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करवा चौथ के व्रत में कही जाने वाली सभी तरह की कथाएं

करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाएं जिन कथा-कहानियों को सुनकर अपना व्रत पूरा करती हैं, दोपहर में सभी सुहागन स्त्रियां एक जगह एकत्रित होती हैं, शगुन के गीत आदि गाती हैं। इसके बाद शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासू मां के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं।उनमें से बहु-प्रचलित कुछ कहानियां निम्‍नानुसार हैं:

करवा चौथ की पहली कथा

एक समय की बात है कि एक गांव में करवा नाम की पतिव्रता स्त्री रहती थी। एक दिन करवा के पति नदी में स्नान करने गए। स्नान करते समय एक मगरमच्छ ने करवा के पति के पांव पकड़ लिए और नदी के अंदर खींचने लगा। प्राण पर आये संकट को देखकर करवा के पति ने करवा को पुकारना शुरू किया।

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करवा दौड़कर नदी के तट पर पहुंची जहां मगरमच्छ उसके पति के प्राण लेने पर तुला था। करवा ने झट से एक कच्चे धागे से मगर को बांध दिया व भागकर यमराज के पास पहुंची। यमराज से कहा कि- मगरमच्छ ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है इसलिए उसे मेरे पति के पैर पकड़ने के अपराध में आप अपने बल से नरक में भेज दो।

यमराज ने कहा कि- मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मगरमच्‍छ की आयु अभी शेष है।

इस पर करवा बोली- अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो मैं आप को श्राप देकर नष्ट कर दूंगी।

करवा के ऐसे वचन सुनकर यमराज डर गए और करवा के साथ आकर मगरमच्छ को यमपुरी भेज दिया, जिससे करवा के पति को दीर्घायु का आशीर्वाद मिला।

कथा पूरी होने के बाद महिलाएं प्रार्थना करती हैं कि हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवा चौथ की दूसरी कथा

शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करवा चौथ का व्रत किया था। नियमानुसार उसे चंद्रोदय के बाद भोजन करना था, परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो उठी।

उसके भाइयों से अपनी बहन की व्याकुलता देखी नहीं गई और उन्होंने पीपल की आड़ में आतिशबाजी का सुंदर प्रकाश फैलाकर चंद्रोदय दिखा कर वीरवती को भोजन करा दिया।

परिणाम यह हुआ कि वीरवती के पति की मृत्यु हो गयी। अधीर वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी को व्रत रखा और करवा चौथ के दिन उसकी तपस्या से उसका पति पुन: जीवित हो गया व उसे लम्‍बी आयु का आशीर्वाद प्राप्‍त हुआ।

प्रार्थना: हे वीरवती माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

करवा चौथ की तीसरी कथा

जब कुरूक्षैत्र का युद्ध हो रहा था तब द्रोपदी ने भगवान कृष्ण को याद कर के प्रार्थना की और कहा-

हे माधव… मेरे पति युद्ध छेत्र में है और मुझे उनके प्राणो कि चिंता सता रही है।

तब भगवान कृष्ण ने द्रोपदी को अपने पति को लम्‍बी आयु प्रदान करने वाले इस करवा चौथ के व्रत को करने के लिए कहा था, जिसे द्रोपदी ने पूर्ण नियम के साथ किया और द्रोपदी के सुहाग अर्जुन युद्ध क्षैत्र से सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाएँ अपने अखंड सुहाग के लिए इस करवा का चौथ व्रत करती हैं।

इस व्रत के संदर्भ में भगवान कृष्‍ण ने द्रोपदी को एक कहानी भी सुनाई थी कि-

प्राचीनकाल में एक ब्राह्मण था। उसके सात लड़के एवं एक करवा नाम की एक गुणवती लड़की थी। एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।

भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने नीचे से बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो।

