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अयोध्या:- The Real Story of Ayodhya

अयोध्या की सच्ची कहानी

अयोध्या :- जिसे पढ़कर आप रो पड़ेंगे। कृपया इसलेख को पढ़ें, तथा प्रतेक हिन्दू मिञों को अधिक से अधिक शेयर करें। जब बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ उस समय जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी।

महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बासमूसा आशिकान अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बन कर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी महात्मा श्यामनन्द के ख्याति प्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा। ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा। जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी,हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना । अत: जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंपकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए । सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपासकी जमीनों मेंबलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया॥ और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबरको उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया। बाबा श्यामनन्दजी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देखके बहुत दुखी हुएऔर अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ।दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी नेरामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित किया और खुद हिमालय की और तपस्या करने चले गए।

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मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामानआदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पररामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाहकी आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सरकाटलिए गए. जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनानेकी घोषणा हुई उस समयभीटी के राजा महताब सिंहबद्री नारायण की यात्रा करने के लिएनिकलेथे,अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबरमिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित करदी औरअपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिलकर १ लाखचौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४लाख५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े।रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे।रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी १लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए।

श्रीरामजन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस भीषण कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में लखौरी इंटों के साथ ।इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओंकी लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने मंदिरध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया..इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की “जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नीव मस्जिद बनवाने के लिए दी गयी थी। उस समय अयोध्या से ६ मीलकी दूरी पर सनेथू नामका एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आसपास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया॥ देवीदीन पाण्डेय ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं ..अप के पूर्वजश्री राम थेऔर हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी। आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामकी जन्मभूमि को मुसलमानआक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥देवीदीन पाण्डेय की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९०हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोगसमूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीनपाण्डेय के नेतृत्व मेंजन्मभूमि परजबरदस्त धावा बोल दिया । शाही सेना से लगातार ५दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीनपाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेयजी की खोपड़ी पर वार कर दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी से बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया। इसी बीच मीरबाँकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेयजी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हुए..जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं॥ पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद हंसवर के महाराजरण विजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया ।10दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार हिन्दुओं का रक्त फिर बहा।रानी जयराज कुमारी हंसवर के स्वर्गीय महाराजरण विजय सिंह की पत्नी थी।जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा। रानी के गुरुस्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराजकुमारी की सहायता की।

साथ ही स्वामी महेश्वरानंदजी नेसन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने२४हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराजकुमारी के साथ , हुमायूँ के समय में कुल १० हमलेजन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। १०वें हमले मेंशाही सेना को काफी नुकसान हुआ औरजन्मभूमि पररानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ नेपूरी ताकत सेशाही सेना फिर भेजी ,इस युद्ध मेंस्वामी महेश्वरानंदऔर रानी कुमारी जयराजकुमारी लड़ते हुएअपनी बची हुईसेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि परपुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीरामजन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3हजार वीर नारियों के रक्त से लालहो गयी।रानी जयराज कुमारी औरस्वामी महेश्वरानंद जी केबाद यद्ध का नेतृत्वस्वामी बलरामचारी जी नेअपनेहाथ में ले लिया।स्वामी बलरामचारी जी ने गांवगांवमें घूम कररामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एकमजबूतसेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि केउद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलोंमें कामसेकाम १५ बार स्वामी बलरामचारी नेजन्मभूमि परअपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समयकेलिए रहता था थोड़े दिन बादबड़ी शाही फ़ौजआती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों केअधीनहो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दूबलिदान होतेरहे।उस समय का मुग़ल शासक अकबर था।शाही सेना हर दिनके इन युद्धों से कमजोर हो रही थी..अतः अकबर नेबीरबल और टोडरमल के कहने पर खसकी टाट से उसचबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया.लगातार युद्ध करते रहने के कारणस्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्यगिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर परत्रिवेणी तट परस्वामी बलरामचारी की मृत्युहो गयी ..इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस केरोष एवं हिन्दुस्थान परमुगलों की ढीली होती पकड़सेबचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबरकी इसकूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्तनहीं बहा।यही क्रम शाहजहाँ के समयभी चलता रहा। फिरऔरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था औरउसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफायेका संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मेमंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ केसभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़डाला।औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था औरउसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफायेका संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मेमंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ केसभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़डाला।औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदासजी महाराजजी के शिष्य श्री वैष्णवदासजी ने जन्मभूमि केउद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मेअयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीयक्षत्रियों नेपूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदारगजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंहतथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारेवीर ये जानते हुएभी की उनकी सेना औरहथियारबादशाही सेना के सामने कुछभी नहीं है अपने जीवन केआखिरी समय तक शाही सेना सेलोहा लेते रहे। लम्बे समयतक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिएहजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया औरअयोध्या की धरती पर उनका रक्तबहता रहा।ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों केवंशजआज भी सराय मे मौजूद हैं। आजभी फैजाबाद जिले के आस पास केसूर्यवंशीय क्षत्रियसिर परपगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते,छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने येप्रतिज्ञा ली थी की जबतक श्री राम जन्मभूमि का उद्धारनहीं कर लेंगे तब तकजूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे,पगड़ी नहीं पहनेंगे। 1640ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिरको ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्वमें एकजबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णवदास के साथसाधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मेनिपुण थी इसेचिमटाधारी साधुओंकी सेना भी कहते थे । जबजन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं केसाथ चिमटाधारी साधुओंकी सेना की सेना मिलगयी और उर्वशी कुंड नामक जगह परजाबाज़खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्धकिया ।चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार सेमुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इसप्रकार चबूतरे परस्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुतक्रोधितहुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्यसिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजारसैनिकों की सेना और तोपखाने के साथअयोध्या की ओरभेजा और साथ मे ये आदेशदिया की अबकी बारजन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है ,यह समय सन्1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों केगुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र केमाध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंहसेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड परअपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगहजहां आजकलगुरुगोविंद सिंह की स्मृति मेसिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है।

