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अल्सर (Alser) के आयुर्वेदिक और औषधीय उपचार

अल्सर (Alser) / Ulcer क्या है ?

अल्सर होने पर पेट दर्द, जलन, उल्टी और उसके साथ ब्लीडिंग होने लगती है। कुछ समय बाद अल्सर के पकने पर यह फट भी जाता है। इसे परफॉरेशन कहते हैं। हमारे पेट में एक तरह का एसिड होता है जो हमारे खाने को पचाने में मदद करता है| लेकिन ये एसिड विषैला होता है, जो हमारे पेट की परत और आंत इफ़ेक्ट करता है, इस एसिड से बचाने के लिए हमारे पेट में कफ की एक परत पेट और आंत को ढक लेती है| जब पेट कमजोर हो जाता है और आंत के पास ये एसिड आ जाता है तब वहां घाव या छाला हो जाता है, जिसे  पेप्टिक अल्सर (peptic ulcer) कहते है|

खानपान की गलत आदतों और उसके कारण बनने वाला एसिड इस बीमारी को अधिक बढ़ा देता है। अनियमित दिनचर्या, खानपान की गलत आदतें और उसकी वजह से बनने वाला एसिड अल्सर की प्रमुख वजह है। कई पेनकिलर्स और दवाओं की वजह से भी यह बीमारी हो जाती है। इसके अलावा तनाव भी अल्सर का बड़ा कारण है, क्योंकि इससे एसिड ज्यादा बनता है। यदि आप मानसिक रूप से खुश नही रहेंगे, हमेशा चिंतित, तनावग्रस्त रहेंगे भरपूर नींद नहीं सोयेंगे तो इससे पेट के अंदर बनने वाले पाचन रसों के स्त्राव का अभाव होगा। यानि पाचन रस उत्पन्न नहीं होगा, जिसके जरिये भोजन आसानी से पचता है । तो एसिडिटी उत्पन्न करेगा जो धीरे धीरे अल्सर बन सकता है। इसके लिये मन को प्रसन्न रखें मन प्रसन्न तो तन प्रसन्न होगा। फिर तन मन दोनों प्रसन्न रहेगा।इसलिये मन को प्रसन्न रखना ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है तभी अल्सर घाव आसानी से भरेगा। कारण खुश रहने से कोई भी बीमारी जल्दी ठीक होती है। अल्सर, कभी-कभी किसी बडी या लम्बी बीमारी में अधिक समय तक या ज्यादा एंटीबॉयटिक खाने से (दवा की गर्मी से) भी हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि हानि पहुँचाने वाले बैक्टीरिया एसिड के अभाव में पेट में तेजी से बढ़ते हैं, इन पर नियंत्रण करना शरीर के लिए मुश्किल हो जाता है। ये बैक्टीरिया पेट की सतह पर चिपककर अल्सर का कारण बनते हैं। अल्सर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें पेट की अंदरूनी दीवारों पर छाले पड़ जाते हैं। बीमारी बढ़ जाने पर ये छाले गहरे घाव में बदल जाते हैं और मरीजों को ज्यादा परेशानी होने लगती है। गलत खानपान की वजह से जब पेट में एसिड ज्यादा बनने लगता है तो यह स्थिति पैदा हो जाती है। यह बीमारी बैक्टिरिया के इंफेक्शन की वजह से भी होती है

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अल्सर कितनी तरह का होता है ?

