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ऊषापान (शरीर के लिए अमृत समान)

ऊषापान (तांबे के बर्तन में रखा बासी पानी पीना )

ऊषापान करने के लिए एक तांबे के बर्तन की आवश्यकता होती है। शरीर में लगातार मेटाबोलिक क्रिया चलती रहती है जिसमें पानी की लगातार जरूरत होती है। इन्हीं क्रियाओं के फलस्वरूप हमें एनर्जी मिलती है। प्रातःकाल पिया गया पानी उषापान कहलाता है। इससे मनुष्य के यौवन और आयु में वृद्धि होती है। ऊषापान के लिए तांबे का बर्तन प्रयोग करने का कारण यह है कि तांबे के बर्तन में पानी रखने से पानी केवल 12 घंटे में पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है। उषापान क्रिया के लिए तांबे के बर्तन में रात को सोते समय ताजे पानी को भरकर उसमें 3-4 तुलसी के पत्ते को डालकर ढककर रख दिया जाता है। पानी में तुलसी के पत्ते मिलने से पानी की शक्ति कई गुणा अधिक हो जाती हैं। ऊषापान क्रिया में सुबह सूर्योदय से पहले तांबे के बर्तन में रखे हुए बासी पानी को नाक या मुंह से चूस-चूसकर पिया जाता है। यह ऊषापान अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने में लाभकारी होता है। इसमें पानी की मात्रा व्यक्ति की क्षमता के अनुसार रखनी चाहिए। अनेक ग्रंथों में ऊषापान की मात्रा लगभग 1 लीटर बताई गई है। आयुर्वेद के ´भाव प्रकाश´ में ऊषापान की मात्रा 240 मिलीलीटर बताई गई है।

ऊषापान की विधि-

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ऊषापान के लिए पहले रात को सोते समय एक तांबे के बर्तन में 250 से 750 मिलीलीटर की मात्रा में स्वच्छ व साफ पानी रखें और उस पानी में 3-4 तुलसी के पत्ते रखकर उस पानी को तांबे के बने ढक्कन से ही ढककर किसी ऊंचे और साफ-स्वच्छ स्थान पर रख दें। यदि पानी रखने वाला स्थान अधिक स्वच्छ व साफ हो और कीड़े-मकोड़े आदि का डर न हो तो पानी को खुले आकाश के नीचे बिना ढके रख दें। इससे आकाश के विभिन्न प्रकार के तत्व पानी में मिल जाते हैं, जो पानी के गुणों को और बढ़ा देते हैं। अब सुबह सूर्योदय से लगभग 3 घंटे पहले उठकर अपने हाथ-मुंह साफ करके प्रसन्न चित्त होकर रात को तांबे के बर्तन में रखे हुए बासी पानी को धीरे-धीरे घूंट-घूंट करके पीएं। ऊषापान की क्रिया को पहले 2 गिलास पानी पीकर करें। पानी पीने के बाद कुछ देर तक टहले और उसके बाद शौच के लिए जाएं। इस क्रिया में धीरे-धीरे पानी की मात्रा बढ़ाते हुए 4 गिलास पानी पीकर इस क्रिया को करने की कोशिश करें। इस क्रिया को प्रतिदिन सुबह करें। सर्दी के मौसम में पानी अधिक ठंडा हो तो उसे हल्का गुनगुना कर लें और फिर इस क्रिया को करें।

ऊषापान नाक के द्वारा भी किया जाता है। यदि पानी पीने की क्रिया नाक से करने का अभ्यास हो तो इसके लिए आप को टोंटी लगे हुए तांबे का बर्तन चाहिए होता है। इससे पानी आसानी से नाक द्वारा पिया जा सकता है। नाक से पानी पीते समय ध्यान रखें कि दाहिना नासिका चल रहा है, या नहीं। यदि नहीं चल रहा हो तो उस समय थोड़ी देर बाएं करवट लेट जाएं, इससे दायां स्वर चालू हो जाएगा। इसके बाद दाईं नासिका को थोड़ा ऊपर उठा लें और फिर धीरे-धीरे नाक में पानी डालें। इससे पानी नाक के रास्ते मुंह में आने लगेगा। पहला घूंट पानी मुंह में आने पर पानी को बाहर फेंक दें। फिर आने वाले पानी को अन्दर घूंट-घूंट कर पीते जाएं। यदि ऊषापान से अधिक लाभ प्राप्त करना हो तो पानी में हल्का नमक मिला दें। इससे शरीर का तापमान बराबर बना रहता है।

