। इसको पानी या पोषकों की विशेष आवश्यकता होती है तथा इसका पौधा काफी बड़ा होता है। इसकी मूल पर तनों का गुच्छा करीब एक मीटर तक चैड़ा हो जाता है तथा आसानी से नहीं उखड़ता है।

खस (Vetiver) वेटीवर के फायदे :-

बढ़ाता है भूमि का उपजाऊपन :- जो भूमि अपनी उर्वरा शक्ति खो देती है, उसमें खस घास लगाने से उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है।

कीटों से रक्षा :- इस पौधे को घर के आसपास लगाने से उस क्षेत्र में सांप और बिच्छू नहीं आते हैं। उस क्षेत्र में मच्छर भी नहीं आते हैं

और फसलों को कीटों के प्रकोप से भी बचाती है।

फ़िल्टर के रूप में :- यह गंदे पानी को साफ करने का काम करती है।

खरपतवार नियंत्रण :- गीली घास के रूप में कॉफी और चाय बागानों में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाता है।

चारे के रूप में :- इसकी पत्तियां मवेशियों को खिलाने के लिए उपयोगी चारा है।

इसे सिरप स्वाद मिल्क शेक और लस्सी की तरह प्रयोग किया जाता है।

खस (Vetiver) वेटीवर के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण :-

बुखार हो तो इसकी जड़ का काढ़ा पीयें . उसमें गिलोय और तुलसी मिला लें तो और भी अच्छा रहेगा . हल्का बुखार हो या रह रह कर बुखार आये , बुखार टूट न रहा हो तो यह काढ़ा बहुत लाभदायक रहता है .

पित्त , एसिडिटी या घबराहट हो तो इसकी जड़ कूटकर काढ़ा बनाएं और मिश्री मिलाकर पीयें . चर्म रोग या एक्जीमा या एलर्जी हो तो इसकी 3-4 ग्राम जड़ में 2-3 ग्राम नीम मिलाकर काढ़ा बनाएं और सवेरे शाम पीयें .

दिल संबंधी कोई परेशानी हो तो इसकी जड़ में मुनक्का मिलाकर काढ़ा बनाकर मसलकर छानकर पीयें .इससे होरमोंस भी ठीक रहेंगे और धड़कन की गति भी ठीक रहेगी . किडनी की परेशानी में खस और गिलोय का काढ़ा सवेरे सवेरे पीयें . हाई बी. पी . हो या एंजाइना की समस्या हो तो इसकी जड़ और अर्जुन की छाल का काढ़ा पीयें .

प्यास बहुत अधिक लगती हो तो इसकी जड़ कूटकर पानी में ड़ाल दें . बाद में छानकर पानी पी लें . यह शीतल अवश्य है  परन्तु इसे लेने से जोड़ों का दर्द बढ़ता नहीं है .

खस (Vetiver) वेटीवर का इस्‍तेमाल सिर्फ ठंडक के लिए ही नहीं होता, आयुर्वेद जैसी परंपरागत चिकित्‍सा प्रणालियों में औषधि के रूप में भी इसका इस्‍तेमाल होता है। इसके अलावा इससे तेल बनता है और इत्र जैसी खुशबूदार चीजों में भी इसका उपयोग होता है।

खस (Vetiver) वेटीवर का तेल :- 
इसकी जड़ों में सुगन्ध होती है तथा इनसे तेल निकाला जाता है। इसका तेल आधुनिक युग में मक्खियों व तिलचट्टों को भगाने में तथा कीट प्रतिकर्षी में एक महत्वपूर्ण संघटक के रूप में हो सकता है। खस का तेल इत्र उद्योग का प्रमुख कच्चा पदार्थ है। उसका सुगंधित प्रसाधन सामग्री एवं साबुन को सुगंधित बनाने में होता है। यह उद्दीपक, स्वेदनकारी एवं शीतलक माना जाता है तथा आमवात, कटिवेदना व मोच में इसकी मालिख करने से राहत मिलती है। मध्यप्रदेश में इसे बच्चों के लिए  कृमिनाशक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। इसकी सुखई हुई जड़ें लिनन व कपड़ों में सुगंध हेतु प्रयुक्त की जाती है। प्राचीनकाल से ही इसकी जड़ें चिके, चटाईयाॅं, हाथ के पंखों, टोकरियों, मकानों की टट्टिया आदि में प्रयुक्त होती है। इसकी हरी पत्तिया पशु एवं भेड़ें आदि खाते हैं।

खस (Vetiver) वेटीवर का इत्र :-

इसका इत्र एक तोला आप 25 रुपये से 1000 रुपये तक का खरीद सकते हैं. इसे भी शरीर पर सुबह लगाने पर शाम तक लोग पूछते रहते हैं कि यह भीनी भीनी सुगंध कहां से आ रही है. दो तोला खस का इत्र साल भर काम आ जाता है.