अल्सर मुख्यत 3तरह का होता है

  1. गैस्ट्रिक अल्सर : इसमें भोजन के बाद पेट में दर्द होने लगता है। डाइजीन जैसी दवाएं लेने के बाद आराम मिल जाता है।

2. ड्यूडिनल अल्सर : खाली पेट रहने से दर्द होता है। भोजन करने के बाद दर्द ठीक हो जाता है। अगर 15 लोगों को ड्यूडेनल अल्सर होता है तो मुश्किल से 1 या 2 लोग गैस्ट्रिक अल्सर के शिकार होते हैं।

3  इसोफेगल अल्सर : इसमें आहार नली के निचले हिस्से में छाले पड़ जाते हैं या छिद्र हो जाते हैं। इससे आहार नली में तेज जलन होती है।

गैस्ट्रिक अल्सर में खाने के बाद पेट में दर्द होने लगता है। वहीं ड्यूडिनल अल्सर में खाली पेट रहने से दर्द होता है और भोजन करते ही दर्द ठीक हो जाता है।

अल्सर के लक्षण :- 

  1. पेट के ऊपरी हिस्से में तेज दर्द होना अल्सर का लक्षण हो सकता है।
  2. भोजन के बाद जब पेट में दर्द हो और डाइजिन जैसी एंटी-एसिड दवाओं से राहत मिले तो इसे गैस्ट्रिक अल्सर का लक्षण माना जाता है।
  3. ड्यूडिनल अल्सर में खाली पेट दर्द होता है और भोजन के बाद दर्द से राहत मिलती है। अक्सर इसका दर्द रात को होता है।
  4. अगर दर्द छाती के पास हो तो इसे एसिडिटी रिफ्लेक्शन का असर समझना चाहिए। इससे दिल के दर्द का शक होता है। दिल का दर्द छाती के ऊपरी हिस्से में होता है और कभी-कभी एसिडिटी की वजह से भी उसी जगह दर्द होता है, इसलिए बिना जांच के अंतर समझ पाना आसान नहीं है।
  5. पेप्टिक अल्सर होने से मरीज को भूख कम लगती है। सामने खाना होने पर भी खाने की इच्छा नहीं होती।
  6. उलटी होना या उलटी जैसा महसूस होना अल्सर का लक्षण माना जा सकता है। जब अल्सर बढ़ जाता है, तो खून की उलटी हो सकती है। ऐसे में स्टूल (मल) का रंग काला हो जाता है।
    • पेट में जलन होना
    • सीने और नाभी के बीच जलन या दर्द

अल्सर होने के कारण :
इस रोग में पक्वाशय रोगग्रस्त हो जाता है जिससे पक्वाशय में रस की वृद्धि होती है। गैस्ट्रिक अल्सर दूषित व भारी खाना खाने, अलग-अलग स्थानों पर पानी पीने, मानसिक अघात और ´हेलिकोबेक्टर पायलोरी´ नामक बैक्टीरिया के कारण होता है।

  • ज्यादा शराब पीना
  • ड्रग्स लेना
  • अंदरूनी घाव
  • रेडिएशन थेरेपी

अल्सर के रोगी का भोजन  :
दूध, मौसमी, चोकर समेत आटे की रोटी, रेशे वाला भोजन लें, चने की रोटी, सत्तू, नींबू , लौकी, परवल, पालक , बथुआ, पत्तागोभी, नाशपाती, आलूबुखारा , गाजर का मुरब्बा और मटर आदि का सेवन करना गैस्ट्रिक अल्सर के रोगियों के लिए हितकारी होता है।

खाना समय पर और तसल्ली से खाएं।

रात के खाने और सोने के बीच कम-से-कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए।

जूस, लस्सी या मीठे तरल पदार्थ पीने में लोग जल्दबाजी करते हैं। यह गलत है। ऐसी चीजों को धीरे-धीरे पीना चाहिए। धीरे-धीरे पीने से मुंह का सलाइवा इसमें मिल जाता है, जिससे ये चीजें जल्दी पच जाती हैं।

नियमित व्यायाम करें। पेनकिलर्स के रूप में क्रोसिन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अल्सर के रोगी के परहेज़ :

तेल , घी, डालडायुक्त, चटपटे, मसालेदार , भारी भोजन, भिंडी, करेला , आलू , फूलगोभी , अदरक का आचार, कालीमिर्च, कडुवा व खट्टे खाद्य पदार्थ, शहद , नशीले पदार्थ, सड़ी-गली चीजे, चाय-कॉफी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके सेवन से यह पेट रसों के साथ मिलकर हाइड्रोक्लोरिक एसिड अधिक पैदा करता है जिससे पेट में अल्सर बन जाता है।

टेलिविजन देखते हुए खाना न खाएं।

स्मोकिंग से परहेज करें।

तनावमुक्त रहने की कोशिश करें।

अगर अल्सर हो जाए, तो एनएसएडी समूह की दवा न लें।

प्राकृतिक चिकित्स पध्दति क्या है?