सावधानी-

ऊषापान जुलाब की हालत में, आंव की बीमारी में, घाव पकने पर, हिचकी, वात, न्यूमोनियां एवं क्षय रोग से ग्रस्त होने पर नहीं करना चाहिए।

ऊषापान मुंह की अपेक्षा नाक से करने पर अधिक लाभ होता है। ऊषापान शुरू-शुरू में कुछ दिन मुंह के द्वारा ही करें। नाक के द्वारा अभ्यास होने के बाद नाक के द्वारा ऊषापान करें। यह क्रिया किसी योग गुरू की देख-रेख में ही करें। ऊषापान का अभ्यास नाक के द्वारा पहले 10 मिलीलीटर पानी से करें। फिर धीरे-धीरे पानी की मात्रा को बढ़ाएं। यदि ऊषापान नाक के द्वारा करना संभव न हो तो मुंह के द्वारा ही ऊषापान करें। जबर्दस्ती नाक के द्वारा ऊषापान करने की कोशिश न करें। नाक के द्वारा ऊषापान करते समय ध्यान रखें कि पानी सांस के द्वारा न खिंचने पाए, बल्कि पानी अपने आप नाक से डालने पर मुंह में आ जाए। नाक से पहले अभ्यास करते समय गले में खराश व कुछ समय तक बेचैनी बनी रहती है। नाक से पानी पीते समय आंखों से आंसू और कुछ घबराहट हो सकती है। ऐसी स्थिति में घबराना नहीं चाहिए।

ऊषापान में अन्य नियम व जानकारी-

ऊषापान सुबह सूर्योदय से पहले किया जाता है और ऊषापान के बाद व्यक्ति को सोना नहीं चाहिए। ऊषापान करने के बाद ही थोड़ी देर टहलकर शौचक्रिया के लिए जाना चाहिए। शौच आदि से आने के बाद हाथ-मुंह धोकर सुबह की सैर पर निकल जाना चाहिए। ऊषापान के बाद खुले हवा में टहलने से शरीर में ठंडक व शीतलता महसूस होती है और पूरे दिन मन प्रसन्न रहता है। यदि किसी व्यक्ति को सिरदर्द या पेट का विकार हो तो ऊषापान के बाद शौच आदि से निवृत आने के बाद 15-20 मिनट तक लेटना भी लाभकारी होता है, परन्तु ध्यान रखें कि लेटते हुए सो जाना हानिकारक होता है।

अनेक लोग ऊषापान इस कारण से नहीं करते कि एक दिन भी यह क्रिया छोड़ देने पर हानि हो सकती है। इस तरह ऊषापान बीच में एकाध दिन छोड़ देने से कोई हानि नहीं होती। परन्तु ध्यान रखें कि ऊषापान का अभ्यास एकाएक न छोड़ें। इस क्रिया को छोड़ने से पहले धीरे-धीरे पानी पीने की मात्रा को कम करते हुए जब पानी की मात्रा बिल्कुल कम हो जाए तो इस क्रिया को छोड़ दें।

ऊषापान से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को कुछ व्यायाम अवश्य करने चाहिए। ऊषापान करने वाले व्यक्ति को सादा भोजन करना चाहिए। गर्मी के दिनों में ऊषापान करना अत्यंत लाभकारी होता है। ऊषापान की शुरुआत मार्च-अप्रैल में करनी चाहिए।

उषापान से लाभ-

इससे पेट में जमा हुआ मल साफ होता है, शौच खुलकर आती है और पेट साफ रहता है। इस क्रिया से बवासीर, पेट के रोग, जिगर (यकृत) के रोग दूर होते हैं। यह पेशाब को साफ करता है तथा पेशाब तथा वीर्य संबंधी रोगों को समाप्त करता है। यह कुष्ठ, सिरदर्द, नेत्रविकार, वात-पित्त-कफ से उत्पन्न होने वाले विकारों को दूर करता है। यह बुढ़ापे से शरीर को बचाता है और व्यक्ति दवाई आदि के प्रयोग के बिना ही स्वस्थ रहता हैं। ( पानी क्यों ना पीये खाना खाने के बाद।)