बाबा वैष्णव दासएवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतुएकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।इन वीरों कें सुनियोजितहमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यदहसनअली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेबहिंदुओं की इसप्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करनेकी हिम्मतनहीं की। औरंगजेब ने सन् 1664 मेएक बार फिरश्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इसभीषण हमले में शाही फौज ने लगभग10 हजार सेज्यादा हिंदुओं की हत्या करदी नागरिकों तकको नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लालहो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्पकूप नामका कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओंकी लाशें मुगलों ने उसमेफेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा करउसे घेर दिया।आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” केनाम से प्रसिद्ध है,औरजन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है।शाही सेना नेजन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वहचबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूरअत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उसगड्ढे परही श्री रामनवमी के दिनभक्तिभाव से अक्षत,पुष्प औरजल चढाती रहती थी. नबाबसहादत अली के समय 1763ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी केराजा गुरुदत्तसिंह और पिपरपुर केराजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँचआक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओंकी लाशेंअयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियरमे कर्नल हंटलिखता है की“ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं औरमुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करनेकी इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमानहोने के नाते उसनेकाफिरों को जमीन नहीं सौंपी।“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मेमकरही के राजा केनेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिएहिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमेंबड़ी संख्या में हिन्दूमारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकरनबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओंकी शक्ति क्षीण होनेलगी ,जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओंऔर मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राममे भीती,हंसवर,,मकरही,खजुरहट,दीयराअमेठी केराजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुईहिन्दूसेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओंकी सेना आमिली और इस युद्ध मे शाही सेना केचिथड़े उड गये और उसेरौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशालशाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार करलिया औरहजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमिमेंहिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नावाबवाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओंनेजन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबादगजेटियर में कनिंघम ने लिखा”इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ।दो दिनऔर रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं केमारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि परकब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ने कब्रें तोड़फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करनेलगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार करअयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ नेमुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोईहानि नहीं पहुचाई।अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।इतिहासकार कनिंघम लिखता है की येअयोध्या का सबसेबड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था।हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेबद्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापसबनाया । चबूतरे पर तीन फीटऊँची खस की टाट से एकछोटा सा मंदिर बनवा लिया ॥जिसमेपुनः रामलला की स्थापना की गयी।कुछजेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकारनहीं हुई औरकालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकलगयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुरशाह जफर के समयमें बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिरअली के साथजन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन1858 को कुबेर टीला स्थित एकइमली के पेड़ मेदोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटकादिया ।जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवंरामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसितहो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इसआखिरी निशानी को भी मिटा दिया…इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति केकारणरामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफलहो गया … अन्तिम बलिदान …३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक केलालची मुलायम सिंह यादव केद्वारा खड़ी की गईं अनेकबाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया औरविवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन२ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादवनेकारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमेंसैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवनकी आहुतियां दीं।सरकार नेमृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तुप्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तटरामभक्तों की लाशों से पट गया था। ४ अप्रैल १९९१को कारसेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीनमुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव नेइस्तीफा दिया।लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतुअयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर केसेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीकमस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया। परन्तु हिन्दूसमाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठनहीनता एवंनपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़ेआराध्यभगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं।जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों नेअपना रक्त पानी की तरह बहाया। आजवही हिन्दूबेशर्मी से इसे “एक विवादित स्थल” कहता है।सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आजभी जन्मभूमि परअपना दावा नहीं छोड़ा है।वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिरनहीं बनने देना चाहतेहैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हेंनीचा दिखाया जा सके।जिस कौम ने अपनेही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचतेहैंहिन्दू उनकी भावनाओं को समझे। आज तककिसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि केउद्धार के लिएआवाज नहीं उठायी, प्रदर्शननहीं किया और सरकारपर दबाव नहीं बनाया आज भी वेबाबरी-विध्वंसकी तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानतेहैं। औरमूर्ख हिन्दू समझता है कि रामजन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारणउलझा हुआहै।ये लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्मनहीं आयी वो कृपया अपने घरों में रामका नामना लें…अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनकेमरने के बादकोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं।विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता एक दिन श्रीरामजन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे।चाहे अभी और कितना ही बलिदानक्यों ना देना पड़े।

एक स्वमसेवक(RSS)लालसोट(दौसा)

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