जिसमें औषधियों का इस्तेमाल नहीं होता बस खानपान ,रहन सहन में सुधार ,धूप हवा पानी, मिट्टी का प्रयाग करते हैं साथ – साथ योगसन, प्राणायाम द्वारा रोगी को दुरूस्त किया जाता है। इसमें किसी रोग विषेश की चिकित्स नहीं होती है बल्कि संपूर्ण शरीर की चिकित्सा की जाती है।इसका कोई प्रतिकूल(खराब) प्रभाव नहीं होता।

प्राकृतिक चिकित्सा पध्दति

  1. रोगी को मानसिक रूप से खुश व शांत रहना चाहिये।इन्हें ज्यादा से ज्यादा हंसना व हंसाना चाहिये।चिंता मुक्त रखें
  2. सुबह शाम पेट व पेडू पर आधा घंटे साफ मिट्टी की पट्टी कपडे में लपेटकर बनाकर रखें इससे पित्त की गर्मी शांत हो जाती है तथा घाव भरने में मदद मिलेगी।मिट्टी के लेप के आधे घंटे बाद टहलें जरूर कारण यह एक व्यायाम होता है।
  3. रात को सोते समय पेडू पर ठंडे पानी की पट्टी बनाकर रखें।

पेट को हमेशा साफ रखने की कोशिश करें वरना आंतों में मल पड़ा रहेगा तो टॉक्सिन पैदा होगा।पेट की गंदगी से पेट भारी सा रहेगा और पेट भारी तो सर भारी होगा।सो कब्ज को दूर रखें।कारण अधिकतर बीमारियों का सबसे बड़ा कारण कब्ज ही होता है।

4.रोगी को दिन भर में कम से कम एक ड़ेढ़ लीटर पानी पीना चाहिये इससे कब्ज ठीक रहेगा और कब्ज ठीक तो पित्त शांत रहेगा।

5.रोगी को अपने भोजन पर विषेश ध्यान देना चाहिये।रोगी को तामसी,(नॉनवेज), राजसी(अधिक घी तेल गरिष्ट) भोजन को छोड़कर शुद्ध सात्विक भोजन करना होगा।

दिनचर्या तथा खानपान जब तक आप स्वस्थ हैं खाओ-पियो मौज करो यानि मुर्गा, अंण्डा, मछली, मांस, जंकफूड़. पिज्जा, बर्गर, तला, भुना, ठंडा गरम ,बीड़ी सिगरेट, गुटका चबाना, रात में जागना, दिन में सोना। जब मन में आया खाते जाओ पेट न हो गया मानो गोदाम हो। एक दो बार के लिये तो ठीक है पर हर बार आखिर कब तक, एक दिन तो पाचन संस्था जवाब देगी ही।स्वाद की लोलुपता में पड़कर तेल मसाले खूब प्रयोग करना इससे पाचन तंत्र कमजोर पड़ जाता है तथा पाचन संबंधि विकार पैदा होने लगते है।इतना ही नहीं अत्याधिक तैलीय पदार्थों के सेवन से रक्त में वसा (कोलेस्ट्रॉल) की मात्रा बढ़ जाती हैजिससे धमनियां अवरूद्ध होने लगती है जिससे ह्रदयाघात भी हो सकता है।