ऊषापान को आयुर्वेद शास्त्र में अमृत कहा गया है। अत: इससे यह सिद्ध होता है कि ऊषापान से अत्यंत लाभ होता है। इस क्रिया को प्रतिदिन करने से कब्ज दूर होता है। यह पित्त से उत्पन्न विकारों को दूर करता है और खून को साफ कर हृदय, मस्तिष्क तथा स्नायुमण्डल तक पहुंचाता है, जिससे ये अंग शक्तिशाली बनाते हैं। वैद्यक ग्रंथों में ऊषापान का वर्णन करते हुए इसके लाभों को इस तरह बताया गया है-

सवितुरुदय काले प्रसृती: सलिलस्य पिवेदस्टौ।

रोग जरा परि युक्तो जी वेद्वत्खर शतं खाग्रम।।

अर्थात प्रतिदिन सूर्य निकलने से पहले यदि 8 अंगुली स्वच्छ व साफ पानी पीया जाए तो मनुष्य अपने जीवन में कभी रोग ग्रस्त नहीं होता। इस तरह प्रतिदिन जो भी सुबह पानी पीता है, उसका आयु भी बढ़ती है।

वैद्यक ग्रंथों में ऊषापान के लाभ का वर्णन इस तरह श्लोक के द्वारा किया गया है-

अर्श: शोथ ग्रहण्यो ज्वर जठर जरा कोष्ठ मेदो विकारा:।

मूत्राघात सृपित्त श्रवण गल शिर: श्रोणि शूलाक्षि रोग:।।

ये चान्ये वात पित्त क्षतज कफकृता व्याधय: सांताजन्ता।

स्तांस्तानभ्यास योगादपि हरित पय: पतिमंते निशाया:।।

अर्थात ऊषापान से अनेक प्रकार के रोग जैसे- पेट की खराबी, अधिक चर्बी बनना तथा सिर, कमर व नितम्ब दर्द आदि दूर होते हैं। इसके प्रयोग से बवासीर, सूजन, संग्रहणी, ज्वर, पेट का रोग, कब्ज का बनना, मूत्र रोग, रक्त, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाले विकार ठीक होते हैं। ऊषापान का जल गुर्दों में जाकर उन्हें शक्तिशाली बना देता है और आंतों को पुष्ट करता है। इससे शौच खुलकर आती है और पाचनशक्ति बनी रहती है। यह मूत्रपिण्डों में मौजूद दूषित द्रव्य को पेशाब, पसीना, प्रश्वास आदि के द्वारा बाहर निकालता है। इसके पान से पाचनसंस्थान में भोजन का बनने वाला रस शुद्ध होकर पूरे शरीर में पहुंचता है, जिससे शरीर के सभी अंग पुष्ट व शक्तिशाली बनते हैं। यह खून की गर्मी को कम करता है तथा उस गर्मी को पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकालता है। इस पान से अपच हुआ भोजन मल के रूप में बाहर निकल जाता है। ऊषापान बुद्धि को तेज करता है, बालों को पकने से बचाता है। यह आंखों के रोग जैसे आंख आना, रतौंधी आदि विकारों को दूर करता है और आंखों की रोशनी को बढ़ाता है। इसे पीने से नाक से खून का निकलना, गर्मी की बीमारी, लू आदि में लाभ होता है। यह मानसिक थकान को दूर करता है, पेट की आंतों को साफ करता है और शरीर में शक्ति व स्फूर्ति का संचार करता है।

ऊषापान के औषधीय गुण 

1. पानी पीने से थकान दूर होती है। तथा राहत मिलती है। इसलिए जब भी थके-मांदे घर लौंटे तो एक गिलास पानी अवश्य पिएं।

2. यदि बुखार बहुत तेज हो तो रोगी को हर आधे घंटे में ठंडा पानी पिलाते रहना चाहिए।

3. यदि कोई व्यक्ति मूर्छित हो गया हो तो उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारें या उसे शीतल जल से भरे टब में लिटा देना चाहिए।

4. यदि साइटिका की शिकायत हो तो ठंडे पानी से सुबह-शाम करना चाहिए।

5. बच्चों के सूखा रोग में प्रतिदिन ठंडे जल से स्नान कराने से लाभ होता है।

6. काली खांसी होने पर भी प्रतिदिन शीतल जल से ही स्नान करने से राहत मिलती है।

7. हिस्टीरिया में रोजाना शीतल जल से स्नान करने से दौरे की आकृति और तीव्रता कम हो जाती है।