बहन ने भोजन ग्रहण किया। भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दुःखी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दुःख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दुःख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया, इसीलिए यह कष्ट मिला। इसलिए यदि तू वर्ष भर चौथ का व्रत नियमपूर्वक करे, तो तेरा पति फिर से जीवित हो जाएगा।

उसने इंद्राणी के कहे अनुसार पूरे साल भर चौथ माता का व्रत किया और अन्‍त में अगले करवा चौथ पर फिर से सौभाग्यवती हो गई।

प्रार्थना: हे करवा माता! जैसे तुमने अपने पति की रक्षा की, वैसे सबके पतियों की रक्षा करना।

ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही पूजा करती हैं। हर क्षेत्र के अनुसार पूजा करने का विधान और कथा अलग-अलग होती है। इसलिए कथा में काफी ज्‍यादा अंतर पाया गया है।

कब तक करना चाहिए व्रत?

ऐसी मान्‍यता है कि करवा चौथ का व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाना चाहिए तथा अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन (उपसंहार) किया जाना चाहिए। जबकि जो सुहागिन स्त्रियाँ आजीवन करवा चौथ का व्रत रखना चाहें, वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नहीं है। अतः सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षार्थ इस व्रत का सतत पालन करती हैं।

 चौथ माता का सबसे प्राचीन मंदिर

भारत देश में वैसे तो चौथ माता जी के कई मंदिर हैं, लेकिन सबसे प्राचीन एवं अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है । चौथ माता के प्रसिद्ध मंदिर की वजह से ही चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से बदलकर चौथ का बरवाड़ा पड़ गया। जबकि चौथ माता के मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी ।

करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा का महत्व

करवा चौथ में चंद्रमा का महत्‍व इसलिए है क्‍योंकि चंद्रमा शान्ति का प्रतीक है तथा चंद्रमा के शिव की जटाऔं में रहने के कारण ही सुहागिन स्त्रियां चंद्रमा को अर्ध्‍य देती है व प्रार्थना करती है कि- मेरे पति की आयु दीर्घ करें और उन पर आने वाले संकटो का नाश करें।

छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार- जो चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उसे जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता तथा उसे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है।

और इसी मान्‍यता के कारण इस त्यौहार पर स्त्रियों द्वारा चंद्रमा की पूजा की जाती है।

गणेश पूजन का महत्‍व

करवा चौथ के दिन गणेश पूजन का भी महत्‍व है जिसके संदर्भ में एक पौराणिक कथा इस प्रकार है कि

एक समय एक वृद्धा भगवान गणेश की उपासना करती थी। एक दिन भगवान गणेश ने प्रसन्‍न होकर उसे वरदान मांगने के लिए कहा, तो वृद्धा ने कहा- मैं अपने बहु-बेटे से पूंछ कर वरदान मांगूंगी।

भगवान गणेश ने कहा- ठीक है, मैं कल वापस आऊंगा।

यही बात वृद्धा ने अपने बहु-बेटे को बतायी और उसके बहु-बेटे ने उसे कुछ सलाह दी। अगले दिन जब भगवान गणेश प्रकट हुए तो वृद्धा ने भगवान गणेश से कहा कि- मुझे भाग्‍यवान बना दें तथा धन-धान्‍य, निरोग, अमर सुहाग, अमर वंश व अनन्‍त मोक्ष प्रदान करें।

भगवान गणेश तथास्‍तु कह कर अर्न्‍तध्‍यान हो गए।

जिस दिन भगवान गणेश ने उस वृद्धा को ये आशीर्वाद दिया था, उस दिन दिन करवा चौथ था। इसलिए तभी से इस दिन भगवान गणेश का भी पूजन-अर्चन किया जाता है, ताकि इस व्रत को करने वाली स्त्रियों को भगवान गणेश का भी आशीर्वाद प्राप्‍त हो व उन्‍हें भी वे सारे आशीर्वाद प्राप्‍त हों, जो उस वृद्धा को प्राप्‍त हुए थे।

Article Source :- http://www.allinhindi.com/

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