खस का इत्र लगाने वालो को सकून देता है, मानसिक तौर पर ठंडाई की अनुभूति देता है, और मन को स्वस्थ रखता है. इसके मनोवैज्ञानिक कारण हैं, लेकिन औषधि स्तर पर भी कई कारक हैं. अफसोस यह है कि कद्रदानों के अभाव में खास का इत्र लगभग लुप्त सा हो गया है.

अच्छे किस्म का इत्र खस के अच्छे गुणों वाले जडों से बनाया जाता है और उसको हलके चंदन या गुलाब के इत्र का पुट दिया जाता है. इससे इत्र का तीखापन कम होकर भीना भीना सा गंध देने लगता है. इत्र अच्छी किस्म का हो तो आप के आसपास के लोगों को यह महक दिन भर मिलती रहेगी जबको आप को अगले स्नान के समय तक यह महक मिलती रहेगी.

उम्दा किस्म का इत्र खरीदें और प्रयोग करें. बस स्नान करने के बाद बहुत ही हल्के से अपने छाती, गर्दन, और हाथों पर लगा लें. इत्र की कम से कम मात्रा का प्रयोग पर्याप्त रहता है.

आज जब विकासशील देशों के लिए भूमि अपरदन एक दीर्घकालिक, प्राकृतिक एवं आर्थिक समस्या है, खस घास उपयुक्त हो सकती है, साथ ही इसकी खेती से आर्थिक लाभ भी अर्जित कर सकते हैं।

वर्तमान में खस की महक के दीवाने कम ही रहे हैं। अब एक खास वर्ग में ही इसका उपयोग किया जा रहा है। एक समय शहर में बंशकार समाज के अनेक लोग खस चटाई के व्यवसाय के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे। वर्तमान में इनका चलन अब एक खास वर्ग तक ही सीमित रह गया है। ऐसे में बंशकार समाज के लोग भी इसके विकल्प में दूसरी वस्तुएं बेचकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। कुछ समय पहले शहर की सड़कों से लेकर कार्यालय के पास से गुजरने पर एक शीतल महक तरोताजा कर देती थी, लेकिन अब यह अहसास इक्का-दुक्का जगह ही दिखाई देता है। खास बात ये है कि खस को लगातार पानी से तर रखने के लिए श्रमिकों की जरूरत भी होती थी। इससे कई बेरोजगारों को रोतगार मिल जाता था।

घास ने ली जगह :- खस का चलन कम होने का एक बड़ा कारण महंगाई भी रहा। कभी हर तबके की पहुंच की कीमतों में मिलने वाली खस के दाम आज इतने बढ़ चुके हैं कि अब खास वर्ग के लोग ही इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। वर्तमान में कूलरों में सस्ती रेडिमेड घास चटाई ने खस की जगह ले ली है इस कारण से महंगी लागत की खस को कुछ विशेष वर्ग के लोग ही इस्तेमाल कर रहे हैं। वर्तमान समय में कूलर में जिस घास का उपयोग किया जा रहा उस मुकाबले में खस काफी महंगी है। बाजार में घास की चटाई 40 से 50 रुपए में एक कूलर में लग जाती है, जबकि खस के 250 से 450 खर्च करने पड़ते है। महंगाई के दौर में हर आदमी इतना खर्च नहीं कर पाता है।

नागपुर कटनी से आती :- न्यू जय स्तंभ चौक पर खस चटाई के निर्माण में लगी शांता ने बताया कि खस को बाहर से लाना पड़ता है। वर्तमान में नागपुर और कटनी से इसकी आवक हो रही है। इसी व्यवसाय से जुड़े गिरधारीलाल कनक ने बताया कि खस का दाम 80 से 100 रुपए किलो चल रहा है। वहीं आने जाने का खर्च अलग होता है। इसके साथ सीजन के बाद बची हुई खस खराब हो जाती है। खस चटाई के निर्माता आर्डर पर ही खस बनाते हैं। कूलर के साइज के हिसाब से इसके रेट तय होते हैं। दिन भर में एक कूलर की चटाई बन पाती है।

बांस की समस्या :- खस के व्यवसाय को प्रभावित करने में बांस की कमी और महंगे होना भी सहायक हैं। वर्तमान समय में बंशकारों को वन विभाग की ओर से बांस उपलब्ध कराया जाता है। विभाग के पास जब बांस होता है, तभी उसका वितरण किया जाता है। वर्तमान समय में फारेस्ट डिपों में 3 माह से अधिक समय से बांस ही नहीं आया है।

रोजगार भी प्रभावित :- खस का व्यवसाय भले ही सीजनल है। इसके बाद भी गर्मी में इससे जुड़े लोगों को अच्छा खास रोजगार मिल जाता था। वर्तमान समय में तीन चार परिवार ही मीनाक्षी चौक और न्यू जय स्तंभ चौक खस चटाई बनाने का कार्य कर रहे हैं। इसके साथ ही बेरोजगारों को भी खस पर पानी डालने का काम मिल जाता था।

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