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अश्वत्थामा अमर है और आज भी जीवित हैँ

अश्वत्थामा अमर है और आज भी वह मंदिर में पूजा करते हैं

अश्वत्थामा :- महाभारत युध्द से पुर्व गुरु द्रोणाचार्य जी अनेक स्थानो मे भ्रमण करते हुए हिमालय (ऋषिकेश) प्‌हुचे। वहा तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा मे तपेश्वर नामक स्वय्मभू शिवलिग हे। यहा गुरु द्रोणाचार्य जी और उनकी पत्नि माता कृपि ने शिवजी की तपस्या की। इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने इन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। कुछ समय बाद माता कृपि ने एक सुन्दर तेजश्वी बाल़क को जन्म दिया। जन्म ग्रहण करते ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। जन्म से ही उन के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी |जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। (wikipedia)

अश्वत्थामा:- असीरगढ़ का किला बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर पर उत्तर दिशा में सतपुडा पहाड के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। किले के ऊपरी भाग में गुप्तेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर चारों और खाइयों से घिरा हुआ था।
किंवदंती के अनुसार इन्हीं खाइयों में से किसी एक खाई में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ, सीधे इस मंदिर में निकलता है। ऐसी मान्यता है कि वह मंदिर में इसी रास्ते से आते हैं।
मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के नजदीक है ‘असीरगढ़ किला’ और इस किले के अंदर स्थित है ‘गुप्तेश्वर महादेव मंदिर’ कहते हैं यहां गुप्तरूप से हर अमावस्या और पूर्णिमा के दिन अश्वत्थामा आते हैं। वह यहां शिवजी की पूजा करते हैं। उन का उल्लेख महाभारत में मिलता है।

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यहां किसी ने भी उन को पूजा करते नहीं देखा, लेकिन सुबह गुप्तेश्वर मंदिर में शिवलिंग के समक्ष गुलाब के फूल और कुमकुम के मिलता है। मंदिर के पुजारियों का मानना है कि भगवान भोलेनाथ को गुलाब और कुमकुम अश्वत्थामा ही चढ़ाते हैं।

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