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केवड़ा के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण

केवड़ा (Pandanus fascicularis)

केवड़ा सुगंधित फूलों वाले वृक्षों की एक प्रजाति है । जो घने जंगलों में उगती है । उड़ीसा में केवड़े को ‘‘फूलों का राजा’’ माना जाता है और ‘‘ किया’’ नाम से जाना जाता है । पौराणिक कथाओं में केवड़े को एक शापित पौधा माना गया है । इसे ईश्वर की आराधना में उपयोग में नही लिया जाता है । शिवजी ने ब्रहमा व केतकी को शाप दिया कि उनकी कभी पूजा नहीं होगी यही कारण है कि पूरे विश्व में ब्रहमाजी का सिर्फ पुष्कर में ही मंदिर है और केवड़े के फूल को आज भी पूजा में उपयोग नहीं किया जाता ।

केवड़ा को वनस्पति विज्ञान में पेन्डोनस आॅडोर्फि कहते हैं । केवड़ा होेने पर अठारह फुट की ऊंचाई तक बढ़ते हैं और परिपक्व पौधे में 30 से 40 फूल लगते हैं जिनका रंग सफेद होता है जिसे ‘‘ सफेद कमल ’’ के नाम से जाना जाता है । केवड़ा भारत में दक्षिणी भारत, बर्मा, अंडमान व एशिया, आस्टेलिया के जंगली इलाके में उगता है । कत्थे को केवड़े के फूल में रखकर सुगंधित बनाने के बाद पान में उसका प्रयोग किया जाता है। केवड़े के अंदर स्थित गूदे का साग भी बनाया जाता है। इसे संस्कृत, मलयालम और तेलुगु में केतकी, हिन्दी और मराठी में केवड़ा, गुजराती में केवड़ों, कन्नड़ में बिलेकेदगे गुण्डीगे, तमिल में केदगें फारसी में करंज, अरबी में करंद और लैटिन में पेंडेनस ओडोरा टिसीमस कहते हैं। इसके वृक्ष गंगा नदी केसुन्दरवन डेल्टा में बहुतायत से पाए जाते हैं।
पतले, लंबे, घने और काँटेदार पत्तों वाले पेड़ की दो प्रजातियां है सफेद और पीली । सफेद जाति को केवड़ा और पीली को केतकी कहते हैं । केतकी बहुत सुगंन्धित होती है और उसके पत्ते कोमल होते हैं । इसमें जनवरी और फरवरी में फूल लगते हैं । इसके वृक्ष गंगा नदी के सुन्दरवन डेल्टा में बहुतायत से पाए जाते हैं । केवड़े के झाड़ों में सांप प्रायः आश्रय लेते हैं । मानसी देवी सर्पों की रक्षिका देवी का जन्म स्थान केवड़े के झाड़ हैं ।
इसका पौधा ५-७ मीटर ऊँचा होता है और बलुई मिट्टी पर नम स्थानों में अधिक पनपता है। इसका प्रधान तना शीघ्र ही शाखाओं में विभाजित हो जाता है और हर शाखा के ऊपरी भाग से पत्तियों का गुच्छा निकलता है। पत्तियाँ लंबी तथा किनारे पर काँटेदार होती है और तने पर तीन कतारों में लगी रहती हैं। जमीन से कुछ ऊपरवाले तने के भाग से बहुत सी हवाई जड़ें निकलती हैं और कभी कभी जब तने का निचला भाग मर जाता है तब पौधे केवल इन हवाई जड़ों के सहारे पृथ्वी पर जमे रहते हैं। इनके पुष्पगुच्छ में नर या मादा फूल मोटी गूदेदार धुरी पर लगे होते हैं। नर पुष्पगुच्छ में कड़ी महक होती हैं। मादा पुष्पगुच्छ में जब फल लगते हैं और पक जाते हैं तब वह गोलाकार नारंगी रंग के अनन्नास के फल की भाँति दिखाई पड़ता है। केवड़े के ये फल समुद्र की लहरों द्वारा दूर देशों तक पहुँच जाते है और इसी से केवड़ा समुद्रतटीय स्थानों में अधिकता से पाया जाता है।  जड़ों से टोकरी तथा बुरुश बनाया जाता हैं।