8. आग से शरीर का कोई अंग जल या झुलस जाए तो तुरंत प्रभावित अंग पर ठंडा पानी का छिड़काव करें। यह छिड़काव तब तक करें जब तक कि जलन पूर्णतः बंद नहीं हो जाती।

9. अस्थमा या दमा रोग मे रोगी को रोजाना सुबह उठते ही एक गिलास ठंडा पानी पीना चाहिए।

10. जल हमारे शरीर शुद्धिकरण के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में विजातीय तत्व शरीर से बाहर नहीं निकल पाते। पसीना और मूत्र तभी बनेगा जब आप पानी पिएंगे।

11. पानी का समुचित मात्रा में सेवन करने से खाए गए पोषक तत्वों का अवशोषण होता है।

12. रक्त बनाने में आंतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि छोटी एवं बड़ी आंत सक्रिय बनी रहे तो रक्त निर्माण निर्बाध गति से होता है।

13. जो लोग पानी पीने में कंजूसी बरतते हैं उन्हें कब्ज की शिकायत सदैव बनी रहती है। पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करने से आंतों की सक्रियता बढ़ती है तथा मल निष्कासन में परेशानी नहीं होती। बवासीर, फिशर तथा फ्रिश्चुला जैसी बीमारियां भी उन्हें घेरती हैं, जो पानी कम पीते हैं।

14. मोटापे से परेशान हो तो पानी डटकर पिएं। इससे पेट भरा-भरा लगता है और शरीर को खाद्य सामग्री की जरूरत कम पड़ती है।

15. गुर्दे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि आप पानी कम पीते हैं तो इससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है जबकि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से वे भलीभांति कार्य करते हैं।

16. पीलिया रोग में भी जल का सेवन बहुत लाभदायक है। इससे रक्त में व्याप्त अशुद्धियां बाहर निकल जाती हैं।

17. जी घबराना, हृदय की धड़कन बढ़ने आदि पर घूंट-घूंट कर ठंडा जल पीने से तुरंत राहत मिलती है।

18. बुखार होने पर रोगी के माथे व पेट पर ठंडे पानी की पट्टी रखनी चाहिए। इससे बुखार उतरने में मदद मिलती है।

19. तांबे के बर्तन में रात भर रखा पानी सुबह पीने से पेट संबंधी रोगों का नाश होता है।

20. जो लोग पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करते हैं उन्हें बुढ़ापा देर से आता है। उनके चेहरे पर समय से पूर्व झुर्रियां भी नहीं पड़तीं।

21. गर्मियों में घर से बाहर निकलने पर लू लगने का अंदेशा रहता है। ऐसे में घर से निकलने से पूर्व एक गिलास ठंडा पानी पी लिया जाए तो लू से बचाव हो सकता है।

22. स्तनपान कराने वाली माताओं को पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इससे उनमें दूध की मात्रा बढ़ती है।

23. आंखों में छोटा-मोटा कीड़ा, कचरा आदि घुस गया हो तो साफ शीतल जल से आंख धोने से अवांछित वस्तु निकल जाएगी तथा आपको राहत मिलेगी।

24. नकसीर फूटने पर रोगी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखें। इससे नाक से होने वाला रक्तस्राव बंद हो जाएगा।

25. प्रातः शीतल जल के छींटे आंखों पर मारने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।

26. महिलाओं को अपने स्तन पुष्ट करने के लिए स्नान करते समय ठंडा एवं गर्म जल बारी-बारी से स्तनों पर डालना चाहिए। इससे उनमें कसाव पैदा होता है।

27. आईफ्लू यानि कंजेक्टिवाइटिस होने पर दिन में कई बार साफ, शीतल जल से आंखें धोने से राहत मिलती है।

28. जल ही शरीर के तापक्रम को नियमित करके शरीर की गर्मी को समान रूप से बनाए रखता है।

29. रक्त को तरल व गतिशील बनाए रखने में जल विशेष उपयोगी है।

30. पर्याप्त मात्रा में जल पीने से ही शरीर की हड्डियां और जोड़ क्रियाशील रहते हैं।