भोजन के नियम-

1.भोजन समय पर करना चाहिये ,अधिक तेल मसाले का सेवन न करें। भोजन पदार्थ शुद्ध, सुपाच्य, ताजा, पौष्टिक, तथा शाकाहारी हो।

2.सात्विक आहार ही सर्वोत्तम आहार होता है, इससे आयु, आरोग्य, बल,सुख की वृद्धि होती है।

3.कड़वा,खट्टा,अधिक नमकीन,अधिक गर्म् प्रकृति का आहार,शोक,दुख,रोग उत्पन्न करता है।

4.आजकल पार्टियों में एक दूसरे के प्लेट में खाना खाना, जूठे हाथों से खाना परोसना।आप कहेंगे कि यह सब बेकार की बात है परंतु वैज्ञानिक आधार पर विचार किया जाये तो सामने आता है कि यदि कोई रोगी हाथ मुंह तक स्पर्श करता है और उसी हाथ से भोजन परोसता है तो जीवाणु भोजन में प्रवेश कर जाते हैंऔर इस तरह रोग फैलता है।

5.रात का भोजन सात आठ बजे तक हो जाना चाहिये इसके बाद इसबघोल दूध के साथ लेना चाहिये इससे कब्ज नहीं रहेगा।दूध अल्सर में फायदा करता है। दूध दिन में कई बार लेने से अल्सर का घाव जल्दी भरता है।

6.रोगी का भोजन अत्यंत मुलायम होना चाहिये।

अल्सर के रोगी क्या खायें –

1.प्रचुर मात्रा में दूध लें

2.चिकनाई कम से कम खायें

3.गाय का घी इस्तेमाल कर सकते हैं

4.पका फल खायें थोडा कच्चा नहीं,फल में केला,आम,खरबूजा,पका पपीता,खरबूजा ,खजूर,मीठा अनार,कच्चा नारियल पानी,आंवला रस।

5.सब्जी-लौकी टिण्डा परवल, तोरई बंदगोभी का रस चोकर समेत रोटी,मूंग की खिचड़ी।नमक बिल्कुल कम खायें ताकि अल्सर के घाव को न बढ़ा दे।

अल्सर के रोगी क्या न खायें

1.मांस मछली अण्डा

2.अधिक चाय कॉफी

3.शराब सिगरेट बीडी पान मसाला

4.ज्यादा तली भुनी चीजें

5.ज्यादा चावल न खायें

6.अधिक नमक न खायें

7.अधिक बेसन, मैदा की चीजें न खायें

8.अचार न खायें

9.कोल्ड्रिंक्स,आइसक्रीम कम खायें

10.जंक फूड़,बिस्कुट न खायें

11.अधिक खट्टी चीजें, इमली या कच्चा आम या इनसे बनी चीजें न खायें

12.दालें कम खायें अधिक तर सभी दालों से गैस बनती है।

13.पेट को छोड़कर पूरे शरीर की मालिश करनी चाहिये ताकि नाड़ियों की उत्तेजना शांत रहे, थकावट दूर होती है, मन शांत रहता है, नींद अच्छी आती है, जो बहुत जरूरी है।

सावधानियां-यदि अल्सर के रोगी को ह्रदय रोग,.डायबिटीस भी हो तो अपना डाईट चार्ट किसी डाइटीशियन से मिलकर बनवायें डॉक्टरी सलाह लेकर।

यह उपरोक्त चार्ट पर आधारित न रहें यह संपूर्ण इलाज नहींहै ।यदि रोगी असाद्य रोग से परेशान हो तो डॉक्टरी सलाह लें।

विभिन्न औषधियोँ द्वारा अल्सर का उपचार —-
१- चार मुनक्के तथा दो छोटी हरड़ पीसकर सुबह खाने से पेट की जलन तथा उल्टी समाप्त होती है |
२- पान के हरे पत्तों का १/२ [आधा ] चम्मच रस प्रतिदिन पीने से पेट के घाव व दर्द में लाभ होता है |
३- एक चम्मच आँवले के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन पीने से अल्सर ठीक होता है |
४- अल्सर के रोगी को अनार के रस तथा आँवला मुरब्बा सेवन से लाभ होता है |
५- अल्सर में दूध , पका केला , चीकू , शरीफ़ा तथा सेब का सेवन करना चाहिए |

