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करवा चौथ का व्रत किस दिन किस समय और कैसे करना है ?

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करवा चौथ का व्रत

करवा चौथ का त्यौहार भारत के कई राज्यो में धूम-धाम से मनाया जाता है. यह त्यौहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है. आमतौर पर इस पर्व को सुहागिन महिलाये सोलह तरह के सिंगार करती है और अपने पति की लम्बी उम्र और परिवार के कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं तक्की जीवन भर पति-पत्नी में प्यार बना रहे और घर में सुख शांति और समृधि रहे . अधिकतर महिलाये इस व्रत को निर्जला रखती है.

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आजकल लड़किया भी इस व्रत को रखती हैं ताकि उन्हें अच्छा वर मिल सके. करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद शुरू होता है तथा रात में चंद्रमा को देखने के बाद ही इस व्रत को खोलती हैं.

इस बार करवा चौथ का व्रत 19 अक्टूबर 2016 को मनाया जा रहा है 

शाम 05 बजकर 43 मिनट से लेकर 06 बजकर 59 मिनट तक का समय पूजा के लिए उत्तम है 

करवा चौथ के दिन चंद्रोदय – रात 8:51 बजे

करवा चौथ के व्रत को रखने के लिए कुछ आवश्यक सामग्री की आवश्यकता पड़ती है. इस सामग्री के बिना यह व्रत पूर्ण करना कठिन होता है.

करवा चौथ कि किताब – करवा चौथ के दिन करवा चौथ की कथा पड़ना जरुरी होता है इसलिए जिन महिलाओ को यह कथा याद ना हो वह लोग इस किताब से कथा पड़ सकते हैं. इस कथा को घर की कोई बुजुर्ग महिला या फिर पंडित जी द्वारा पढ़ाया जाता है. यदि यह सम्भव ना हो सके आप इस कथा को स्वयं या किसी कन्या के द्वारा भी पढ़ा सकते हैं.

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करवा चौथ का व्रत चन्द्रमा को अर्घ्य देकर की खोलना चाहिए. यह शुभ माना जाता है. इस व्रत को बिना चाँद के निकलने नही खोलना चाहिए. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह अशुभ माना जाता है.

करवा चौथ व्रत विधि

इस व्रत की कथा तथा पूजा की विधि हर जगह अलग-अलग प्रकार की होती है.

  • ब्रम्‍ह मुहूर्त में स्‍नान कर व्रत रखने का संकल्‍प लें और सास द्वारा भेजी गई सरगी खाएं। सामान्‍यत: सरगी के रूप में सास द्वारा मिठाई, फल, सेंवई, पूड़ी और साज-श्रंगार का समान दिया जाता है।
  • पूरा दिन उपवास रखें। उपवास अपनी क्षमतानुसार निर्जला अथवा जल युक्‍त अथवा फलाहार युक्‍त हो सकता है। हालांकि निर्जला व्रत सर्वोत्‍तम माना जाता है।
  • सभी कामों से निर्वत होकर अन्‍त में तैयार हो सोलह श्रृंगार करें। फिर एक बाजोट पर चौथा माता की तस्‍वीर या दीवार पर गेरू से चौथ माता का चित्र बनाये, धूप-दीप आदि कर पूजा-अर्चना करें तथा चौथ माता की कथा सुने। कई जगह कथा सुनने के बाद स्त्रियां पानी पी सकती हैं, जबकि अनेकों जगहों पर जब तक चंद्र दर्शन न हो जाये, तब तक कुछ भी खाया-पिया नही जाता है।
  • कथा सनने के बाद एक बाजोट पर पीली मिट्टी से मां गौरी और गणेश जी का स्‍वरूप बनाइये। मां गौरी की गोद में गणेश जी का स्‍वरूप बिठाइये। इन स्‍वरूपों की संध्‍याकाल के समय पूजा होती है।
  • जब रात्री को चंद्रमा निकल आये तब चंद्रमा को अर्घ्य देवें व ‘ॐ शिवायै नमः’ से पार्वती का, ‘ॐ नमः शिवाय’ से शिव का, ‘ॐ षण्मुखाय नमः’ से स्वामी कार्तिकेय का, ‘ॐ गणेशाय नमः’ से गणेश का तथा ‘ॐ सोमाय नमः’ से चंद्रमा का पूजन करें तथा छननी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें। चंद्रदर्शन के बाद अपने से बडों यानी सासु, ससुर, जेठ, जेठानियां, पति व अन्‍य बडे-बुजुर्गों के चरण स्‍पर्श कर आशीर्वाद प्राप्‍त करें।
  • फिर यदि सम्‍भव हो तो शक्‍कर का करवा लें और उसमें चावल भरें जबकि यदि शक्‍कर का करवा उपलब्‍ध न हो, तो मिट्टी का करवा लेकर उसमें में शक्‍कर व चावल का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवे पर स्‍वास्तिक बनाएं। गौरी गणेश के स्‍वरूपों की पूजा करें व कम से कम 108 बार इस मंत्र का जाप करें –

‘नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥‘

  • फिर करवों का आपस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। यहां इस बात का ध्‍यान रखना जरूरी होता है कि एक दूसरे के करवें किसी भी स्थिति में न टकराऐं। यदि ऐसा होता है, तो उस वर्ष पति के साथ कोई न कोई बडी दुर्घटना जरूर घटित होती है। इसलिए करवों का टकराना एक प्रकार का अपशकुन माना जाता है। अत: किसी भी स्थिति में करवों का आदान-प्रदान करते समय वे आपस में टकराने नहीं चाहिए।
  • ये पर्व पति की लम्‍बी उम्र के लिए किया जाता है, लेकिन पति का जन्‍म जिस माँ से हुअा है, पत्नियां उस माँ यानी अपनी सास का इन करवों के साथ मिठाईयां, फल व तरह-तरह की भेंट सामग्री प्रदान कर सम्‍मान करती हैं तथा करवा चौथ के इस व्रत का समापन करती हैं। यानी सास द्वारा दी गई सरगी से जिस व्रत की शुरूआत होती है, उसी सास को भेंट देकर इस व्रत का समापन किया जाता है।
  • अन्‍त में पूजा समापन के बाद बडों को भाेजन कराने के बाद अन्‍त में स्‍वयं भोजन ग्रहण कर व्रत काे पूर्ण किया जाता है।
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