31. डिहाइड्रेशन में तो जल का सेवन किस संजीवनी बूटी से कम नहीं उल्टी, दस्त, लू आदि की वजह से हुए डिहाइड्रेशन से जान भी जा सकती है। उल्टी-दस्त होने पर पानी में ‘ओआरएस’ का घोल बनाकर लेना चाहिए।

32. शरीर को जल की आवश्यकता प्राकृतिक बात है। यदि आप पानी नहीं पिएंगे तो जल की पूर्ति आपके रक्त, मांसपेशियों और विभिन्न कोशिकाओं से होती हैं। इससे अन्य शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

33. जल में प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। जो लोग समुचित मात्रा में जल का सेवन करते हैं वे रोगाणुओं के हमले से बचे रहते हैं।

34. शीतल जल से स्नान करने से न केवल शरीर में व्याप्त मैल, गंदगी ही दूर होती है अपितु ताजगी एवं स्फूर्ति का एहसास भी होता है।

35. जल के सेवन से शरीर की नाड़ियां उत्तेजित होती हैं तथा मांसपेशियां संकुचित।

36. जल की कमी से जोड़ों को आधार प्रदान करने वाली गद्दियों में लचीलापन समाप्त हो जाता है तथा वे सिकुड़ जाती हैं।

37. जल का सेवन नए ऊतकों के निर्माण में सहायक होता है तथा उन्हें सुरक्षात्मक कुशन प्रदान करता है।

38 पानी में तुलसी के पत्ते मिलने से पानी की शक्ति कई गुणा अधिक हो जाती हैं।

39. जो लोग पानी कम पीते हैं उनकी याददाश्त कमजोर होती है।

40. पानी पीने से मुंह में लार और थूक बनता है। लार पाचन क्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देती है।

41. पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बड़ी आंत के कैंसर से बचाता है।

42. समुचित मात्रा में पानी का सेवन स्तन कैंसर की आशंका कम करता है। पानी अधिक पीने से ब्लड कैंसर का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है।

43. पथरी होने पर रात्रि भोजन के पश्चात् एक गिलास गर्म पानी पीना चाहिए।

44. यदि पैरों में सूजन आ गई हो तो गर्म पानी में थोड़ा सा नमक डालकर उसमें पैर डुबोकर रखें

45. यदि कमर या पीठ दर्द सताए तो गर्म पानी की थैली से सिकाई करने से लाभ होता है।

46. नमकीन पानी में नहाने से गठिया के दर्द में राहत मिल सकती है।हाल में हुए शोध से पता चलता है कि उच्च सांद्रता वाले नमक के घोल के सूजन के कारण फैली कोशिकाओं को राहत मिलती है और इससे किसी तरह का साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।

47. यदि टॉसिल्स बनने की शिकायत हो तो गर्म पानी में एक चुटकी नमक डालकर गरारे करने से लाभ होता है।

48. यदि कब्ज की शिकायत हो तो रात को सोते समय तथा सुबह उठने के बाद गर्म जल का सेवन करना चाहिए।

49. सर्दियों में कफ की शिकायत हो तो सूर्य तापित जल का सेवन करना चाहिए।

विशेष-

ऊषापान अत्यंत लाभकारी है, फिर भी जिस व्यक्ति की प्रकृति उस क्रिया के अनुकूल न हो उसे यह क्रिया नहीं करनी चाहिए। इससे आलस्य दूर होता है, भूख बढ़ती है और चेहरे पर रौनक व चमक आती है। इस क्रिया से शरीर में ठंडक पैदा होती है, इसलिए इस क्रिया को सर्दी के मौसम में सावधानी के साथ करना चाहिए। कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को गर्मी के दिनों में यह क्रिया सावधानी से करनी चाहिए।

सावधानी – 

  1. आप जो भी जल का सेवन करें, वह शुद्ध और कीटाणु रहित होना चाहिए।
  2. प्रदूषण जल बीमारियों का कारण बन सकता है। वैसे तो जब प्यास लगे, पानी पीना चाहिए लेकिन व्यायाम या संभोग के तुरंत पश्चात् नहीं पीना चाहिए।
  3. इसी प्रकार भोजन के तुरंत बाद, चाय, दूध पीने के तुरंत बाद, शौच के तुरंत बाद, तेज धूप से लौटने के तुरंत बाद तथा पके फल और मेवे खाने के तुरंत बाद पानी का सेवन नहीं करना चाहिए।
 Article Source :- http://www.thehealing.in/
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