अल्सर के घरेलू उपचार

पोहा (बिटन राइस) और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रख लें और रात में पूरा पी जाएं। रोज सुबह तैयार करें और दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में खत्म कर देना है।

दूध गैस्ट्रिक एसिड बनाता है, लेकिन आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है।

पत्ता गोभी और गाजर को बराबर मात्रा में लेकर जूस बना लें। सुबह-शाम एक-एक कप पीने से पेप्टिक अल्सर के मरीजों को आराम मिलता है।

गाय के दूध से बने कच्चे घी का इस्तेमाल फायदेमंद होता है।

बादाम पीसकर बनाए गए दूध से मरीज को काफी लाभ पहुंचता है।

ड्रम स्टिक (सहजन) के पत्ते को पीसकर दही के साथ पेस्ट बनाकर लें।

5. यौगिक क्रियाएं

पेप्टिक अल्सर को दूर करने के लिए योगासन नहीं हैं, लेकिन एसिड की अधिकता को कम करने के लिए योग कारगर है।

वज्रासन, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, भुजंगासन करने से एसिड का असर कम होता है।

जलनेति जैसी यौगिक क्रियाएं भी उपयोगी हैं।

अनुलोम-विलोम, शीतली और सीत्कारी जैसे प्राणायाम से फायदा मिलता है।

पेप्टिक अल्सर ने अगर गंभीर रूप ले लिया हो तो योगासन नहीं करने चाहिए।

यौगिक क्रियाएं किसी योगाचार्य की सलाह और देखरेख में ही करें।

कुछ सवाल

क्या कम खाने से एसिड बनता है?

नहीं।

ज्यादा खाने से एसिड बनता है?

ज्यादा खाने से बदहजमी हो सकती है। ऐसे में पाचन क्रिया प्रभावित होती है।

ईनो के फायदे-नुकसान क्या हैं?

कोई नुकसान नहीं है, लेकिन इसे आदत नहीं बनानी चाहिए। इसे एसिड के असर को कम करने के लिए लिया जाता है। बेहतर यह है कि इसे ठंडे पानी में लिया जाए।

डायजीन, रेनटेक, ओमेज लेना नुकसानदायक है?

परेशानी होने पर इमर्जेंसी में इन दवाओं को लेना ठीक है, लेकिन इसकी आदत नहीं होनी चाहिए।

हाजमोला, पुदीन-हरा आदि का कोई नुकसान तो नहीं होता?

ये एक तरह के एंटी-एसिड हैं। इनसे राहत मिलती है। लेने में हर्ज नहीं है लेकिन बीमारी का पता लगाना जरूरी है।

ठंडा दूध या आइसक्रीम लेने के कुछ नुकसान तो नहीं हैं?

ये भी एंटी-एसिड का काम करते हैं। दूध से राहत तो मिलती है लेकिन बाद में यह अमाशय में गैस्ट्रिक एसिड का निर्माण करता है। यह हानिकारक है।

नॉन-स्टिरॉयडल एंटी इंफ्लेमेटरी ड्रग्स के साथ डॉक्टर एक टैब्लेट रात को खाने को देते हैं, जिससे गैस न बने। इस तरीके से इन ड्रग्स को लेना सही है क्या?

बिल्कुल सही है। इससे अल्सर नहीं होता।

क्या अल्सर से कैंसर हो सकता है?

अल्सर से कैंसर होने की आशंका बहुत कम होती है। जितनी भी आशंका होती है, वह भी गैस्ट्रिक अल्सर की वजह से ही होती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कैंसर की वजह से अल्सर डिवेलप हो जाता है।

Article Source :- https://kmsraj51.com/

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