आयुर्वेद की नजर से केवड़ा के उपयोग :-

नर पुष्पगुच्छ से केवड़ाजल और इत्र बनाए जाते हैं। केवड़ा का उपयोग इत्र, पान मसाला, गुलदस्ते, लोशन ,तम्बाखू, केश तेल, अगरबत्ती , साबुन में सुगंध के रूप में किया जाता है ।
केवड़ा जल का उपोग मिठाई, सायरप और शीतल पेय पदार्थों में सुगंध लाने के लिए करते है । रसगुल्ला, गुलाब, जामुन, रबड़ी, रस-मलाई, श्रीखंड .अत्यंत सुगंधित व्यंजन जैसे मुगलाई व्यंजनों में भी इसका उपयोग किया जाता है, इससे थोड़े में ही संतुष्टि का आभास होता है।
पत्तियों के रेशे रस्सी आदि बनाने के काम आते हैं। इसकी पत्तियों का उपयोग झोपड़ियों को ढ़कने, चटाई तैयार करने, टोप, टोकनियों और कागज निर्माण करने के लिए किया जाता है।
इससे प्राप्त लंबी जड़ों के रेशो का उपयोग रस्सी बनाने में और टोकनियां बनाने में किया जाता है ।
केवड़ा तेल का उपयोग औषधि के रूप सिरदर्द और गठियावत में किया जाता है ।
पत्तियों का उपयोग कुष्टरोग, चेचक, खुजली, ल्यूकोडर के उपचार में किया जाता है ।
केवड़ा के फूल ही सबसे उपयोगी होता है ।
केवड़े के पानी में सफ़ेद चन्दन मिला कर सूंघने से गर्मी से होने वाला सिर दर्द ठीक होता है।
खाज खुजली और त्वचा रोगों में लगाने से लाभ होता है।
केवड़ा तेल का उपयोग औषधि के रूप में गठियावत में किया जाता है।
केवड़े जल का प्रयोग केशों के दुर्गंध दूर करने के लिए किया जाता है।
केवडा जल से गणेशजी का अभिषेक किया जाता है।
गुलाब जल की तरह केवडा जल भी त्वचा को टोन करता है।
यह त्वचा की गहराई से सफाई करता है।
त्वचा के छिद्रों को बंद करता है।
इसके एंटी ऑक्सीडेंट कैंसर , बुढापे आदि से लड़ने में मदद करते है।
इसकी मनमोहक सुगंध मन को शान्ति देती है।
केवड़ा के नर पुष्प अत्यधिक खुशबूदार होते है तथा इसका उपयोग केवड़ा तेल और केवड़ा इत्र बनाने में किया जाता है ।
केवड़े के फूल के कई उपयोग हैं, जैसे केवड़े का तेल, अर्क, व्यंजनों को सुगंधित करने के लिए ।
सूखे केवड़े के पत्तियों का उपयोग तम्बाकू में भी किया जाता है ।
केवड़े का अर्क सुगंधित व्यंजन जैसे  रसगुल्ला, गुलाब जामुन, रबड़ी, रस-मलाई, तथा मुगलाई व्यंजनों में किया जाता है ।
सुगंध में केवड़े के फूल के सूख जाने के बाद भी खुशबू निरंतर बनी रहती है ।
भारत में यह समुद्र के किनारे वाले क्षेत्र में पाया जाता है । यह ज्यादातर नदी किनारे, नहर खेत और तालाबों के आसपास ऊगता है ।
केवड़ा मानसून में उगाया जाता है ।  केवड़े के तेल का प्रयोग सिरदर्द व गठिया के उपचार में किया जाता है। केवड़ा से केवड़ा तेल, केवड़ा जल और केवड़ा इत्र  मिलता है ।
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